Home » मनोरंजन » Pan Nalin's new film Angry Indian Goddesses' review
 

फिल्म समीक्षाः मर्दों की दुनिया में रहने वाली 7 औरतों की कहानी

राहुल देसाई | Updated on: 4 December 2015, 19:18 IST

मुझे याद नहीं आ रहा कि आखिरी बार कब किसी हिंदी फिल्म को देखकर मुझे ऐसा लगा जैसे मैंने किसी की बेहद निजी जिंदगी में झांक लिया हो.

हमें पता है कि हिंदी फिल्मों की हिरोइनों के लिए एक खांचा बना हुआ है. जिसके बाहर उनके लिए कोई जगह नहीं होती. वो रोती हैं, हंसती हैं, गाती हैं और लुभावने डॉयलॉग बोलती हैं लेकिन ये कभी नहीं पता चलता कि वो तब क्या कर रही होती हैं जब ये सब नहीं कर रही होती हैं.

पैन नलिन की नई फिल्म 'एंग्री इंडियन गॉडेसेज़' की सात हिरोइनें इस बंधे बंधाए ढांचे में फिट नहीं होती. उनका व्यक्तित्व, उनके संघर्ष और उनके फ़ैसले दूसरी फिल्मों की हिरोइनों से मिलते जुलते लग सकते हैं लेकिन वो अपने रोल से इतर आम लड़कियों जैसा जीवन भी जीती हैं.

पढ़ेंः 5 शॉर्ट फिल्में जो आपका एड्स के प्रति नज़रिया बदल देंगी

सिर्फ़ लड़कियों की पार्टी में शामिल होने का मुझे कभी मौका नहीं मिला है. लेकिन पैन नलिन ने इसके लिए जिस तरह लड़कियों को चुना मुझे कुछ भी अनजाना नहीं लगा. ये लड़कियां लोगों का ध्यान खींचने के लिए कुछ नहीं करतीं.

इन लड़कियों को जोड़ने वाला कनेक्शन काफ़ी फिल्मी है. गायिका मैड(अनुष्का मनचंदा), हाउसवाइफ़ पम्मी(पवलीन  गुजराल), मेड लक्ष्मी (राजश्री देशपाण्डे), कलाकार फ्रीडा(सारा-जेन), एंग्लो-इंडियन अभिनेत्री 'जो' (अमृत मघेरा) सभी को अपने आसपास के मर्दो के अश्लील और अभद्र बरताव का सामना करना पड़ता है.

इसके बाद  कारोबारी महिला सू(संध्या मृदुल) आती है जो अपने दफ्तर के मर्द कलिग पर बरस पड़ती है. फिर अपने कपड़े उतार स्विम सूट में ऑफ़िस के पूल में कूद जाती है. उसके जीने का यही तरीका है.

पढ़ेंः नीरज कबि अब तक कहां छुपे हुए थे?

इस ग्रुप में आखिर में शामिल होती है एक्टिविस्ट वकील नर्गिस(तनिष्ठा). ये सभी पुराने दोस्त फ्रीडा के गोवा स्थित घर पर होने जा रही एक शादी में इकट्ठा होती हैं. इसके बाद इन सभी के जीवन के पुराने पन्ने खुलने लगते हैं. उनकी खुशियां और गम सामने आने लगते हैं.

भारतीय समाज की महिला विरोधी सोच को दिखाने के लिए शायद पांच महिलाओं की कहानी भी काफी होती. ज्यादा कैरेक्टर होने की एक दिक्कत ये है कि  पैन नलिन अपनी सुविधा से जब चाहे तब एक के जीवन से दूसरे के जीवन में पहुंच जाते हैं. इस वजह से कई बार वो चालू ढर्रा अपनाते नजर आते हैं.

अपने अपने अंतरद्वंद्वों से जूझते इन पात्रों की कहानी कहीं कहीं सुस्त लगने लगती है. हालांकि फिल्म में कई ऐसे मोड़ हैं जो इस ऊब को तोड़ते हैं.

पढ़ेंः उपन्यास वाले बॉन्ड की कुछ बातें जो फ़िल्मी बॉन्ड में नहीं हैं

फिल्म के क्लाइमैक्स में आदिल हुसैन छोटे से रोल में भी अपने अभिनय से असर छोड़ जाते हैं. ऐसा लगता है कि वो इस धरती के सभी मर्दवादी पुरुषों के प्रतिनिधि हैं.

फिल्म का अंत इस बात की ओर इशारा करता है कि देश के मौजूदा व्यवस्था के प्रति लोगों में अविश्वास और अधैर्य बढ़ता जा रहा है.

दिल्ली में हुए निर्भया गैंगरेप के बाद कई फिल्मों में स्त्रियों के साथ होने वाले अपराध के प्रतिकार के लिए खुद कानून हाथ में लेने का समर्थन किया गया. इन फिल्मों की मानें तो इस मर्ज की बस यही एक दवा है.

फिल्म देखने के बाद ये समझने की भूल कत्तई न कीजिएगा कि ऐसी फिल्म केवल भारतीय महिलाओं के बारे में बनायी जा सकती है.

फिल्म दुनिया की ज्यादातर स्त्रियों के संग होने वाले बुनियादी भेदभाव को किसी पूर्वाग्रह के बिना, निर्णय सुनाने की जल्दबाजी से बचते हुए सबके सामने रखती है.

First published: 4 December 2015, 19:18 IST
 
राहुल देसाई @ReelReptile

Rahul Desai is a full-time Federer enthusiast and avid traveller who absolutely must find a way to reach Europe once a year. In his spare time, he reviews films, aspires to own a swimming pool and whines about the lack of palatable food in Mumbai.

पिछली कहानी
अगली कहानी