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बॉलीवुड: छोटी फिल्मों ने दिखाई बड़ी सफलता की राह

साहिल भल्ला | Updated on: 10 February 2017, 1:52 IST

बॉलीवुड में छोटा दिखाए जाने के ट्रेंड तेजी से जोर पकड़ रहा है. हम छोटे कपड़े या छोटे स्कर्ट की बात नहीं कर रहे हैं जैसा कि क्या कूल हैं हम और मस्तीजादे में दिखाया गया बल्कि बॉलीवुड फिल्मों की अवधि में की जाने कटौती का जिक्र कर रहे हैं. कम अवधि वाली फिल्में ना केवल नए दर्शकों को अपील कर रही हैं बल्कि फिल्म बनाने से लेकर वितरण तक की प्रक्रिया में शामिल लोगों को फायदा भी पहुंचा रही हैं.

बॉलीवुड में इसकी शुरुआत का श्रेय डायरेक्टर नीरज पांडे को दिया जा सकता है. नीरज ने सितंबर, 2008 में 'ए वेडनेस्डे' फिल्म बनाई थी जिसमें एक भी गाना नहीं था. बॉलीवुड फिल्मों में गाना ना होना दुर्लभ है. 2013 में आई फिल्म 'द लंचबॉक्स' एक और मिसाल है. इन फिल्मों के असर से अब बॉलीवुड फिल्में बेवकूफाना आइटम नंबर के प्रयोग से बच रही हैं.

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दूसरी महत्वपूर्ण बात है कि फिल्म 'ए वेडनेस्डे' से बॉलीवुड फिल्मों की अवधि कम होने का ट्रेंड शुरू हुआ है. इससे फिल्म निर्माता और थिएटर में फिल्म का प्रदर्शन करने वाले दोनों को फायदा पहुंचा. कम अवधि वाली फिल्मों के कारण हर दिन ज्यादा शो चलने लगे. और इससे थिएटर मालिकोंं को ज्यादा मुनाफा होने लगा है.

बॉलीवुड में कम अवधि वाली फिल्मों की शुरुआत का श्रेय नीरज पांडे को दिया जा सकता है

ए वेडनेडसे फिल्म केवल 103 मिनट की थी. हॉलीवुड में कम अवधि वाली फिल्मों का प्रचलन सामान्य है लेकिन बॉलीवुड में ऐसा कभी-कभार होता है. 2010 में बिजनेस स्टैंडर्ड में छपी रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान में हिंदी फिल्मों की औसत अवधि 120-150 मिनट की है जबकि अंग्रेजी फिल्मों की औसत अवधि 90 मिनट की है.

दर्शकों को कैसे फायदा पहुंचा?

छोटी अवधि वाली फिल्मों ने सबसे पहले दर्शकों का समय बचाया. इसके अलावा अगर फिल्म औसत निकली तो दर्शकों को इसे पचाने में कम समय लगा. मनोवैज्ञानिक तौर पर भी छोटी फिल्में लोगों को राहत पहुंचाती है.

दूसरी ओर छोटी अवधि वाली फिल्म की लागत हमेशा तीन घंटे वाली फिल्मों से कम होती है. इसके अलावा शूटिंग कम दिनों में पूरी होती है और एडिटिंग में भी कम समय लगता है.

जैसे एक अनुमान के मुताबिक ए वेडनेसडे फिल्म की लागत केवल पांच करोड़ थी जबकि इसने 34 करोड़ रुपए का कारोबार किया.

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पिछले कुछ सालों में दम लगा के हईसा (111 मिनट), एनएच 10 (115 मिनट), फाइडिंग फैनी (106 मिनट), मसान (109 मिनट), कोर्ट (116 मिनट) और द लंचबॉक्स (105 मिनट) जैसी छोटी फिल्मों ने बेहतर कारोबार किया है. ये सारी फिल्में दो घंटे से कम की है. इसके अलावा इन सभी फिल्मों को फिल्म क्रिटिक द्वारा सराहना मिली है.

बड़ी फिल्मों की कमाई सिर्फ स्टार्स की वजह से

कमाई के मामले में बॉलीवुड के सबसे सफल 15 फिल्मों में दो को छोड़कर सभी फिल्में 150 मिनट या उससे कम अवधि वाली है. इनमें से अधिकतर फिल्में 2010 के बाद रिलीज हुई है. हालांकि, इन फिल्मों के सफल होने में बड़े सितारों का योगदान ज्यादा रहा है.

बड़ी फिल्मों में बाहुबली और बाजीराव मस्तानी के अलावा ज्यादातर फिल्मों की औसत प्रशंसा हुई. इसके अलावा 3 इडियट्स फिल्म को दर्शकों से काफी प्रशंसा मिली.

ए वेडनेसडे फिल्म की लागत केवल पांच करोड़ थी जबकि इसने 34 करोड़ रुपए कमाए

इन फिल्मों के चलने की सबसे बड़ी वजह इसमें काम करने वाले सितारों खुद की फैन-फॉलोइंग रही. सलमान की किक 180 मिनट की रही जबकि यह 150 मिनट में ही उतनी ही कमाई कर सकती थी.

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सिंगल स्क्रीन का दौर धीरे-धीरे खत्म होते जा रहा है. उनकी जगह अब मल्टीप्लेक्स ले रहे हैं. हर शो के बाद ये देखा जा रहा है कि एक ओर शो की संभावना है या नहीं?

इसके अलावा दर्शकों को हॉल में थोड़ा कम समय के लिए बैठने में कोई हर्ज नहीं है.

First published: 5 February 2016, 10:51 IST
 
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