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वर्जना तोड़ता सिनेमा: बॉलीवुड ने 2016 में उठाए कुछ सराहनीय जोखिम

दुर्गा एम सेनगुप्ता | Updated on: 27 December 2016, 7:50 IST

एक समलैंगिक पुरुष का अपने बिखरे से परिवार से अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए होने वाला टकराव, एक युवा महिला का अपने जीवन को पटरी पर लाने के लिए एक साइकोलॉजिस्ट की सहायता लेना, शराब पीने के बावजूद तीन महिलाओं का यौन शोषण से जुड़ा केस जीतना और चार लोगों का उनके जीवन में ड्रग के घुसते आने की समस्या से जूझना.

इन पंक्तियों में इस साल पूरी तरह से कमर्शियल स्तर पर बनी चार फिल्मों का सरल ही सही पर सार-संक्षेप आ जाता है. ये सभी फिल्में बड़े बैनर, बड़े बजट और उन सबसे भी ज्यादा बड़े स्टार वाली फिल्में थीं. कपूर एंड सन्स, डियर जिंदगी, पिंक और उड़ता पंजाब, ये चारों ऐसी फिल्में हैं जो अन्य फिल्मों की सूची में शायद ही आ सकें. हालांकि इन सभी को बेहतरीन फिल्मों की श्रेणी में भी नहीं रखा जा सकता है. इसके बावजदू इन फिल्मों में एक बात समान है- इन सभी फिल्मों में वर्जित समझे जाने वाले विषयों पर फिल्म बनाने का जोखिम उठाया.

इसका आशय यह कतई नहीं है कि वर्ष 2016 में मुख्यधारा की फिल्मों के बाहर अच्छी फिल्में ही नहीं बनीं और न ही इसका मतलब यह है कि इसके पहले कोई प्रयोगधर्मी फिल्म बड़े बजट में नहीं बनाई गई थी. लेकिन इस बात को स्वीकार करना ही होगा कि यह साल सिनेमा के लिहाज से एक अच्छा साल रहा है जिसमें कुछ विचारोत्तेजक फिल्मों ने नई सोच को बड़ी सूक्ष्मता और विलक्षणता से प्रस्तुत किया है.

डियर जिंदगी

उपरोक्त वर्णित चारो फिल्मों में यह सबसे कमजोर फिल्म है. इसका उल्लेख मात्र ही कइयों के मन में यह सवाल उठा सकता है कि यह फिल्म क्यों? गौरी शिंदे की इस फिल्म को कई फायदे पहले से ही हासिल थे. इसमें जीवनभर से चली आ रही समस्याओं के स्थायी हल की बजाय तात्कालिक हल पेश किए गए. सबसे चिढ़ाने वाली बात तो यह कि इसमें उपचार के नाम पर शाहरुखनुमा ज्ञान की अपचनीय डोज दी गई है. लेकिन ऐसे बॉलीवुड में जहां मां—बाप को सिर्फ आदर्श और भगवान की तरह चरित्र वाले प्राणी के रूप में दिखाया जाता रहा है जो कि इस पृथ्वी पर हमें सिर्फ आशीर्वाद थोपने के लिए ही आते हैं, डियर जिंदगी फिल्म बिल्कुल ताजी हवा के एक झोंके की तरह आई.

डियर जिंदगी न तो कहानी के मुख्य चरित्र और न ही उसके माता—पिता को परिवार के इस आदर्श पैमाने पर तौलती है कि कौन किसके लिए कितना बलिदान देता है. बल्कि यह साफ तौर पर दिखाती है कि हमारे माता—पिता भी आखिरकार हाड़-मांस के इंसान ही हैं और वे भी गलती कर सकते हैं. यह एक ऐसा पाठ है जो कि किसी भी ऐसे परिवार के लिए प्रासंगिक है जो कि आंतरिक अहंकार, हितों और आकांक्षाओं की टकराहट से जूझ रहे हैं. इसलिए दरअसल यह आज के सभी परिवारों की कहानी बन जाती है.

पिंक

हर दूसरा आदमी जिससे अब तक मैं मिली हूं वह पिंक फिल्म में दीपक सहगल की भूमिका निभा रहे अमिताभ बच्चन की इस घोषणा से बेतरह प्रभावित लगा है कि 'नहीं का मतलब सिर्फ नहीं' होता है. अगर कहने का यह तीखा और स्तब्ध करने वाला अंदाज भी यह बात समझा नहीं सके तो यह मान लीजिए कि भारत में सहमति एक वर्जित विषय है.

अनिरुद्ध रॉय चौधरी की फिल्म पिंक, बच्चन के अतिनाटकीय एक्टिंग के बावजूद सहमति का यह सवाल मजबूती से उठाने के लिए भी बेहद प्रासंगिक फिल्म है. विशेषकर शादी—शुदा महिलाओं और वैश्याओं के नजरिए से.

पिंक फिल्म अपने तीन मुख्य चरित्रों के माध्यम से देह की राजनीति के क्षेत्र में हमें ले जाती है. मीनल की भूमिका निभा रही तापसी पन्नू, अपने टैटुओं और दोस्ताना आचरण के लिए हमेशा अपराधबोध से ग्रस्त रहने की पीड़ा को स्वीकार नहीं करती. है. एंड्रिया बनी एंड्रिया तारियांग अपने पूर्वोत्तर के ठप्पे को न्याय पाने की राह में रोड़ा नहीं बनने देती. और फलक बनी कीर्ति कुल्हारे उस पितृवादी सोच पर ही प्रहार करती हुई यह रेखांकित करती है कि असहमति का अधिकार हर व्यक्ति को है.

उड़ता पंजाब

अभिषेक चौबे की फिल्म उड़ता पंजाब जितने विवादों में रही उतनी शायद ही कोई दूसरी फिल्म इस साल रही हो. कोई आश्चर्य नहीं कि लोग सिनेमाघरों में उमड़ पड़े. यही वह तरीका भी था जिससे लोग यह समझ सकें कि सेंसर बोर्ड कि चिंता कितनी जायज थी?

पंजाब में ड्रग की समस्या की गंभीरता को शासन—प्रशासन नकारता आया है और फिल्म में प्रशासन के इस चेहरे को बेनकाब होने से रोकने की सेंसर बोर्ड की कोशिश ही सबसे बड़ी विडम्बना का क्षण बन गया. फिल्म में काट—छांट संबंधी सेंसर बोर्ड के किए गए प्रयास ही ड्रग के बारे में हमारे समाज के वर्जनावादी चरित्र को रेखांकित करते हैं. जिसके कारण उड़ता पंजाब फिल्म और भी प्रासंगिक हो उठी.

फिल्म के सभी चरित्र बड़ी मशक्कत के बाद यह समझ पाते हैं कि नशे से मुक्त होने का एकमात्र सबसे सफल तरीका उनकी अपनी इच्छाशक्ति के अलावा और कुछ नहीं हो सकता.

First published: 27 December 2016, 7:50 IST
 
दुर्गा एम सेनगुप्ता @the_bongrel

Feminist and culturally displaced, Durga tries her best to live up to her overpowering name. She speaks four languages, by default, and has an unhealthy love for cheesy foods. Assistant Editor at Catch, Durga hopes to bring in a focus on gender politics and the role in plays in all our interactions.

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