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राजधानी से सिर्फ 70 किमी दूर एक गांव के निवासी स्वच्छ पेयजल की आजादी के इंतजार में

निहार गोखले | Updated on: 13 August 2016, 8:51 IST

मानव सभ्यता का विकास नदियों के साथ ही हुआ है. आज देश की राजधानी दिल्ली से मात्र 70 किलोमीटर दूर एक पूरा क्षेत्र नदियों से बेहद डरा हुआ है.

यमुना की सहायक नदी हिंडन उत्तर प्रदेश के बागपत जिले में इतनी जहरीली हो चुकी है कि अब उसके किनारे गांवों में रहने वाले इसके पानी को ‘जहर’ कहने लगे है. जी हां जहर. यह जहर रिसकर भूजल में मिलता है और फिर हैंडपंप के जरिये उनके और उनके पालतू जानवरों के शरीरों में पहुंचता है.

अब यह मामला नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के लिये मुकदमे का विषय है जिसने अबतक तीन बार इन गांवों में स्वच्छ पेयजल की आपूर्ति करने का आदेश दिया है. ऐसा अंतिम आदेश 19 जुलाई को दिया गया था.

कैच ने बागपत का दौरा किया और पाया कि राज्य पूरी तरह से एजनीटी के आदेशों की अवहेलना और अवमानना कर रहा है. वह अभी तक यही तय करने में नाकाम है कि वास्तव में मौके पर कोई संकट है भी या नहीं.

राज्य के प्रशासन द्वारा त्याग दिये गए और दूसरी तरफ राष्ट्रीय राजधानी के साए में पड़ने वाले इस क्षेत्र के लाखों लोग सिर्फ एक गिलास पानी के लिये खौफ के साये में जी रहे हैं. सिर्फ अच्छी आर्थिक स्थिति वाले ही अपने घरों में पानी के फिल्टर लगवाने में कामयाब रहे हैं.

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बागपत के नागरिकों से मेरी सबसे पहली मुलाकात नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की दिल्ली स्थित मुख्य शाखा में हुई. जिले के उत्तरी किनारों पर बसे गांवों के करीब एक दर्जन आदमी और औरत वहां आये थे. मैंने ध्यान दिया कि उनमें से कुछ के पैर, पंजे या फिर रीढ़ की हड्डी विकृत हो चुकी थी. एक की जीभ सूजी हुई थी और दूसरा बामुश्किल खुद को घसीट पा रहा था.

एक एनजीओ के माध्यम से इन्होंने नवंबर 2014 में हिंडन, कृष्णा और काली नदी के कहर से राहत की मांग को लेकर ट्रिब्यूनल का रुख किया था. इनकी याचिका में दावा किया गया था कि इन नदियों का जलस्तर रास्ते में पड़ने वाले 45 प्रकार के उद्योगों द्वारा डाले गए रासायनिक अपशिष्ट से बुरी तरह प्रदूषित हो चुका है.

ट्रिब्यूनल ने प्रदूषण के विस्तृत अध्ययन के आदेश दिये. हालांकि लोगों को तात्कालिक राहत के तौर पर उन्होंने 2015 में दो बार राज्य सरकार को लोगों को टैंकरों या फिर बोतलों के माध्यम से स्वच्छ पेयजल की आपूर्ति का आदेश दिया.

वह 19 जुलाई 2016 का दिन था और पानी अभी तक दूर की कौड़ी है. एनजीटी के अध्यक्ष न्यायमूर्ति स्वतंत्र कुमार ने उत्तर प्रदेश के सरकारी वकील की जमकर खबर ली और अभी तक पानी न उपलब्ध करवा पाने को ‘‘अपमान’’ और ‘‘शासन की कमी’’ तक कहा.

इसके बाद पीठ ने एक आदेश पारित करते हुए राज्य के मुख्य सचिव और तीन अन्य अधिकारियों को अभी तक स्वच्छ पेयजल की आपूर्ति न होने का जिम्मेदार ठहराया. उन्होंने कहा कि अन्यथा उन्हें ‘आक्रामक और दंडात्मक आदेश’ पारित करने पड़ेंगे.

ग्रामीणों के मन में आशा की किरण जगी है. उन्हें लगता है कि एक मुख्य सचिव ऐसा जोखिम नहीं ले सकता. मैंने भी सावधानी के साथ सहमति जताई.

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राष्ट्रीय राजधानी के साए में रहने वाले इस क्षेत्र के लाखों लोग सिर्फ एक गिलास पानी के लिये खौफजदा हैं

9 अगस्त की बादलों से भरी सुबह को मैंने एनजीटी के आदेश की पालना की स्थिति देखने और जानने के लिये पत्रकारों की एक छोटी सी टीम के साथ बागपत की राह पकड़ी. और मेरा डर सच साबित हुआ. ग्रामीणों की आशा की किरण भी मद्धम हो चुकी थी.

ग्रामीण बताते हैं, ‘‘यहां पर न तो कोई टैंकर ही आया है और न ही बोतलबंद पानी. हम अब भी जहर पीने को मजबूर हैं.’’

इसके बाद हम टवेला गढ़ी और तीन गांवों के प्रधान राजीव कुमार के घर पहुंचे. कुमार ही जुलाई के महीने में पीड़ितों को एनजीटी लेकर गए थे.

हम एक कमरे में पहले से ही मौजूद करीब 10 ग्रामीणों के साथ थे और हमारे पानी का विषय उठाते ही सभी अपनी बात कहने लगे.

कैच द्वारा दौरा किये गये तीन गांवों - टवेला गढ़ी, पट्टी बंजारन और सरोरा के लोगों ने कभी पानी का टैंकर तक नहीं देखा. वे अब भी करीब 200 फीट गहरे हैंडपंप से पानी खींचकर पीने को मजबूर हैं. लेकिन इस गहराई पर पानी प्रदूषित नदी के संपर्क में आ जाता है.

उत्तर प्रदेश सरकार एक नई योजना के साथ सामने आई - जो अबतक की उसकी सबसे गंभीर प्रतिक्रिया है - पानी के टैंकों का निर्माण करने की. यह टैंक 500 फीट से पानी का दोहन करेंगे क्योंकि इतनी गहराई का पानी अभी भी पीने के लायक है. कुमार कहते हैं, ‘‘लेकिन इस बात को भी कई साल हो चुके हैं. मैं इन टैंकों के लिये कई प्रस्ताव भेज चुका हूं. यूपी जल निगम ने कोई जवाब नहीं दिया है.’’

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बागपत जिला दिल्ली के उत्तर में स्थित है. जैसे ही हमने राष्ट्रीय राजधानी की सीमा को पार किया राष्ट्रीय राजमार्ग का अधिकांश हिस्सा तारकोल छोड़कर सिर्फ पत्थरों में तब्दील होता गया. सड़क किनारे मौजूद उद्योग और आवासीय परियोजनाएं धीरे-धीरे गन्ने के खेतों में बदल गईं.

एक पूर्वी मोड़ पर प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत बनी एक सड़क हमें टवेला गढ़ी तक ले आई. आगे बढ़ते हुए हमारा सामना ऐसे हैंडपंपों से हुआ जिनपर हाथ से लिखा था कि इनका पानी पीना हानिकारक है. इन्हें अभी तक सील नहीं किया गया है ओर लोग अभी भी इनका पानी पी रहे हैं. कुछ पंपों से टपकती पानी की बूंदें कंक्रीट के बने तल पर बेहद खतरनाक लाल रंग के निशान छोड़ चुकी हैं.

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ऐसी परिस्थितियों में आप सिर्फ कुछ ही चीजों की उम्मीद कर सकते हैं. या तो सरकार यह माने कि वास्तव में मौके पर कोई समस्या है या फिर सबूतों के दम पर उसे खारिज करे.

उत्तर प्रदेश सरकार अब असमंजस की स्थिति में

मार्च 2015 में याचिका दायर होने के करीब 4 महीने बाद एनजीटी में दाखिल शपथ पत्र में बागपत के तत्कालीन जिलाधिकारी धनलक्ष्मी ने कहा था कि हिंडन और दूसरी नदियों में प्रदूषण है ही नहीं और न ही उसका सार्वजनिक स्वास्थ्य पर कोई प्रभाव है.

सरकार का इंकार इतना अधिक भावुक और संपूर्ण था कि इसे कई टुकड़ों में पेश करना पड़ा. पहले पृष्ठ परः

  • ‘‘जवाब के तहत आवेदन में पेश किये गए प्रत्येक कथन से पूर्ण रूप से इंकार करते हैं.’’
  • ’’बागपत जिले के क्षेत्र में इस प्रकार का कोई रोग नहीं मिला है.’’
  • ‘‘रोग को लेकर किसी खतरनाक और गंभीर स्थिति को कहीं कोई उल्लेख नहीं है....’’
  • ‘‘भूजल के नमूने ... प्रदूषण के स्वीकृत मानक के भीतर पाये गए हैं.’’
  • ‘‘क्षेत्र के लोगों को स्वच्छ और सुरक्षित पेयजल के उपयोग के लिये जागरुक करने हेतु सभी संभव कदम उठाये गए हैं.’’
  • ‘‘उपरोक्त प्रस्तुतियों के आधार पर स्पष्ट है कि वर्तमान आवेदन आधारहीन और मेरिट का नहीं है इसलिये इसे तत्काल खारिज किया जाना चाहिये.’’

और सरकार का चाशनी में लिपटा या झूठ एक महीने में ही धराशायी हो गया.

जनवरी 2015 में यूपी जलनिगम द्वारा करवाये गए एक अध्ययन के दौरान कुछ नमूनों में लोहे, सीसे और मैंगनीज की अत्यधिक मात्रा पाई गई. इसके बाद एनजीटी ने उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को एक अध्ययन का जिम्मा सौंपा. बोर्ड ने बागपत जिले से 48 नमूने लिये और सभी अत्यधिक प्रदूषित पाये गए.

पानी जरूरत से ज्यादा भारी था जिसमें कई साॅलिड मिले हुए थे. लगभग सभी नमूनों में सीसा, मैंगनीज और मैंगनीशियम जैसी धातुएं स्वीकार्य सीमा से परे थीं.

दिलचस्प बात यह है कि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने दिसंबर 2014 में एनजीटी में एक हलफनामा दाखिल कर कहा था कि हिंडन नदी का पानी ‘‘प्राथमिक गुणवत्ता के मानकों पर खरा नहीं उतरता है.’’

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पट्टी बंजारन गांव के 300 परिवारों में से 25 से 30 परिवारों के कम से कम एक सदस्य के पैर विकृत हो चुके हैं या फिर उनकी रीढ़ मुड़ चुकी है. कुछ तो ऐसी समस्या से पैदाइश से ही जूझ रहे हैं.

करीब 30 वर्षीय वाशिद बीते करीब 5 सालों से पलंग पर ही पड़े हैं. उन्होंने हाई स्कूल पूरा ही किसा था कि वे बीमार रहने लगे. वे बताते हैं कि सबसे पहले उन्हें दस्त हुए और फिर उसके बाद उनके हाथों और पैरों में ‘‘अकड़न’’ रहने लगी. वे आगे कहते हैं कि मेरठ के एक डाॅक्टर ने उन्हें बताया था कि ऐसा पीने के पानी के चलते हो रहा है.

कुछ ऐसी ही कहानी रीढ़ की हड्डी की समस्या से जूझ रहे 19 वर्षीय सलमान की है.

26 वर्षीय कादिर, जो पैर न होने के चलते घिसटकर चलने को मजबूर हैं के साथ भी यही हुआ.

कुछ ऐसी ही कहानी दो बच्चों की मां निमकी की भी है जिनके पैर बीते एक दशक में मुड़ गए हैं. पुआल, लकड़ी और लोहे के कबाड़ से बनी अपनी झुग्गी दिखाते हुए उनके पति रोहित कहते हैं, ‘‘मैंने इसका इलाज करवाने के लिये अपना जमीन का टुकड़ा बेचकर 1.5 लाख रुपये जुटाए और नतीजा कुछ नहीं. देखिये अब मैं कहां रहता हूं.’’

यहां तक कि खुद ग्राम प्रधान भी बीते साल लीवर की बीमारी की चपेट में आ गए और अब अपने डाॅक्टर की सलाह पर उन्होंने घर में आरओ वाटर प्योरिफायर लगवाया है. वे कहते हैं, ‘‘लेकिन ऐसे सिफ दो-चार घर ही हैं जो आरओ लगवा सकते हैं. यह एक गरीब गांव है.’

हमने जिनसे भी बात की सभी इलाज के लिये मेरठ के एक अस्पताल में जाते हैं जो गांव से करीब 35 किमी दूर है. हालांकि कुछ लोग बड़ौत के तहसील मुख्यालय भी जाते हैं और कोई भी बागपत शहर के जिला अस्पताल का रुख नहीं करता है. प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की हालत यह है कि वे सामान्य बुखार के अलावा शायद ही किसी बीमारी का इलात करने में सक्षम हों.

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बागपत के तत्कालीन जिलाधिकारी द्वारा दाखिल किये गए हलफनामे में जिले के मुख्य चिकित्साधिकारी का एक बयान भी संलग्न है जिसके आधार पर डीएम वहां कोई स्वास्थ्य संबंधी संकट होने से ही इंकार कर रहे हैं. हालांकि यह बयान शारीरिक विेलांगता को दरकिनार करते हुए सिर्फ कैंसर पर जोर देता है. कैंसर के सिर्फ 7 मरीजों का जिक्र करते हुए बयान इसके होने के कारणों को अज्ञात कहते हुए निष्कर्ष भी दे देता है.

हिंडन जैसी उसकी सहायक नदियों के किनारे बसने वाले लोग अपने जीवन को खतरे में डालकर रह रहे हैं

अभी भी ग्रामीणों के सामने पेश आने वाली स्वास्थ्य समस्याओं और प्रदूषकों की प्रकृति को लेकर अध्ययन किया जाना बाकी है. नदी में मौजूद प्रदूषण के पक्ष और विपक्ष में उत्तर प्रदेश सरकार अभी तक खुद भी साबित करने में विफल ही रही है.

एनजीटी में मामला दर्ज करवाने वाली दोआबा पर्यावरण समिति के अध्यक्ष सीवी सिंह कहते हैं कि स्वास्थ्स समस्याओं और प्रदूषकों की प्रवृति पूरी तरह से मेल खाती है.

सिंह हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड में क्लीनिकल बायोकैमिस्ट हैं. दिसंबर 2013 में सेवानिवृति के बाद सिंह ने हिंडन नदी के किनारे के पास बसे अपने पैतृक गांव दाहा का दौरा किया. वहां के पानी को लेकर कुछ शक होने पर उन्होंने पानी के कुछ नमूने एकत्रित किये और उन्हें शिमला प्रयोगशाला में भेजा जो एक प्रमाणिक जल परीक्षण एजेंसी है. वे बताते हैं कि उन्हें वहां से जवाब मिला कि भोजा गया पानी किसी नदी का पानी न होकर रसायनों का एक मिश्रण है.

सिंह ने नए सिरे से नमूने जमा किये लेकिन नतीजा दोबारा वही आया. इसी के बाद उन्होंने गांव वालों को साथ लेकर एक समिति का गठन किया और एनजीटी में मामला दर्ज करवाया.

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9 अगस्त की अपनी यात्रा के दौरान हम पैदल चलकर हिंडन नदी तक चलकर गए. पट्टी बंजारन गांव में गन्ने के घने खेतों के बीच से करीब 400 मीटर की पैदल दूरी.

किनारे के करीब पहुंचने पर एक ग्रामीण ने इशारा करते हुए कहा, ‘‘देखिये, अब तो यहां की जमीन पर चींटियां भी नहीं दिखाई देतीं.’’

वास्तव में नदी का पानी बिल्कुल काला और बदबूदार है. ‘‘एक समय ऐसा था जब आप इस नदी के तल में पड़ा सिक्का भी देख सकते थे.’’ ग्रामीणों को वह समय भी याद है जब वे सीधे इस पानी को पीते थे लेकिन अब तो ऐसा सोचना भी पाप है. ‘‘अब हम जब भी अपने जानवरों के साथ इसके किनारे से गुजरते हैं तो उनके मुंह बांध देते हैं ताकि वे गलती से भी इस पानी को पी न लें.’’

कभी समय था जब इस नदी में कछुए और मछली मिलते थे जिनमें से कोई भी अब रसायनों से चलते नहीं बचा है. अपनी पूरी प्रदूषित महिमा के साथ हिंडन गाजियाबाद में यमुना नदी से मिलती है जो इलाहाबाद पहुंचकर गंगा से मिलती है.

गंगा की सफाई स्वतंत्र भारत के इतिहास मे सबसे लंबे समय तक देखा जाने वाला एक सपना है. आज की तारीख में इसका जिम्मा नमामि गंगे मिशन के हवाले है तो मोदी सरकार के आने के बाद गठित हुए ‘‘गंगा संरक्षण’’ मंत्रालय के अधीन काम कर रहा है.

ऐसा लगता है कि सभी यह भूल गए हैं कि गंगा की कुछ सहायक नदियां भी हैं. गंगा की सफाई के लिये हजारों करोड़ का बजट निर्धारित किया गया है. साथ ही नदी के किनारे बने श्मशान घाटों के पुनरुद्धार की योजना भी काफी वृहद है.

इस बीच हिंडन जैसी उसकी सहायक नदियों के किनारे बसने वाले लोग अपने जीवन को खतरे में डालकर रह रहे हैं. इस विडंबना से आंखें चुराना वाकई काफी मुश्किल काम है.

First published: 13 August 2016, 8:51 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

Nihar is a reporter with Catch, writing about the environment, water, and other public policy matters. He wrote about stock markets for a business daily before pursuing an interdisciplinary Master's degree in environmental and ecological economics. He likes listening to classical, folk and jazz music and dreams of learning to play the saxophone.

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