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नीरज कबि अब तक कहां छुपे हुए थे?

शेख अयाज़ | Updated on: 3 November 2015, 19:03 IST
QUICK PILL
  • रंगमंच से फ़िल्मों में आए नीरज कबि को शिप ऑफ थीसियस से सिनेमा में पहली बार बड़ी पहचान मिली.तलवार और डिटेक्टिव ब्योमकेश बक्शी में उनके विविध किरदारों की क्रिटिक और प्रशंसकों ने जमकर तारीफ की.
  • नीरज कबि रंगमंच से फिल्मों में आए हैं. उनकी पहचान ऐसे अभिनेता की है जो अपनी देह का बहुत इस्तेमाल करते हैं. वे अभिनय में नाट्यशास्‍त्र, नवरस,\r\nशास्‍त्रीय\r\nसंगीत और नृत्‍य इत्यादि के साथ प्रयोग करते रहते हैं.

शिप ऑफ थीसियस में तर्क करने वाले उस जैन भिक्षु को देखकर दिमाग में अनायास यह सवाल घूमने लगता है कि ''कौन है ये आदमी?'' अगर आप निर्देशक दिबा‍कर बनर्जी होते तो शायद यह कहते, ''अब तक यह हीरा कहां पड़ा हुआ था?''

सिनेमा में आने से पहले कबि रंगमंच की दुनिया में ठीकठाक पहचान रखते थे. दिवाकर बनर्जी ने उन्हें पहली बार शिप ऑफ थीसियस में देखा था. दिवाकर की ब्योमकेश बक्शी में दर्शकों ने उन्हें रहस्‍यमय खलनायक के रूप में देखा.

दिवाकर बनर्जी इस बात के शुक्रगुजार हैं कि उन्‍हें कबि जैसा एक अभिनेता मिल गया जिसने किरदार के साथ पूरा न्‍याय किया.

हाल ही में वो मेघना गुलजार की फिल्म 'तलवार' में डॉक्टर टंडन की भूमिका में नजर आए. फिल्म में उन्होंने डॉक्टर टंडन की चुनौतीपूर्ण भूमिका निभायी है जिनकी बेटी और नौकर की हत्या का दोषी अदालत ने उन्हें और उनकी पत्नी को माना है.

गुहा के किरदार में उतरना

ब्योमकेश बक्शी में कबि को एक दोहरी मानसिकता वाले पात्र डॉ गुहा को पर्दे पर उतारना था, इसे उन्होंने पूरी विश्वसनीयता से निभाया. अपने इस दोहरे किरदार से कबि ने खुद बनर्जी को भी चौंका दिया था.

बनर्जी कहते हैं, ''चुनौती यह थी कि शुरुआत में डॉ गुहा को सज्‍जन दिखाया जाए और अंत में यांग गुआंग जैसा एक बेरहम राक्षस. हमारी कोशिश थी कि दर्शकों को केवल इस अहसास से चौंका दिया जाए कि वे दरअसल एक ही शख्‍स को देख रहे थे जिसके भीतर दो अलग-अलग शख्सियतें मौजूद थीं.''

वो कहते हैं, ''नीरज की काबिलियत इसमें थी कि उन्‍होंने दोनों किरदारों को शारीरिक रूप से अलग कर दिया था."

बनर्जी ने बताया कि नीरज ने डॉ. गुहा की देहभाषा को यांग गुआंग के मुकाबले सुस्त बना दिया. वह ठहर कर सोचता है, उसकी संवाद अदायगी धीमी है, उसके नुक्‍ते ठहरे हुए हैं और उसकी भंगिमा व चाल-ढाल भी बहुत सुस्‍त है. यह तकनीक देखने में सहज है लेकिन करने में बेहद मुश्किल है. नीरज ने उसे संभव बनाया.''

देह को बनाते हैं अभिनय का औजार

रंगमंच की दुनिया में कबि की पहचान ऐसे अभिनेता की रही है जो अभिनेता के रूप में है अपनी देह का बहुत इस्तेमाल करते हैं. वे अभिनय में नाट्यशास्‍त्र, नवरस, शास्‍त्रीय संगीत और नृत्‍य इत्यादि स्रोतों का इस्तेमाल करते हैं. फिर भी  उनका अभिनय कभी 'मेथड एक्टिंग' नहीं लगता.

कबि कहते हैं, "आप केवल धोती पहनकर गांधी नहीं हो सकते."

हालांकि शिप ऑफ थीसियस में जैन भिक्षु बनने के लिए उन्‍होंने अपना वजन करीब आधा कर लिया था.

अभिनय को एक ग्लैमरस पेशा कहना उन्हें असहज कर देता है. वे कहते हैं, ''डॉ. श्रीराम लागू ने अभिनेता को कुली की संज्ञा दी थी. एक कुली सामान को एक जगह से दूसरी जगह तक ले जाता है. अभिनय में यह सामान हमारी स्क्रिप्‍ट है. एक अभिनेता स्क्रिप्‍ट को लेखक और निर्देशक के पास से उठाकर दर्शकों तक ले जाता है. इसमें ग्‍लैमर कहां से आ गया? अभिनेता वास्‍तव में एक मजदूर है.''

अभिनेता, निर्देशक और रंगमंच के प्रशिक्षक के रूप में कई साल बिताने के बाद 47 साल की उम्र में कबि के अपने काम को लेकर बिल्कुल साफ सोच रखते हैं. बॉलीवुड में मिल रही कामयाबी ने उनकी सोच को नहीं बदला है.

कबि 'मनोरंजन उद्योग' और 'अभिनय उद्योग' के बीच फर्क बरतते हैं और उन्हें पता है कि उनकी जमीन कहां है.

वे बताते हैं, ''मैं उनमें से नहीं हूं जिन्‍हें लोगों की नजर में रहना पसंद होता है. मैं व्‍यावसायिक सिनेमा का आदमी नहीं हूं. मैं अपनी देह बनाने नहीं जा रहा. मैं अच्‍छा नहीं दिखता, इसलिए कभी भी स्‍टार नहीं बन पाऊंगा.''

क्‍या कभी स्‍टार बनने की इच्‍छा भी नहीं हुई? इसपर कबि हंसते हुए कहते हैं, ''मैंने अपने घर में शाहरुख खान की मशहूर अदाओं का अभ्‍यास किया है, लेकिन वे चीजें मेरे लिए नहीं बनी हैं. शाहरुख और सलमान अपनी जगह पर आदर्श हैं. वे आकर्षक हैं और लोग उनकी चुम्‍बकीय शख्सियत से सम्मोहित होते हैं''

नीरज कहते हैं, ''मैं पहले एक अभिनेता होना चाहूंगा, उसके बाद एक स्टार.''

अपने तारणहार का इंतजार

कबि को सिनेमा में अपनी पहचान बनाने में आखिर इतना वक्त कैसे लग गया. वो करीब 25 साल पहले 1991 में मुंबई आए थे. उन्‍हें श्‍याम बेनेगल से मिलना था, लेकिन वे बेनेगल के व्यक्तित्व से डर गए और वहां से भाग खड़े हुए.

जमशेदपुर से पुणे का उनका सफर पढ़ाई के सिलसिले में शुरू हुआ. वे बताते हैं, ''1989 की बात है जब एनआईआईटी खुला था. मुझे यह कहने में गर्व होता है कि मेरे पास कंप्‍यूटर में डिप्‍लोमा है. मैं देश के उन शुरुआती 30 लोगों में हूं जिन्‍होंने कंप्‍यूटर की पढ़ाई की थी. मैं जीमैट की तैयारी कर रहा था. सोचा था कि मैं अमेरिका जाऊंगा और कभी लौट कर नहीं आऊंगा.''

पुणे में रहने के दौरान फ़िल्म संस्थान एफटीआईआई के कुछ छात्रों से उनकी दोस्ती हो गयी जिससे फिल्‍मों में उनकी रुचि जगी.

उन्‍होंने एफटीआईआई और दिल्‍ली के एनएसडी(राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय) में प्रवेश पाने की कोशिश भी की लेकिन नाकाम रहे. वो कहते हैं, ''अंत में एनएसडी का एक सिलेबस मेरे हाथ लगा और मैंने खुद को वह हर एक विषय पढ़ाने का फैसला किया जो वे अपने छात्रों को पढ़ाते थे.''

दिल्ली और पुणे के मुकाबले मुंबई में जिंदगी ज्यादा कठिन थी. आजीविका चलाने के लिए उन्‍होंने टीवी के धारावाहिकों और विज्ञापन फिल्‍मों में प्रोडक्‍शन का काम किया. वे कहते हैं, ''मैं अजीब किस्‍म के काम कर रहा था, सबसे बदतर काम. मैं इंडस्‍ट्री में फिफ्थ एडी के रूप में काम कर रहा था. उन दिनों यह काम तकरीबन स्‍पॉट बॉय के काम जैसा हुआ करता था. हम बस चारों तरफ दौड़ते रहते, सिनेमेटोग्राफरों के लिए पान लाते, अभिनेताओं के कपड़े प्रेस करवाते और झाड़ू आदि लगाते रहते थे.''

बॉलीवुड में मिली पहचान

आनंद गांधी ने 2009 में उन्‍हें शिप ऑफ थीसियस के लिए संपर्क किया. वे बरसों से ऐसे ही किसी किरदार का इंतज़ार कर रहे थे. वरिष्‍ठ अभिनेताओं के प्रति इंडस्‍ट्री के रुख को लेकर कबि आजिज आ चुके थे.

वे बताते हैं, ''आनंद ने जब बताया कि उन्‍होंने 'क्‍योंकि सास भी कभी बहू थी' लिखा है, तो मेरे मन में आया कि कह दूं 'मेरे से नहीं होने वाला है भाई.''' हालांकि गांधी ने उन्हें मुलाकात के लिए राजी कर लिया. इसके बाद की कहानी को हम सिनेमा का जादू कह सकते हैं.

दिबाकर बनर्जी मानते हैं कि कबि की मुट्ठी में अभी और जादू बंद हैं.

वे कहते हैं, ''इरफ़ान, नवाज, मनोज वाजपेयी, राधिका आप्‍टे और ऋचा चड्ढा की तरह वे भी आने वाले लंबे समय तक भारतीय अभिनय की बारिकियों को परिभाषित करते रहेंगे.''

बनर्जी इस अभिनेता के साथ 'बार बार' काम करने की ख्‍वाहिश रखते हैं. कबि की अपनी ख्‍वाहिशें हैं. वे ज़ोया अख्‍तर, विशाल भारद्वाज, इम्तियाज अली, शेखर कपूर, मीरा नायर और आमिर खान के साथ काम करना चाहते हैं.

आमिर खान क्‍यों? कबि कहते हैं, ''मैं आमिर का बहुत सम्‍मान करता हूं. वे बड़ी आसानी से खांटी मुख्‍यधारा में जा सकते थे लेकिन उन्‍होंने ऐसा नहीं किया. मुझे उनके साथ काम कर के अच्‍छा लगेगा. बस उसी किस्‍म की फिल्‍में जो उनका प्रोडक्‍शन हाउस बनाता है. उनकी धूम जैसी व्‍यावसायिक फिल्मों में नहीं.''

First published: 3 November 2015, 19:03 IST
 
शेख अयाज़ @CatchNews

मुंबई में रहने वाले स्वतंत्र पत्रकार हैं

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