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सफल नहीं हो पाएगी सरकार की राष्ट्रीय जलमार्ग नीति

निहार गोखले | Updated on: 28 December 2015, 21:09 IST
QUICK PILL
  • सरकार ने मौजूदा पांच के अतिरिक्त 101 नए जलमार्ग को बनाए जाने की योजना बनाई है. हालांकि इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में होने वाले बड़े निवेश को देखते हुए परियोजना के पूरा होने की कम ही संभावना है.
  • प्रत्येक जल मार्ग के लिए कम से कम 4 विभागों से मंजूरियां लेनी होंगी जो अपने आप में बहुत दुरुह प्रक्रिया है. इसके अलावा जलमार्ग परिवहन के दौरान नदियों को प्रदूषण से बचाने के लिए कोई स्प्ष्ट नीति भी सरकार के पास नहीं है.

लोकसभा में 21 दिसंबर को राष्ट्रीय जलमार्ग बिल पारित हो गया. इसमें 101 नदियों के मुहाने और नहरों को जलमार्ग बनाए जाने की घोषणा की गई है. पहले से ऐसे पांच जलमार्ग मौजूद हैं. परिवहन मंत्री नितिन गडकरी का कहना है कि जलमार्गों से सामानों की ढुलाई लागत में कमी आएगी और इससे इंडस्ट्री, किसानों और मछुआरों को मदद मिलेगी. 

उन्होंने यह नहीं बताया कि इसके पूरा होने में कितना लंबा समय लगेगा. राज्यसभा अगर इस बिल को पारित कर देता है तो भी यह अपने आप में बड़ी उपलब्धि होगी. 

जलमार्गों को बनाए जाने और उसे चलाने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में बड़े निवेश की जरूरत होगी

इसके अलावा इसके लिए कई तरह के पर्यावरणीय मंजूरियों की जरूरत होगी. इसके बाद सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि जहाजों की आवाजाही से मछुआरों की आजीविका पर कोई असर नहीं होगा और नहीं नदियां प्रदूषित होंगी. जिस देश में आधे से अधिक नदियां बुरी तरह से प्रदूषित हैं वहां पर्यावरण की नीतियों को सख्ती से लागू करने की जरूरत होगी.

क्या है राष्ट्रीय जलमार्ग?

राष्ट्रीय जलमार्ग नदियों और नहरों का नेटवर्क है जिसका इस्तेमाल जहाजों की आवाजाही में किया जाएगा. जहाजों की आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए सरकार को कार्गो, हब्स, हार्बर्स बनाने के साथ नदियों को गहरा करने का भी काम करना होगा. हालांकि यात्री जहाज की आवाजाही हो सकती है लेकिन अंतर्देशीय जलमार्ग केवल व्यावसायिक जहाजों के लिए तैयार किया गया है.

अंतरदेशीय जलमार्ग भारत में फिलहाल शुरुआती अवस्था में है लेकिन विदेशों में यह आम यातायात का हिस्सा है. अमेरिका में 40 हज़ार किलोमीटर लंबा जलमार्ग है जिसकी मदद से हर साल 73 अरब डॉलर के सामानों की ढुलाई की जाती है. एक अनुमान के मुताबिक सड़क की बजाए जलमार्ग से सामनों की ढुलाई से अमेरिका को सालाना 7 अरब डॉलर की बचत होती है. चीन के पास इससे भी बड़ा जलमार्ग का नेटवर्क है. चीन में 1.1 लाख किलोमीटर लंबा जलमार्ग का नेटवर्क है.

भारत के पास 14,000 किलोमीटर लंबा जलमार्ग बनाने की क्षमता है लेकिन मौजूदा नेटवर्क संभावित नेटवर्क का महज एक तिहाई ही है. इसके अलावा कुल ढुलाई का महज 3 पर्सेंट ही इस रास्ते से ढोया जाता है.

क्यों जरूरत पड़ी विधेयक की

एनडीए सरकार का कहना है कि देश में सड़क और रेल के मुकाबले जलमार्गों को ज्यादा तवज्जो नहीं मिली है. इसलिए सरकार की कोशिश पर्यावरण हितैषी परिवहन मार्ग बनाने की ताकि लागत और ईंधन खर्च में कमी लाई जा सके.

भारत में पहले से पांच जल मार्ग हैं. पहला इलाहाबाद-हल्दिया जलमार्ग जिसकी घोषणा 1982 में की गई थी. वहीं ब्रह्मपुत्र से जुड़े सादिया-धुबरी मार्ग की घोषणा 1988 में की गई थी. वेस्ट कोस्ट कनाल की घोषणा 1992 में की गई जबकि दो अन्य जलमार्गों की घोषणा 2008 में की गई. इन सभी का संचालन इनलैंड वाटरवेज अथॉरिटी ऑफ इंडिया करती है.

बिल में 101 नए जल मार्ग को बनाए जाने की घोषणा की गई है. कुछ प्रमुख नदियों पर बनने वाले प्रस्तावित मार्गों पर एक नजर:

  • साबरमती
  • नर्मदा
  • इंदिरा नहर
  • झेलम
  • महानदी
  • व्यास
  • यमुना

प्रस्ताव की राह में क्या होंगी रुकावटें

  • सभी प्रस्तावित 101 जलमार्गों में से एक को बनाने में कम से कम 10 सालों का समय लगेगा और ऐसे में इस बात की कम ही संभावना है कि यह कभी काम भी कर पाने की हालत में होगा.
  • मौजूदा जलमार्गों को लेकर अभी तक बहुत सफलता नहीं मिली है. पांच में से महज तीन ही चालू है और जो चल रहे हैं उनमें यातायात बेहद कम है. इन मार्गों से सबसे ज्यादा ढुलाई एनटीपीसी करती है जो फरक्का सेक्शन से कोयले की ढुलाई करती है.
  • अगस्त में संसद की स्टैंडिंग कमेटी ने कहा कि इस दिशा में आगे बढ़ने की सबसे गंभीर चुनौती इसकी व्यावहारिकता है. नदियों में जहाज की आवाजाही के लिए पर्याप्त पानी ही नहीं है. ऐसा इसलिए क्योंकि अधिकांश नदियां बरसाती है और इनमें केवल मॉनसून के दौरान ही पानी रहता है.
  • अभी तक सरकार महज 12 प्रस्तावित जलमार्गों को ही व्यावहारिक मान रही है और उसके लिए टेंडर भी जारी कर दिए गए हैं.
  • 44 जल मार्गों के लिए वह व्यावहारिकता रिपोर्ट बनाने की दिशा में विशेषज्ञों को आमंत्रित कर रही है. बाकी बचे 45 के मामले में अभी कोई पहल नहीं की जा सकी है.
  • जब यह पास हो जाएगा तब केवल 101 जलमार्गों को राष्ट्रीय जलमार्ग घोषित कर दिया जाएगा और इसके लिए बजट का आवंटन नहीं होगा. जल मार्गों को बनाने में करीब 35,000 करोड़ से अधिक का बजट आएगा. सवाल यह है कि यह पैसा कहां से आएगा?
  • संसदीय समिति ने यह पाया था कि मौजूदा जलमार्गों पर फंड नहीं होने की वजह से काम रुका रहा. वित्त मंत्रालय ने समिति को बताया कि जलमार्गों को बनाने में भारी खर्च आएगा और वह शुरुआत में कुछ ही प्रोजेक्ट को फंड देने की हालत में है.
  • सरकार विश्व बैंक और एशियाई विकास बैंक से कर्ज ले सकती है लेकिन कर्ज चुकाने के लिए भी पैसों की जरूरत होगी. 
  • जल मार्गों को बनाना कोई अकेली परियोजना नहीं होगी. इसे बंदरगाहों से जोड़ने के लिए सड़क और रेल नेटवर्क की जरूरत होगी. इसके बिना जलमार्गों को बनाए जाने का कोई मतलब नहीं होगा.
  • जलमार्गों को लेकर अलग तरह की अड़चनें होती हैं. जहाजों का रास्ता जहां केंद्र सरकार की जवाबदेही होगी वहीं नदियों का पानी और जमीन राज्य सरकार के क्षेत्राधिकार में आता है.
  • इसके अलावा घाटों और अन्य ढांचों को उस ऊंचाई तक बनाना होगा जहां से जहाज आसानी से पास कर सकें. इसके लिए पुलों को या तो फिर से बनाना होगा या उसे नष्ट करना होगा. बंदरगाहों के लिए जमीन की जरूरत होगी और यह सब कुछ केंद्र और राज्य के समन्वय के बिना नहीं किया जा सकता.
  • पर्यावरण मंत्रालय के मुताबिक प्रत्येक जलमार्ग परियोजनाओं के लिए कम से कम 3-4 पर्यावरणीय मंजूरियों की जरूरत होगी. इसके अलावा कई मामलों में अलग-अलग विभागों से स्वीकृति लेनी होंगी.
  • जहाजों की वजह से नदियां प्रदूषित होंगी. इसके अलावा कोयले की ढुलाई से भी प्रदूषण फैलेगा. सरकार के पास अभी तक यह ऐसी कोई नीति नहीं है जिसकी मदद से वह पर्यावरण हितैषी तरीके से परिवहन को सुनिश्चित कर सके.
  • वास्तव में आईडब्ल्यूएआई ने संसदीय समिति को बताया कि वह इसकी जिम्मेदारी जहाज चलाने वाली कंपनियों को देंगे.
  • इसके बावजूद जलमार्ग लागत के लिहाज से किफायती नहीं होंगे. आईडब्ल्यूएआई ने संसदीय समिति को बताया कि सभी जल मार्गों से होने वाला परिवहन रेल या सड़क मार्ग के मुकाबले सस्ता नहीं होगा. 

एनटीपीसी जलमार्ग से कोयले की ढुलाई करती है और यह अब तक की सफलतम कहानी है लेकिन इससे उसकी लागत में महज 10 फीसदी की ही बचत होती है.

First published: 28 December 2015, 21:09 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

Nihar is a reporter with Catch, writing about the environment, water, and other public policy matters. He wrote about stock markets for a business daily before pursuing an interdisciplinary Master's degree in environmental and ecological economics. He likes listening to classical, folk and jazz music and dreams of learning to play the saxophone.

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