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स्मृतिशेष: तालाब-बावड़ियों जितने ही खरे हैं अनुपम मिश्र

अतुल चौरसिया | Updated on: 20 December 2016, 9:09 IST

किसी महात्मा के बारे में कोई कैसे लिख सकता है? यह सवाल मैलविल डी मैलो के सामने यक्ष की तरह खड़ा हो गया था. ब्रिटिश-भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट का पद छोड़ डी मैलो रेडियो उद्घोषक बने थे. उन्होंने गांधीजी की अंतिम यात्रा का आंखों देखा हाल इटालियन, बीबीसी और कुछ अन्य रेडियो सेवाओं के जरिए पूरी दुनिया को सुनाया था. गांधीजी की अंतिम यात्रा का यह रिकॉर्ड पूरी दुनिया में विशिष्ट स्थान रखता है. बाद में उन्हें अपना वही संस्मरण लिखने को कहा गया तब डी मैलो के सामने यह दुविधा उत्पन्न हो गई थी कि एक महात्मा के बारे में कोई कैसे लिख सकता है.

डिमैलो के मुताबिक कुछ परिस्थिति और कुछ भाग्य के कारण उन्हें ऐसी जगह मिल गई थी जहां से वो बापू की अंतिम यात्रा के अंतिम दिन, अंतिम घंटे और अंतिम क्षणों का हृदयविदारक दृश्य देख सके. वह आंसुओं से भरी एक अंतहीन यात्रा था, एक त्रासदी, शोक की एक धारा जिसे व्यक्त करने के लिए शब्द नहीं थे उनके पास.

यह लेख लिखते समय मेरी भी वही दशा हो रही है. लगभग उन्हीं स्थितियों का सामना करना पड़ा. शब्द पकड़ के बाहर थे. भावनाएं हावी हो रही थीं. गांधी शांति प्रतिष्ठान में लोगों का आना-जाना अनवरत जारी था, आंसुओं का सिलसिला रुक नहीं रहा था. यह हमारे वर्तमान के गांधी के जाने का दृश्य था. महात्मा गांधी का शायद सबसे बड़ा अनुयायी जो हमारे बीच से चला गया.

हमारे वर्तमान के गांधी के जाने का दृश्य था. महात्मा गांधी का शायद सबसे बड़ा अनुयायी जो हमारे बीच से चला गया

अनुपम मिश्र का पर्यावरण और पानी पर बिना स्वार्थ किया गया काम किंवदंती बन चुका है. गांव, समाज और हिंदुस्तानियत में सना उनका पर्यावरण और पानी का ज्ञान हमेशा निश्छल भाव से बहता रहा, हमारी नदियां, तालाब, बावड़ियां भले ही सूख गई हों. आज भी खरे हैं तालाब उनकी अमर कृति है. जाने किस-किस भाषा में अनूदित हो चुकी. लेकिन हमेशा उन्होंने इसे कॉपीराइट और रॉयल्टी के चक्करों से मुक्त रखा.

एक पत्रिका के सर्वेक्षण में यह पुस्तक देश की दस सर्वाधिक पढ़ी और प्रसारित होने वाली पुस्तक में शामिल हुई. इसमें रामायण और महाभारत जैसी धार्मिक गाथाएं भी शामिल हैं.

यह 2004 या 05 का साल था. एक स्टोरी के सिलसिले में गांधी शांति प्रतिष्ठान जाना हुआ था. दरअसल पानी पर एक स्टोरी के चक्कर में जलपुरुष राजेंद्र सिंह की तलाश थी. एक मित्र ने कहा अनुपम मिश्र से मिल लो तुम्हारी परेशानी दूर हो जाएगी. परिसर के मुख्य भवन के बगल में मौजूद साधारण से कमरे में फाइलों, किताबों और गांधीजी की ढेर सारी छोटी-बड़ी तस्वीरों के बेतरतीब ढेर के बीच अनुपम मिश्र अपनी कुर्सी पर बैठे थे.

ब्लूलाइन बस के कंडक्टरों की ठेठ हरियाणवी सुनते सुनाते मैं उनके दरवाजे पर पहुंचा था. यहां उनकी मधुर भाषा और आत्मीयता ने हैरत भरी खुशी का संचार किया. जो आदमी अपनी बोली से मन मीठा कर देता था उसके जीवन का अंत कैंसर से हुआ, जाने किस तरह की पीड़ा से वो गुजरे होंगे.

गांधी शांति प्रतिष्ठान स्थित पर्यावरण कक्ष

बातों ही बातों में उनका प्रभाव मन पर छाने लगा था. उनका वृहद व्यक्तित्व उनके विनम्र आचरण से खुद ब खुद स्थापित होने लगा. तब तक उनके बारे में मेरा व्यक्तिगत ज्ञान काफी कम था. पानी, जंगल, पर्यावरण पर उनका सहज देशज ज्ञान देखकर मुझे लगा कि अपने काम का आदमी तो मिल गया. पर जैसे ही मैं उनको लेकर थोड़ा सहज हुआ उन्होंने मुझे चौंका दिया.

पर्यावरण के मुद्दे पर राजेंद्र सिंह की खोज अनुपमजी से मुलाकात की वजह बनी थी. दिमाग में आया कि अपनी स्टोरी के लिए इनसे बेहतर भला कौन हो सकता है. लेकिन उन्होंने तुरंत मना कर दिया. अनुपमजी मीडिया और कैमरे की चकाचौंध से हमेशा दूर रहे. इक्का-दुक्का अवसरों को छोड़कर. अपनी सारी समझ सामने वाले को सौंप कर वे उसे मनचाहे इस्तेमाल की छूट दे देते थे. कुछ खोने या पाने की समस्या से मुक्त. कुछ इस तरह के प्रभाव में उनसे पहली मुलाकात के बाद मैं विदा हुआ.

इसके बाद मुलाकातों का सिलसिला चल पड़ा. उनकी किताब की चर्चा इतनी थी कि हमेशा मन में रहता था कि काश एक प्रति अनुपमजी से मिल जाए. दो या तीन साल बाद उनसे किताब पाने की इच्छा पूरी हुई. उन्होंने बड़े मन से “आज भी खरे हैं तालाब” भेंट की. हमने उनसे किताब पर दस्तखत करवाना चाहा तो उन्होंने एक बार फिर चौंका दिया. 'यह कार्य मैं नहीं कर सकता.' लिहाजा हमने खुद ही अपने हाथ से वह दिन और तारीख अंकित कर लिया. यह किताब एनडीटीवी के रवीश कुमार मांग ले गए. हालांकि बाद में अनुपमजी ने पुस्तक की दूसरी प्रति भी दी, एक बार फिर बिना दस्तखत के.

आज भी खरे हैं तालाब अपनी सरल भाषा, विश्लेषण, रिपोर्ताज और जल ज्ञान पर अब तक की शायद सबसे विश्वनीय रचना है. इस पुस्तक के बारे में एक बात बताना जरूरी है. पर्यावरण, तालाब, पानी के ऊपर इतनी गहरायी से हिंदी में शायद ही कोई पुस्तक उपलब्ध होगी. यह देश-समाज के बारे में उनके सूक्ष्म ज्ञान की गवाही है. आज कोई भी प्रकाशन संस्था, कोई भी व्यक्ति इस पुस्तक को गांधी शांति प्रतिष्ठान को सिर्फ साभार देकर छपवा सकता है, बंटवा सकता है.

देश के साथ ही दुनिया की भी दीगर जुबानों में इस किताब का अनुवाद हो चुका किया है. आज पानी और पर्यावरण की समस्या से जूझ रही देश और राज्य की सरकारें भी इलाज के लिए इस पुस्तक का सहारा लेती हैं. तमाम इलाकों में उनके सुझावों को लागू करके सूखे पड़े जोहड़ों-तालाबों को सदानीरा बनाने का अभियान या तो पूरा हो चुका है या फिर चल रहा है.

“आज भी खरे हैं तालाब” के खरेपन पर हमें अभिमान है. कुछ इस तरह का विनम्र प्रभाव है अनुपमजी का.

First published: 20 December 2016, 9:09 IST
 
अतुल चौरसिया @beechbazar

एडिटर, कैच हिंदी, इससे पूर्व प्रतिष्ठित पत्रिका तहलका हिंदी के संपादक के तौर पर काम किया

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