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एओएल की गड़बड़ियों के बाद भी पर्यावरण मंत्रालय ने आयोजन पर रोक नहीं लगाई

निहार गोखले | Updated on: 10 March 2016, 23:15 IST
QUICK PILL
  • पर्यावरण मंत्रालय अस्थायी ढांचे का हवाला देकर पर्यावरण नियमों के उल्लंघन की स्थिति से बचने की कोशिश कर रहा है लेकिन एनजीटी के आदेश ने इस बात की पोल खोल कर रख दी है.
  • पर्यावरण से जुड़े मामले की समझ रखने वाले वकीलों का कहना है कि ऐसी कई चीजें हैं जिसे पर्यावरण मंत्रालय कानून के दायरे में रहते हुए कर सकता था लेकिन उसने ऐसा करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई.

यमुना के प्रवाह क्षेत्र में आर्ट ऑफ लिविंग के बड़े कार्यक्रम ने नदी की पारिस्थितिकी में हमेशा के लिए बदलाव कर दिया है. विशेषज्ञों और यहां तक कि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने भी अपने बाद के आदेश में इस बात को स्वीकार किया है कि प्रवाह क्षेत्र में काफी कुछ किया जा चुका है.

इसलिए बड़ा सवाल है कि पर्यावरण मंत्रालय कर क्या रहा था?

पूरे मामले में मंत्रालय की तरफ से पल्ला झाड़ लिए जाने के बाद उसकी जबरदस्त आलोचना हो रही है. 9 मार्च को पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर भी इस मामले में पत्रकारों के सवाल का जवाब दिए बिना ही चले गए. उन्होंने आर्ट ऑफ लिविंग के इस मेगा कार्यक्रम को लेकर पूछे गए सवालों में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई.

मंत्रालय अस्थायी ढांचे का हवाला देकर पर्यावरण नियमों के उल्लंघन की स्थिति से बचने की कोशिश कर रहा है लेकिन एनजीटी ने आदेश ने इस बात की पोल खोल कर रख दी है. इसके अलावा वकीलों का कहना है कि ऐसी कई चीजें हैं जिसे मंत्रालय कानून के दायरे में रहते हुए कर सकता था लेकिन उसने ऐसा करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई.

अस्थायी ढांचा

पर्यावरण मंजूरियों को दिए जाने का प्रावधान पर्यावरण सुरक्षा अधिनियम 1986 के तहत आता है और यह सभी मंजूरियां एनवायरमेंट असेसमेंट नोटिफिकेशन 2006 के तहत दी जाती हैं.

लेकिन निश्चित तौर पर हर निर्माण इसके दायरे में नहीं आता है. नोटिफिकेशन में इस बात का विस्तार से जिक्र किया गया है कि किस प्रोजेक्ट को पर्यावरणीय आकलन के दायरे में रखा जाए और किसे नहीं.

पर्यावरण मंत्रालय का कहना है कि अस्थायी ढांचा इस नोटिफिकेशन के तहत नहीं आता है लेकिन वास्तव में ऐसे किसी ढांचे का नोटिफिकेशन में कोई जिक्र नहीं किया गया है.

विशेषज्ञों की माने तो मंत्रालय का इस तरह का तर्क देना सही नहीं है.

पर्यावरण मंत्रालय के नोटिफिकेशन में सभी प्रकार के प्रोजेक्ट्स और गतिविधियों का जिक्र किया गया है. मसलन क्लॉज 8 में 20,000 वर्गमीटर से अधिक क्षेत्रफल में होने वाली गतिविधियों का जिक्र किया गया है जबकि 8 ए  20,000-1.5 लाख वर्गमीटर में होने वाले डिवेलपमेंट गतिविधियों के बारे में निर्देश देता है. वहीं 8 बी में 1.5 लाख वर्गमीटर से अधिक क्षेत्रफल में होने वाले डिवेलपमेंट गतिवधियों का जिक्र किया गया है.

पारिस्थितिकी के लिहाज से संवेदनशील इलाकों में होने वाली निर्माण गतिविधि क्लॉज 8 के तहत आती हैं

हालांकि सभी प्रकार की गतिविधियां इस नोटिफिकेशन के दायरे में नहीं आती है. मसलन रामलीला मैदान में होना वाला कार्यक्रम पर्यावरण मंत्रालय के नोटिफिकेशन के दायरे में नहीं आता है.

ईआईए रिसोर्स एंड रिस्पॉन्स सेंटर के डायरेक्टर पुष्प जैन बताते हैं कि पारिस्थितिकी के लिहाज से संवेदनशील इलाकों में होने वाली निर्माण गतिविधि क्लॉज 8 के तहत आती हैं.

जैन ने कहा, 'ऐसे संवेदनशील इलाकों में होने वाला अस्थायी निर्माण भी ईआईए के नोटिफिकेशन के तहत आना चाहिए.' आर्ट ऑफ लिविंग का कार्यक्रम करीब 28,000 वर्गमीटर के क्षेत्रफल में फैला हुआ है.

पूरा कार्यक्रम दिल्ली डिवेलपमेंट अथॉरिटी की अनुमति पर हुआ है लेकिन ऐसा बताया जा रहा है कि कार्यक्रम की वजह से इसका दोगुना क्षेत्रफल प्रभावित हुआ है.

एक वकील ने बताया, 'लैंडस्केप परती जमीन की तरह दिख सकता है लेकिन यहां की घास और अन्य प्रजातियां प्रवाह क्षेत्र के इकोसिस्टम में अहम योगदान देती हैं.' उन्होंने कहा, 'हम ईआईए के तहत सब कुछ नहीं ला सकते. यहां पूरा मामला प्रवाह क्षेत्र में होने वाले काम को लेकर जुड़ा हुआ है.'

एनजीटी ने न केवल मामले की पुष्टि की है बल्कि उसने यह साफ कर दिया है कि यह पूरा निर्माण क्लॉज 8बी के तहत आता है.

आदेश बताता है, 'पर्यावरण मंत्रालय का रुख नोटिपिकेशन के खिलाफ है जो 50 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्रफल में निर्माण कार्य से जुड़ा है.' 9 मार्च को सुनवाई के दौरान पर्यावरण मंत्रालय ने पूछा कि आखिर इस मामले में आकलन क्यों नहीं किया गया.

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एनजीटी ने मंत्रालय से कहा, 'आपको ऐसा किस आधार पर लगा कि निर्माण अस्थायी है? आप हमारे धैर्य की परीक्षा मत लीजिए.' एनजीटी ने 7 एकड़ से अधिक के इलाके में बने स्टेज का हवाला देते हुए मंत्रालय को फटकार लगाई.

पर्यावरण के मामले की जानकारी रखने वाले वकील संजय उपाध्याय ने कहा कि इस मामले से जुड़े कई पहलू हैं जिसे एनजीटी के समक्ष नहीं रखा गया. इसमें बायोडायवर्सिटी एक्ट के साथ पारिस्थितिकी के लिहाज से संवेदनशील क्षेत्रों का पहलू शामिल है. उन्होंने कहा कि यह इलाका ओखला पक्षी अभ्यारण्य से सटा हुआ है. उन्होंने कहा, 'अगर पर्यावरण मंत्रालय पर्यावरण का ख्याल रख पाने में सक्षम नहीं है तो इससे गलत संदेश जाएगा.'

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First published: 10 March 2016, 23:15 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

Nihar is a reporter with Catch, writing about the environment, water, and other public policy matters. He wrote about stock markets for a business daily before pursuing an interdisciplinary Master's degree in environmental and ecological economics. He likes listening to classical, folk and jazz music and dreams of learning to play the saxophone.

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