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बनिए का दिमाग़ और मियांभाई की डेरिंग के लिए एक बार रईस जरूर देखनी चाहिए

जॉयजीत दास | Updated on: 26 January 2017, 12:33 IST

कोई धंधा छोटा नहीं होता और धंधे से बड़ा कोई धर्म नहीं होता. रईस का सार एक तरह से यही है. और शाहरुख खान यह मोनोलॉग कैमरे की आंख में आंख डालकर दर्शकों को, हमको-आपको देखते हुए बोलते हैं.

राहुल ढोलकिया के निर्देशन में बनी 142 मिनट की यह फिल्म पैसा वसूल है. एकाध गाने अगर कम होते तो भी शायद फिल्म की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता.

एक तरह से रईस भी महानता का पीछा करने वाली कहानी है, लेकिन बहुत ही साधारण स्तर पर. इसका मध्य वर्ग मुख्य धारा का मध्य वर्ग न हो कर ‘एक अलग किस्म’ का मध्य वर्ग है. दरअसल यह दो अलग-अलग विचारधाराओं का द्वंद है.

शाहरुख रईस हैं और रईस उनमें है. हर एक्टर लेखक के किरदार से जस का तस न्याय नहीं कर पाता

रईस की कहानी एक आम युवक की कहानी है जो किसी भी युवा की हो सकती है. रईस का नायक गुजरात का युवा है. एक ऐसा राज्य जिसका इतिहास 2002 के पहले और बाद के कालखंड में लिखा जाएगा. हालांकि बॉलीवुड 2002 में गुजरात में घटे घटनाक्रम से परहेज ही करता आया है.

ढोलकिया की परजानियां इस मामले में अपवाद कही जा सकती है. उन्हें इसके निर्देशन के लिए स्वर्ण कमल पुरस्कार मिला लेकिन फिल्म को दर्शक नहीं मिले.

इस बार ढोलकिया 2002 से पहले के गुजरात की पृष्ठभूमि में रईस की कहानी लेकर आए हैं. अच्छी तरह से गढ़ी गई और दिखाई गई कहानी. रईस के लिए उन्हें शायद राष्ट्रीय पुरस्कार न मिले लेकिन इस बार उन्हें ज्यादा दर्शक जरूर मिलेंगे.

रईस में हमारा सामना ऐसे शाहरुख से होता है, जो आमतौर पर खुद को एक ‘आम एंटरटेनर’ के तौर पर पेश करते आए हैं. दूसरी ओर समय-समय पर वो ऐसी फिल्मों की ख्वाहिश भी करते रहे हैं जिन्हें उनकी अभिनय की विरासत के रूप में याद किया जाय.

रईस उसी श्रेणी की फिल्म है. यह फिल्म साबित करती है कि जरूरत पड़ने पर शाहरुख अभिनय के उस पहलू से रूबरू करवा सकते हैं जो उन्हें सिर्फ ऊर्जा से भरे नायक से अलग खड़ा करती है. और वह भी बिना हकलाए.

वे रईस हैं और रईस उनमें है. हर एक्टर लेखक के किरदार से जस का तस न्याय नहीं कर पाता. रईस की कहानी शेक्सपियर के नाटकों की तरह दुखांत की कहानी है और शाहरुख बहुत आसानी से इस तरह की भूमिका निभा ले जाते हैं.

रईस एक राजनीतिक फिल्म

लेकिन इसकी तो उनसे उम्मीद की जाती है. लेकिन शाहरुख की प्रतिभा वहां साबित होती है जब वो फिल्म की राजनीति को अपने समर्पण से नया आयाम देते हैं. रईस एक राजनीतिक फिल्म है हालांकि हमारा हिंदी सिनेमा इस तरह की फिल्मों के लिए नहीं जाना जाता.

रईस की राजनीति का कोई एक चेहरा नहीं है बल्कि यह पूरी फिल्म में मौजूद हैं. अपने-पराए की राजनीति, वोटबैंक की राजनीति, गंदे गठजोड़ और गिरते मूल्यों की राजनीति.

ढोलकिया की सबसे बड़ी कामयाबी शाहरुख के जरिये उस राजनीति को सफलतापूर्वक अंजाम देने में है. ऐसा नहीं कि शाहरुख अपने स्टारडम से पूरी तरह मुक्त हो गए हों लेकिन अपनी कड़ी मेहनत से उन्होंने किरदार में जान डाल दी, जितनी दरकार थी उतनी. न कम न ज्यादा.

अगर वे पूरी फिल्म के दौरान अपने चरित्र को लगातार ईजाद नहीं करते तो इसकी राजनीति में एक ठहराव आ जाता और फिर यह फिल्म पूरी तरह से नीरस और निर्जीव हो जाती.

लेकिन ऐसा नही हुआ. फिल्म पूरे समय जीवंत और रोचक बनी रही.  ढोलकिया की टीम और फिल्म के अन्य अभिनेताओं ने मिलकर नायक के इर्द-गिर्द एक सजीव दुनिया रची उसके लिए धन्यवाद!

अगर परजानिया में नसीरुद्दीन और सारिका थे तो रईस में नवाजुद्दीन सिद्दीकी. नवाज इसमें जयदीप अंबालाल मजमूदार नाम के पुलिसवाले की भूमिका में हैं जिसका फिल्म में रहने का दो मकसद है.

वे फिल्म के सूत्रधार भी हैं, वो चरित्र जिसके हाथ में हर पात्र की डोर है,  वे कहानी को एक सूत्र में पिरोते हैं. साथ ही साथ वे फिल्म की कहानी को तार्किक अंत की ओर ले जाने का काम भी करते हैं. कोई कमजोर अभिनेता शायद ही इस भूमिका से न्याय कर पाता. एक कमजोर निर्देशक शायद फिल्म की कहानी से न्याय नहीं कर पाता.

नवाज अकेले नहीं हैं. लगभग सभी कलाकारों ने फिल्म में अपनी भूमिका को उस स्तर तक सहज बनाए रखा है जहां ऐसा लगता है कि वे वास्तविक हैं. चाहे वह रईस का जिगरी यार मोहम्मद जीशान अयूब हो या उसकी पत्नी बनी माहिरा खान या फिर दोस्त से दुश्मन बने अतुल कुलकर्णी.

सनी लियोन का आइटम गीत लैला रीमेक केवल दर्शकों के लिए आइटम भर नहीं बल्कि कहानी का महत्वपूर्ण मोड़ है. अभिनेताओं का अभिनय और ढोलकिया की टीम की मेहनत ने मिलकर एक परफेक्ट ड्रामा तैयार किया है.

कैमरामैन केयू मोहनन ने कैमरे का शानदार उपयोग किया है. दीपा भाटिया की एडिटिंग ने इसकी जीवंतता को पूरी फिल्म के दौरान बनाए रखा है. 10 मिनट की कांट-छांट से फिल्म की सेहत पर कोई खास असर नहीं पड़ा.

ढोलकिया के अलावा फिल्म के अन्य लेखकों- हरित मेहता, आशीष वाशी और नीरज शुक्ला की भी सराहना करनी होगी. ढोलकिया को थोड़ा ज्यादा श्रेय देना होगा कि उन्होंने मसाला फिल्मों वाले शाहरुख खान को प्रभावशाली तरीके से गुजरात की एक कहानी के लिए इस्तेमाल किया.

इसमें गुजरात के मौजूदा समाज की एक झलक और सबक भी है कि अगर इसने अतीत में वो रास्ता अख्तियार नहीं किया होता तो वर्तमान में ऐसा गुजरात नहीं बना होता.

First published: 26 January 2017, 12:33 IST
 
जॉयजीत दास @joyjeetdas

Equal-opportunity critic and passionate about cinema, politics and food, not necessarily in that order. He writes, when the urge to tell a story overpowers everything else.

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