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देश में ढाई लाख बांध विस्थापितों का पुनर्वास बाकी

निहार गोखले | Updated on: 10 February 2017, 1:51 IST
QUICK PILL
  • चार पूर्व जजों के एक ट्राइब्यूनल के अनुसार देश में ढाई लाख बांध विस्थापित हैं. सरदार सरोवर बांध में 50 हजार लोग विस्थापित हुए थे. 16 हजार लोगों को बांध विस्थापित घोषित किए जाने का इंतजार.
  • सरदार सरोवर बांध से तीन राज्यों के लोग विस्थापित हुए थे. जिनमें सर्वाधिक विस्थापित मध्य प्रदेश के हैं. राज्य का दावा है कि सभी विस्थापितों का पुनर्वास हो चुका है जबकि पूर्व जजों की रिपोर्ट इसके उलट.
बड़े बांधों से सैकड़ों-लाखों लोग विस्थापित होते हैं. विस्थापितों के पुनर्वास की जिम्मेदारी सरकार की होती है. जिसमें सरकार पूरी तरह कम ही सफल होती है.

इसका सबसे बड़ा उदाहरण नर्मदा नदी पर बना सरदार सरोवर बांध है. इस बांध से महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और गुजरात के कम से कम 50 हजार परिवारों के विस्थापित होने के अनुमान है.

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इन लोगों की जमीन और घर बांध के पानी में डूब गए लेकिन इन्हें अब तक पूरा मुआवजा नहीं मिला है, न ही इनका पुनर्वास हुआ है. जबकि इस बाबत सरकार ने 1979 में स्पष्ट कानून बना दिया था.

पुनर्वास की प्रक्रिया


एक अप्रैल को महाराष्ट्र के करीब दो हजार परिवारों का लंबा इंतजार खत्म हुआ. इन लोगों को घर बनाने और खेती करने के लिए जमीन मिल गयी है. इन विस्थापितों को करीब 36 साल पहले मुआवजा देना तय हुआ था. 12 दिसंबर, १९७९ को नर्मदा वाटर डिस्प्यूट ट्राइब्यूनल ने अपना फैसला दिया था. जिसमें मुआवजा की दर तय की गयी थी. तीनों राज्यों के विस्थापितों के लिए ये खबर उम्मीद की किरण बनकर आयी है.

सरदार सरोवर बांध से 50 हजार लोग विस्थापित हुए थे, 16 हजार लोगों को अभी विस्थापित माने जाने का इंतजार

विस्थापितों के अधिकारों के लिए करीब तीन दशकों से संघर्ष कर रहे नर्मदा बचाओ आंदोलन(एनबीए) की तरफ से जारी बयान के अनुसार बहुत से विस्थापितों को करीब 10 साल पहले जमीन आवंटित की गयी थी लेकिन उन्हें आज तक उसपर कब्जा नहीं मिला.

एनबीए ने एक किसान अतिया देवीजी पाडवी का उदाहरण दिया है. देवीजी को सरकार ने जमीन आवंटित कर दी थी लेकिन उन्हें इसकी खबर नहीं दी गयी. जब उन्हें राज्य के विस्थापितों के ग्रीवांसेज रिड्रेसल अथॉरिटी(जीआरए) के पास लिखित शिकायत की तो उन्हें उस जमीन के बदले महज चार महीने पहले दूसरी जगह जमीन दिलवायी.

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जो जमीन उन्हें दी गयी वो किसी दूसरे विस्थापित के नाम पर आवंटित थी जिसे मूलतः गुजरात में जमीन दी गयी थी. बाद में गुजरात और महाराष्ट्र के अधिकारियों ने मिलकर मामले को सुलझाया और देवीजी को एक अप्रैल को 70 साल की उम्र में पुनर्वास की जमीन मिली.

एनबीए की संस्थापक मेधा पाटकर कहती हैं, "पुनर्वास में भूमि सबसे बड़ा मसला है. कई बार एक ही जमीन कई लोग को दे दी जाती है. कई बार वो जमीन सरकार के कब्जे में ही नहीं होती. खेती के लिए दी गयी कुछ जमीनों में सिंचाई की व्यवस्था नहीं है जबकि ये पुनर्वास की शर्तों में शामिल है."

झा आयोग रिपोर्ट


मध्य प्रदेश सरकार से जुड़े कुछ खास बिंदु-

  • बांध का सबसे ज्यादा पानी मध्य प्रदेश को मिला है.
  • सबसे ज्यादा प्रभावित परिवार यहां के हैं.
  • पुनर्वास को लेकर सबसे ज्यादा विवाद यहां हैं.
  • सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार 81 प्रतिशत विस्थापित मध्य प्रदेश के हैं.

मध्य प्रदेश में पुनर्वास में भारी भ्रष्टाचार की शिकायतें आती रही हैं. 2008 में जबलपुर हाई कोर्ट ने रिटायर्ड जज जस्टिस एसएस झा के नेतृत्व में एक जांच आयोग का गठन किया. आयोग ने जब हाई कोर्ट को अपनी रिपोर्ट सौंपी तो उसपर विवाद हो गया. मध्य प्रदेश सरकार ने कहा कि ये रिपोर्ट कमीशन ऑफ इन्क्वायरी एक्ट के तहत राज्य विधान सभा में पेश की जानी चाहिए थी.

मामला आखिरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. 30 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने आयोग को आदेश दिया कि वो नौ अप्रैल तक रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंप दे. सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार से छह हफ्तों के अंदर रिपोर्ट पर कार्रवाई करने का आदेश दिया है. अभी तक ये रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं हुई है.

सरदार सरोवर बांध की मौजदा लंबाई 121 मीटर है, जबकि इसे 138 मीटर तक बढ़ाने का आदेश मिल चुका है

पिछले साल नवंबर में हाई कोर्ट के चार रिटायर्ड जजों के 'इंडिपेंडेंट पीपल्स ट्राइब्यूनल' ने अनुमान लगाया कि देश में ढाई लाख बांध विस्थापितों का अभी तक पुनर्वास नहीं हुआ है. इनमें 16 हजार ऐसे लोग भी हैं जिन्हें अभी बांध विस्थापित घोषित किए जाने का इंतजार है.

इन परिवारों का दावा है कि जब मॉनसून में बांध का पानी बढ़ता है तो उनके खेत डूब जाते हैं. जबकि बांध के अधिकारी उनका दावा नहीं मानते हैं.

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पानाचंद जैन(राजस्थान हाई कोर्ट), वीडी ज्ञानी, एनके मोदी(दोनों मध्य प्रदेश हाई कोर्ट) और नागामोहन दास(कर्नाटक हाई कोर्ट) के ट्राइब्यूनल ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि सरकार ने बांध के पानी से प्रभावित लोगों की विस्थापित के रूप में पहचान नहीं की.

जस्टिस जैन ने कहा, "हमने पाया कि पुनर्वास दिखाने के लिए सरकार ने दस्तावेज के साथ छेड़छाड़ की. लोगों का बडे पैमाने पर उत्पीड़न हुआ है. उनके मानवाधिकारों का उल्लंघन हुआ है."

पुनर्वास कार्य को पूरा करने के पीछे सरकार की एक बड़ी मजबूरी है. जब तक पुनर्वास नहीं हो जाएगा सरदार सरोवर बांध की ऊंचाई नहीं बढ़ायी जा सकती. जबकि सरकार ऐसा करने के लिए कटिबद्ध है. बांध की मौजदा लंबाई 121 मीटर है, जबकि इसे 138 मीटर करने का आदेश मिल चुका है.

बांद की ऊंचाई बढ़ने से इसमें ज्यादा पानी इकट्ठा होगा और शायद ज्यादा बिजली बन सकेगी. इसलिए इसपर किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि मध्य प्रदेश और गुजरात सरकारें दावा कर रही हैं कि पुनर्वास का काम पूरा हो चुका है.

First published: 7 April 2016, 8:50 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

संवाददाता, कैच न्यूज़. जल, जंगल, पर्यावरण समेत नीतिगत विषयों पर लिखते हैं.

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