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विशेषज्ञों का दावा, बीबीसी की काजीरंगा नेशनल पार्क की रिपोर्ट गलत

आकाश बिष्ट | Updated on: 18 February 2017, 9:08 IST
कैच न्यूज़

बीबीसी के दक्षिण एशिया रिपोर्टर जस्टिन रॉलेट ने असम के काजीरंगा नेशनल पार्क पर हाल ही ‘आर वर्ल्ड: किलिंग फॉर कंजर्वेशन’ नाम से डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाई है. डॉक्यूमेंट्री और उसकी रिपोर्ट में पार्क के वनपालकों पर आरोप है कि वे अवैध शिकार का इलजाम लगाकर मासूमों को मार रहे हैं. डॉक्यूमेंट्री में दावा है कि वनपालकों को ‘गोली चलाने और मारने के अधिकार दे दिए गए हैं, जबकि आमतौर पर मुश्किल परिस्थितियों में ही शिकारियों के खिलाफ हथियार इस्तेमाल करने की इजाजत दी जाती है.’

पर्यावरण और वन मंत्रालय ने बीबीसी की इस रिपोर्ट को ‘निहायत गलत’ बताया. नेशनल टाइगर कंजर्वेटिव अथॉरिटी (एनटीसीए) ने एक अधिकारिक ज्ञापन-पत्र देकर इस रिपोर्ट के लिए जिम्मेदार बीबीसी पत्रकार को ब्लैकलिस्ट करने को कहा. एनटीसीए ने बीबीसी के दक्षिण एशिया ब्यूरो को कारण बताओ नोटिस भी जारी किया है. उसका दावा है कि इस रिपोर्ट से शिकारियों को प्रोत्साहन मिलेगा, और शुरू में जो कहानी बताई गई थी, वह टेलीकास्ट हुई कहानी से अलग थी.

ऊंचे दामों पर गैंडे के सींग

असम में वन्यजीव विशेषज्ञ और पूर्व वन अधिकारियों ने इस रिपोर्ट की तीखी आलोचना की है. उनका दावा है कि रिपोर्टर ने इस धारणा से डॉक्यूमेंटरी बनाई है कि वनपालक स्थानीय लोगों को बेरहमी से मौत के घाट उतार रहे हैं. उनका दावा है कि गैंडे के सींगों की इतनी मांग है कि उसे पाने के लिए शिकारी हर जोखिम उठाने को तैयार हैं, भले ही वनपालकों की गोलियां ही क्यों ना खानी पड़ें. उन्होंने बुधवार की घटना का उदाहरण दिया, जब एक वयस्क नर गैंडे को मार कर शिकारी सींग ले भागे. शिकारियों ने सींग काटने से पहले गैंडे को एके-47 से मारा था.

एशियन राइनो फाउंडेशन के विबोध तालुकदार ने कहा, ‘ऊंचे दामों के कारण गैंडे के सींग अवैध वन्यजीव बाजार में बिकते हैं. सभी तरह के समाज-विरोधी तत्व आसानी से पैसा कमाने के लिए अपनी किस्मत आजमा रहे हैं. बीबीसी ने सही तस्वीर पेश नहीं की है और इस खबर से शिकारियों को निश्चित रूप से प्रोत्साहन मिलेगा. वन विभाग का मनोबल भी कमजोर पड़ेगा, जिसने काजीरंगा के वन्यजीव संरक्षण को सफल बनाने में काफी मेहनत की है.’

तालुकदार ने यह भी दावा किया कि काजीरंगा को वन विभाग इन शिकारियों से बेहतर जानता है और उसी के अनुरूप घात लगाते हैं. उनके मुताबिक शिकारी, यदि घात लगाई जाती है, अंधाधुध गोलियां चलाते हैं और इसी तरह वन विभाग भी. ‘अपने घर में मुझे औरों से ज्यादा फायदा होगा, और यही आमतौर पर होता है.’

डब्ल्यूटीआई: पक्षपाती रिपोर्ट

वाइल्ड लाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया (डब्ल्यूटीआई) के भास्कर चौधरी ने डॉक्यूमेंट्री और रिपोर्ट को हास्यास्पद बताया. उनका दावा था कि काजीरंगा में सुरक्षा भारत के अन्य नेशनल पार्कों से कहीं ज्यादा है. यही वजह थी कि यहां गैंडों का संरक्षण सफल हो सका.

भारत में गैंडों के संरक्षण के लिए डब्ल्यूटीआई सबसे आगे रहा है. वे इनके बिछुड़े और अनाथ हुए बच्चों को वापस वनों में लाते रहे हैं. चौधरी पशु चिकित्सक हैं. वे घायल गैंडों का इलाज भी करते रहे हैं. उनका दावा था कि इतनी मौतों के बाद भी शिकारी शिकार करने से बाज नहीं आए हैं, जैसाकि बुधवार की घटना से स्पष्ट है.

बीबीसी रिपोर्टर की आलोचना करते हुए भास्कर ने कहा कि डॉक्यूमेंटरी में जिन दो मामलों का जिक्र किया गया है, उनसे सिद्ध नहीं होता कि वनपालों ने मासूम लोगों को मारा. उन्होंने कहा, ‘गोआनबुराह कुख्यात शिकारी था. क्या आप उनके पिता से उम्मीद करते हैं कि वे अपने बेटे को शिकारी मानें? बीबीसी की पूरी रिपोर्ट पक्षपातपूर्ण है.’

आकाश ओरांग के मामले का जिक्र करते हए चौधरी ने कहा कि वे उस समय गलती से मारे गए, जब एक स्थानीय वासी का पीछा करते एक राइनो को वनपाल भगा रहे थे. चौधरी ने आगे कहा, ‘क्या वन विभाग ने क्षतिपूर्ति का भुगतान नहीं किया? किसी मासूम लडक़े को भला वनपाल क्यों मारेंगे? ये वनपाल स्थानीय हैं और उन्हें समाज में रहना है. यदि वे मासूम लोगों को मारेंगे, तो उन्हें समाज की नाराजगी का सामना करना पड़ेगा. महज इन दो मामलों को बताकर बीबीसी काजीरंगा-संरक्षण की सफलता का मजाक नहीं बना सकती.’

पूर्व रेंजर का पक्ष

कैच ने पूर्व काजीरंगा रेंज अधिकारी बीएम तालुकदार से भी बात की, जिनकी टीम ने कई शिकारियों को मारा है. उनका दावा था कि यह सारी कारगुजारी उन लोगों की है, जो काजीरंगा-सरंक्षण की कहानी को बदनाम करना चाहते हैं.

उन्होंने आगे कहा कि हर सरकारी विभाग के नियम होते हैं, पर लोगों को मारने की हद तक नहीं. शिकारियों की कार्य-प्रणालीके बारे में बताते हुए तालुकदार कहते हैं, वे कभी 3 से कम और 6 से ज्यादा के ग्रुप में नहीं आते. ‘हर ग्रुप के पास एक निशानची है, जो नागा, मणिपुरी या कार्बी आंगलांग का चरमपंथी हो सकता है. उसके पास एक स्थानीय गाइड और सींग काटने के लिए दो-तीन मजदूर होते हैं.’

उन्होंने आगे कहा, ‘पिछले कुछ वर्षों में शिकारी और ज्यादा व्यवस्थित हो गए हैं और उनके पास अत्याधुनिक हथियार हैं. पहले वे कारबाइन काम में लेते थे, फिर साइलेंसर और अब एके-47 काम में लेते हैं. इन्हें वे चरमपंथी संगठनों से लेते हैं.

तालुकदार ने बतौर रेंजर वाले दिन याद करते हुए कहा कि कभी ऐेसा समय था जब वे पार्क में यूं ही घूमने वाले लोगों को पकड़ लेते थे. उन्होंने कहा, ‘हम उन्हें मारते नहीं थे. गलत पहचान का कभी कोई मामला नहीं था. केवल देखने मात्र से आप नहीं कह सकते कि वह शिकारी है. हम तभी गोली चलाते हैं, जब सामने से चलाई जाती है. इसके अलावा वन विभाग की ओर से कोई घात है, तो स्थानीय भाग जाते हैं क्योंकि वे वन के बारे में जानते हैं. घात में आमतौर पर बाहरी व्यक्ति मारा जाता है.’

उन्होंने आगे कहा, उन शिकारियों को मारने की बजाय, उन्हें पकडऩा ज्यादा समझदारी होगी, ताकि उनके लिंक्स का पता चल सके और उस पर कार्रवाई की जा सके. इसके अलावा यदि कोई संदेहास्पद तरीके से पार्क में घूमते हुए पाया जाता है, तो वह या तो शिकारी है या कोई पागल. उन्होंने कहा, ‘पर हम उन पर गोली नहीं चलाते और पूछते हैं कि वे कौन हैं. यदि ऐसा नहीं होता, तो हजारों मारे जाते क्योंकि वन में लोग ईंधन की लकडिय़ां या अन्य चीजों के लिए भी आते हैं .’

सभी विशेषज्ञों की एक राय थी कि यदि यह इतना ही बड़ा मुद्दा होता, तो काजीरंगा के लोग क्यों नहीं उठाते? वे मानते हैं कि बीबीसी इस मुद्दे को अनावश्यक रूप से उछाल रही है. इस तरह के दावे करने से पहले उन्हें दूसरों से बात कर लेनी चाहिए थी.

राज्य सरकार क्या करे?

काजीरंगा के वन विभाग पर बेरहमी से मारने का आरोप पहली बार नहीं लगा है. पहले भी कुछ रिपोर्टों का दावा था कि अज्ञात कारणों से मासूम मारे गए. यह सुनिश्चित करने के लिए कि शिकारियों को किसी व्यक्तिगत या राजनीतिक दुश्मनी से नहीं मारा जाता, राज्य सरकार पक्का करे कि मामले के हर पहलू की तफ्तीश की गई है, और एक सींग वाले गैंडे को बचाने के प्रयास में कोई मासूम नहीं मारा गया है.

सरकार को खुफिया जानकारी जुटाने की व्यवस्था में सुधार करना होगा, ताकि सींग के लिए किसी गैंडे का शिकार नहीं हो सके. अन्यथा संरक्षण की सफलता की कहानी इंसानी जीवन की कीमत पर लिखी जाएगी और स्थानीय लोग वन विभाग के खिलाफ हो जाएंगे. ऐसे में इस विरल पशु की रक्षा नहीं हो सकेगी.

First published: 18 February 2017, 9:08 IST
 
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