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सक्सेस के लिए क्रेजी दुनिया में अध्ययन सुमन होना

रंगनाथ सिंह | Updated on: 5 May 2016, 19:14 IST

कंगना रनौत और ऋतिक रोशन आज सक्सेसफुल नाम हैं. दोनों ने इस फानी दुनिया में शायद अपने पिता (और दादा) से ज्यादा सक्सेस पायी है. दोनों के देश में लाखों चाहने वाले हैं. कंगना के दीवाने लड़कों और ऋतिक की दीवानी लड़कियों को थोड़ी देर के लिए छोड़ दें. आज लाखों लड़कियां "क्वीन" या "तनु" बनना चाहती हैं. लाखों लड़के ऋतिक जैसी बॉडी, डांस और चार्म पाना चाहते हैं.

सक्सेसफुल होने की सबसे बड़ी क़ीमत आदमी को इस रूप में चुकानी होती है कि उसकी ज़िन्दगी से जुड़ी हर चीज़ में उसके चाहने वालों को रुचि होती है. अगर दो सक्सेसफुल लोग एक ही विवाद में उलझे पाए जाएं तो उसमें प्रशंसकों की रुचि का बस अंदाजा लगाया ही जा सकता है. 

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कंगना और ऋतिक के बीच शुरू हुए विवाद में भी शुरू से ही लगभग हर किसी की रुचि थी. जैसा कि होता है, मीडिया ने इस विवाद को छौंक-बघार कर परोसना शुरू किया. जनता उंगलियां चाट-चाट कर इसका मज़ा लेने लगी.

कंगना-ऋतिक विवाद अभी किसी निर्णायक मोड़ पर पहुंचा भी नहीं था कि किसने क्या कहा, क्या किया, क्यों किया, कब किया आदि-इत्यादि पर जारी महाभोज में न जाने कहां से 'दाल-भात के बीच मूसलचंद' की तरह अध्ययन सुमन आ गिरे.

किसी पत्रकार ने कंगना के पूर्व-प्रेमी के तौर पर उनके अंदर छिपी मसालेदार ख़बर की संभावना को भांपा और दो सक्सेसफुल लोगों के बीच जारी जूतमपैजार के बीच तीसरी पार्टी के तौर उन्हें उतार दिया.

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अध्ययन सुमन, कंगना या ऋतिक नहीं हैं. वो अपने पिता (या दादा भी) की सक्सेस से ज्यादा सक्सेस नहीं हासिल कर सके. वो एक सफल पिता की "असफल" संतान हैं. लाखों-करोड़ों भारतीय युवाओं की तरह शायद उनके पिता भी उम्मीद करते रहे होंगे कि उनका बेटा उनसे भी ज्यादा सक्सेसफुल बनेगा. शायद उन्हें भी लगता रहा हो कि अगर बाप टीवी स्टार है तो बेटे का दायित्व है कि वो फिल्म स्टार बने.

शाहरुख़ ख़ान ने कभी कहा था कि उनके बेटे के लिए चीज़ें उनके मुक़ाबले ज़्यादा मुश्किल होंगी, क्योंकि उनके ऊपर कुछ बनने का दबाव नहीं था जबकि उनके बेटे के ऊपर शाहरुख़ के बेटे के रूप में ख़ुद को साबित करने का दबाव होगा.

सामंती देश-समाज में शाहरुख़ का बेटा होना, अमिताभ का बेटा होना, सचिन का बेटा होना या अपने किसी भी तरह के सक्सेसफुल पिता का बेटा होना किसी बच्चे को मानसिक तौर पर बोनसाई बना देने के लिए काफी है.

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इस देश के लाखों-करोड़ों बच्चों की तरह अध्ययन सुमन को कभी अपने व्यक्तित्व और उसकी खूबियों-खामियों को समझते-बूझते हुए करियर चुनने का मौका शायद ही मिला हो. उनके उलट कंगना और ऋतिक किस्मत वाले नज़र आते हैं.

कंगना एक मध्यम वर्गीय परिवार से निकल कर स्टारडम की राह चुनने वाली अपने परिवार की पहली लड़की हैं. उनके ऊपर पितृसत्तामक समाज की अपेक्षाओं का बोझ जरूर रहा होगा लेकिन 16 साल की उम्र में मॉडलिंग और 18 साल की उम्र में फिल्मी हिरोइन बनने का फैसला करके उन्होंने वो बेड़ियां तोड़ दीं. कंगना इस देश के उन गिने-चुने युवाओं में हैं जो कम उम्र में ही अपने मां-बाप के बताए रास्ते के बजाय अपनी मंजिल चुन कर उस पर आगे बढ़ जाते हैं.

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भारतीय रेलवे की भाषा का सहारा लिया जाए तो ऋतिक के पिता और दादा को 'सेकेण्ड एसी' लेवल का स्टार कहा जा सकता है. जाहिर है उन पर सुनील आनंद (देव आनंद के बेटे) या अभिषेक बच्चन जैसा दबाव नहीं रहा होगा. ऋतिक के पिता सक्सेसफुल निर्देशक हैं. उन्होंने उन्हें करीने से संवारा-निखारा. ऋतिक देश के उन गिने-चुने नौजवानों में हैं जिनमें वो बनने की काबिलियत थी जो उनके मां-बाप उन्हें बनाना चाहते थे.

तमाम किन्तु-परन्तु के बावजूद कंगना और ऋतिक दोनों आज सक्सेफुल हैं. बस अध्ययन सुमन नहीं हैं. शायद इसीलिए  ज्यादातर लोगों को उनसे कोई सहानुभूति नहीं है. किसी की निजी असफलता को मखौल उड़ाना एक सामंती ग्रंथि है. इस ग्रंथि से पीड़ित लोग केवल "सक्सेसफुल" लोगों की बातों को तवज्जो देते हैं.

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कंगना प्रतिभाशाली हैं. उनकी पहली फ़िल्म से मैं उनका प्रशंसक रहा हूं. लेकिन अध्ययन सुमन ने जो ब्यौरे दिए हैं उससे किसी के रोंगटे खड़े हो सकते हैं. अध्ययन ने जिस तरह से चश्मदीद के नाम, तारीख, जगह के नाम ले-लेकर कंगना पर आरोप लगाए हैं, उससे उन्हें पूरी तरह ख़ारिज करना किसी के लिए आसान नहीं है.

अध्ययन की मानें तो वो एक एब्यूसिव रिलेशनशिप के शिकार रहे हैं. फिर भी सोशल मीडिया पर उनकी खिल्ली उड़ायी जा रही है. अध्ययन की नीयत पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं. दूसरी तरफ कंगना या ऋतिक के कसीदे काढ़े जा रहे हैं. लेकिन क्या प्यार में धोखा खाए दिल से "मर्यादा पुरुषोत्तम" टाइप उच्चतम नैतिकता के उदाहरण पेश करने की उम्मीद करना मानवीय है?

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कोई व्यक्ति अपनी निजी ज़िंदगी में चाहे जितना भी सफल हो, उसे अपने प्रेमी से ये कहने का कोई हक़ नहीं कि, "तुमने अपनी ज़िंदगी में क्या उखाड़ लिया”. प्रेम कुछ उखाड़ने की प्रतियोगिता हर्गिज नहीं है. न ही कोई बाप अपने बेटे को केवल सफल होने के एवज में इनाम (या कार) देता है. भारतीय परिवार का लगभग हर पिता अपने बच्चों की यथासंभव मदद करता है. कंगना के पिता ने भी किया होगा. लेकिन दुनिया के कई "सक्सेसफुल प्रेमियों" की तरह शायद कंगना ने भी अपने रिश्ते को "पावर पॉलिटिक्स और मैनिपुलेशन" की प्रयोगशाला बना दिया.

दूसरे तमाम संपन्न परिवारों की तरह अध्ययन सुमन अपने मां-बाप द्वारा दिए गए प्रोटेक्टिव माहौल में पले बढ़े होंगे. इसलिए उन्हें गाली-गलौज और उखाड़ने-जमाने वाली मानसिक हिंसा" की शायद आदत नहीं रही होगी. अगर वो आदित्य पंचोली की तरह बॉलीवुड की भट्ठी में पके-पकाए होते तो शायद उनकी वो हालत नहीं होती जो वो बता रहे हैं.

या फिर अध्ययन कंगना के ड्राइवर जितने मामूली होते तो भी किसी को उनकी डिटेल कहानी में कोई रुचि नहीं होती. (2008 में कंगना के ड्राइवर ने उनपर और उनकी बहन पर मारपीट और गाली-गलौज करने का आरोप लगाते हुए पुलिस में शिकायत दर्ज करायी थी.)

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कुछ लोगों को लग रहा है कि अध्ययन सुमन ने इस समय कंगना के बारे में ऐसी बातें कह के कोई बदला लिया है. मुझे लगता है कि हर उस व्यक्ति की तरह जिसके साथ इस तरह का कोई दुर्व्यवहार हुआ हो पहली राहत ये होती है कि वो दुनिया को बता सके कि उसके संग "क्या हुआ था."

भोजपुरी कहावत है, "जबरा मारे, रोवे न दे" (ताकतवर आदमी मारता भी है और रोने भी नहीं देता). यानी ज्यादती करने के बाद रोने भी न देना हिंसा की पराकाष्ठा है. ग़ालिब ने कहा है, "दिल ही तो है  न संग-ओ-खिस्त, दर्द से भर न आए क्यों / रोएंगे हम हज़ार बार कोई हमें सताए क्यों."

रोना जुल्म के ख़िलाफ़ सबसे कातर प्रतिरोध है. ऐसे में अध्ययन सुमन के "रोने" पर हंसने वाले वही लोग होंगे जिनके दिलों में देश के 10 राज्यों से ज़्यादा विकराल सूखा पड़ा हुआ होगा.

कंगना और ऋतिक में कौन सही है, कौन ग़लत अब इसका फ़ैसला अदालत करेगी. ऐसे मामले जिनमें तमाम परतें और पैंतरे शामिल हों, ये कहना कि "कंगना/ऋतिक तुम बढ़े चलो हम तुम्हारे साथ हैं", या तो मूढ़ता है या धूर्तता.

कंगना के पक्ष में की-बोर्ड पीटने वालों को याद रखना चाहिए कि दुनिया भर के मर्दों के किए "जुल्म" का बदला, किसी एक नौजवान का दिल तोड़कर या अपमानित करके नहीं लिया जा सकता. गिरी हुई सोच वाले कुछ ट्विटरबाज़ कंगना को "चरित्रहीन" बता रहे हैं लेकिन ऐसे लोगों का जवाब किसी अध्ययन सुमन को नीचा दिखाना कत्तई नहीं हो सकता.

First published: 5 May 2016, 19:14 IST
 
रंगनाथ सिंह @singhrangnath

पेशा लिखना, शौक़ पढ़ना, ख़्वाब सिनेमा, सुख-संपत्ति यार-दोस्त.

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