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हिमालय की हरियाली से मंडरा रहा परिंदों पर खतरा

शुभ्रता मिश्रा | Updated on: 9 May 2017, 15:04 IST

हिमालय में जमीन के अत्‍यधिक दोहन के चलते यहां पाई जाने वाले पक्षियों की कुछ प्रजातियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है.

भारतीय वन्यजीव संस्थान, देहरादून के रामनारायण कल्याणरमण और कृष्णमूर्ति रमेश और अमेरिका की प्रिंसटन यूनिवर्सिटी के पॉल आर एलसन व डेविड विलकोवे के एक शोध में यह खुलासा हुआ है. उनका यह शोध कन्‍जर्वेशन बायलॉजी नामक जर्नल में प्रकाशित हुआ है.

आमतौर पर सर्दियों में हिमालय के जंगलों और कृषि भूमि का पक्षियों के प्रजनन के लिए काफी महत्व है. लगभग 80 प्रतिशत पक्षियों में मौसमी प्रवास देखा गया है और साथ ही 60 प्रतिशत से अधिक प्रजातियां प्रजनन के लिए जंगलों पर निर्भर हैं.

भारतीय शोधकर्ताओं ने पाया है कि हिमालय क्षेत्र में ईंधन की लकड़ी, कृषि और चराई के कारण बड़े पैमाने पर वनों की कटाई होने से हिमालयी पक्षियों की बहुलता और विविधता प्रभावित हो रही है.

भारतीय वन सर्वेक्षण (एफएसआई) की 2015 की रिपोर्ट के अनुसार भारत में हिमालयी राज्यों और उनसे जुड़े पहाड़ी क्षेत्रों में सबसे अधिक वनों का नुकसान हो रहा है. फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गनाइजेशन (एफएओ) की 2015 की रिपोर्ट के अनुसार भारत में सालाना लगभग 300 मिलियन घन-मीटर से अधिक ईंधन की लकड़ी काटी जा रही है, जो किसी भी अन्य देश की तुलना में सबसे अधिक है.

 

हिमालय के हरे-भरे जंगल स्‍थानीय पक्षियों के प्रजनन के समय संरक्षण स्थल होते हैं. वहीं, सर्दियों के दौरान बड़ी संख्या में पक्षी कृषि भूमि का भी उपयोग करते हैं. वर्ष 2012-13 में ठंड के मौसम में वनों, कम उपयोग वाले कृषि क्षेत्रों, मिश्रित खेती वाली भूमि और अधिक चराई वाले चरागाहों समेत 12 विशेष क्षेत्रों का सर्वेक्षण करने के बाद शोधकर्ता इस नतीजे पर पहुंचे हैं.

यह सर्वेक्षण मुख्य वन, छोटे-छोटे खेतों वाले बेतरतीब जंगलों, सीढ़ीदार खेती और फलों के बागों वाली कृषि भूमि तथा चरागाहों में किया गया. अध्‍ययन के दौरान पक्षियों की 128 प्रजातियों के बारे में जानकारियां जुटाई गईं.

शोधकर्ताओं ने पाया कि मुख्य वनों में पाई जाने वाली पक्षियों की प्रजातियां अन्य क्षेत्रों में मिलने वाली प्रजातियों से संख्या में कम व अलग हैं. वनों में पांच तथा अलग-अलग कृषि क्षेत्रों में कुल 34 खास प्रजातियां पाई गई हैं.

शोधकर्ताओं के अनुसार कम उपयोग वाले कृषि क्षेत्रों और मिश्रित खेती वाली भूमि में अधिक पक्षी पाए गए, जबकि अधिक चराई वाले स्थानों पर पक्षियों की संख्या में गिरावट हुई है.

शोध परिणाम बताते हैं कि कृषि क्षेत्र का चरागाह के रूप में बहुतायत उपयोग हिमालयी पक्षियों की विविधता के लिए खतरनाक साबित हो सकता है. अध्‍ययनकर्ताओं के अनुसार सर्दियों में पक्षियों को संरक्षित करने के लिए व्यापक वन संरक्षण रणनीति बनाकर हिमालयी वनों का संरक्षण सुनिश्चित करने और कम उपयोग किए जाने वाले कृषि क्षेत्रों को बड़े पैमाने पर अधिक चराई वाले चरागाहों में परिवर्तित होने से रोकना होगा.

(साभारः इंडिया साइंस वायर)

First published: 9 May 2017, 15:02 IST
 
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