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एक खत पे पाकिस्तान से वापस हिंदुस्तान लौट आए थे साहिर लुधियानवी

आकांशा अवस्थी | Updated on: 8 March 2018, 14:42 IST

साहिर लुधियानवी एक ऐसा नाम जिसके बिना शायरी ग़ज़ल और गाने फीके से लगते हैं. मोहब्बत की दास्तान को सबसे मुक्कमल अंदाज में पेश करने वाले साहिर की जिंदगी बहुत उतार चढ़ाव से भरी रही. मोहब्बत के नगमे लिखते तो रहे मगर मुकम्मल मोहब्बत नसीब न हुई.

साहिर की पैदाइश उस वक़्त की है जब हिंदुस्तान का बंटवारा नहीं हुआ था. सन 1947 में जब देश का बंटवारा हुआ, भारत और पाकिस्तान अलग-अलग दो देशों में बंट गए तो साहिर लाहौर (पाकिस्तान) चले गए. एक बार मशहूर राइटर ख़्वाजा अहमद अब्बास ने उनके नाम एक पत्र लिखा जो की 'इंडिया वीकली' मैग्जीन में छपा.

जिसमें उन्होंने साहिर से भारत लौट आने की बात कही. उन्होंने पत्र में तंज कसते हुए लिखा की ''जब तक तुम अपना नाम नहीं बदलते, तुम भारतीय शायर ही कहलाओगे. हाँ, ये बात अलग है कि पाकिस्तान भारत पर हमला कर लुधियाना पर क़ब्ज़ा कर ले."
और आखिर ये लेटर साहिर के सामने आ ही गया. और वो देश वापस आ गए अपनी मां के साथ. उनकी दोस्ती के इस भाव को देखते हुए अब्बास ने अपनी जीवनी में लिखा है, "मुझे ख़ासा आश्चर्य हुआ जब इस पत्रिका की कुछ प्रतियाँ लाहौर पहुंच गईं साहिर ने मेरा पत्र पढ़ा. मेरी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा जब साहिर ने मेरी बात मानी अपनी बूढ़ी माँ के साथ भारत वापस आ गए न सिर्फ़ उर्दू अदब बल्कि फ़िल्मी दुनिया में काफी नाम कमाया."

जावेद अख्तर के साथ थी ख़ास रिश्ता
जावेद अख़्तर अपने पिता जां निसार अख्तर से लड़-झगड़कर प्रायः साहिर के ठिकाने पर पहुंच जाया करते थे. हुलिया देखते ही साहिर समझ जाते कि फिर घर में कुछ लड़ाई करके आया है.

वह प्यार से जावेद को लेकर नाश्ते पर बैठते. और तभी जावेद साहिर को सारी आपबीती सुना डालते थे. कहते हैं कि साहिर ने जावेद अख्तर को बेटे की तरह पाला था. जावेद इतने गुस्सैल थे कि एक बार तो साहिर से भी लड़कर कहीं चले गए. उन्हें इस बात से ऐतराज होता था कि साहिर ने मेरे बाप को भी सिर पर चढ़ा रखा है. साहिर जितने बड़े शायर, नग्मानिगार, हर दिल अजीज, खुशगवार इंसान थे, उतने ही हाजिर जवाब भी.

साहिर और उनके नगमों का जिक्र हो और अमृता का नाम न आये तो जैसे हर बात अधूरी रह जाती है. कहा जाता है, दोनो में ऐसी मोहब्बत थी कि अपने दर से साहिर के लौट जाने के बाद अमृता उनकी जूठी सिगरेंटें पीया करती थीं. बात 1944 की है. अमृता प्रीतम एक मुशायरे में थीं जहां साहिर पर अमृता की पहली नज़र पड़ी. और उसी पल से अमृता का इश्क़ शुरू हुआ जो परवान चढ़ता ही गया.

 

ये बात और है की दोनों का इश्क़ पूरा न हुआ. मगर जब भी कभी बात प्यार, इश्क़ की होती है साहिर और अमृता का नाम लिए बिना हर कहानी अधूरी ही रहती है.

फिल्मी अखबार और पत्रिकाएं साहिर और सुधा के रिश्तों पर टिप्पणियां करने लगे. हांलाकि बताया ये भी जाता है कि उन दिनों साहिर की लता मंगेशकर से अनबन हो गयी थी और लता ने साहिर के लिखे गीत गाने बंद कर दिये थे. ऐसे में साहिर ने सुधा मल्होत्रा को मौके दिलाने शुरू किये. सुधा मल्होत्रा ने एक बार बताया था कि ‘साहिर साहब और मेरे रिश्तों को लेकर उस दौर में मीडिया बेसिर पैर की बातें छाप रहा था. मैने अपने कई शुरूआती गीत साहिर साहब के लिखे हुए गाए, शायद उन्हें मेरी आवाज पसंद थी. और फिर उन जैसी दिग्गज हस्ती अगर किसी पर खास ध्यान रखे तो भला कौन उसे इंज्वाय नहीं करेगा. लेकिन प्रेम जैसी कोई बात नहीं थी. 

कैफ़ी आज़मी ने कभी साहिर लुधियानवी की शायरी के रोमांटिक मिज़ाज पर तंज़ कसते हुए कहा था कि ''उनके दिल में तो परचम है पर क़लम काग़ज़ पर मोहब्बत के नग़मे उकेरती है.''

First published: 8 March 2018, 14:22 IST
 
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