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एनजीटी रिपोर्टः आर्ट आॅफ लिविंग ने यमुना किनारे को बर्बाद किया

कैच ब्यूरो | Updated on: 7 February 2017, 8:24 IST

नेशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल (एनजीटी) द्वारा नियुक्त एक समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि मार्च 2016 में आयोजित आर्ट आॅफ लिविंग फाउंडेशन (एओएलएफ) के सांस्कृतिक कार्यक्रम के कारण दिल्ली में यमुना के तटीय इलाके की पारिस्थितिकी को गहरा नुकसान पहुंचा है. समिति की पूरी रिपोर्ट जल्द ही एओएलएफ और मामले से जुड़े दूसरे पक्षों को भी भेजी जाएगी.

रिपोर्ट के निष्कर्षों के मुताबिक आर्ट आॅफ लिविंग को भारी जुर्माना भरना पड़ सकता है. पांच करोड़ रूपए का जुर्माना वह पहले ही अदा कर चुका है. यह जुर्माना दरअसल पर्यावरण क्षतिपूर्ति शुल्क के तौर पर लिया जाता है. एनजीटी पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने के एवज में यह जुर्माना वसूलती है. इस राशि का इस्तेमाल पुनः पर्यावरण की वास्तविक स्थिति की बहाली के लिए किया जाता है.

आर्ट आॅफ लिविंग से जो पांच करोड़ रुपए लिए गए वह यमुना तट पर कार्यक्रम के आयोजन की अनुमति के एवज में जुर्माने के तौर पर लिए गए. अब अगर समिति की रिपोर्ट के अनुसार नुकसान की कीमत पांच करोड़ से ज्यादा आती है तो आर्ट आॅफ लिविंग को बाकी की रकम भी अदा करनी होगी.

हां के पर्यावरण पर निर्भर पेड़-पौधों, पक्षियों और मछली प्रजाति को भी नुकसान पहुंचा है

यमुना जिये अभियान के मनोज मिश्रा के नेतृत्व में पर्यावरणविदों द्वारा आर्ट आॅफ लिविंग कार्यक्रम का विरोध किए जाने पर एओएलएफ ने कोर्ट शरण ली थी. विरोध करने वालों का आरोप था कि कार्यक्रम से यमुना के तटों को भारी नुकसान हुआ है. 

उन्होंने आरोप लगाया कि इसके बाढ़ रोधी तटों को सपाट करके सात एकड़ क्षेत्र में कार्यक्रम का स्टेज, पार्किंग एरिया और साढ़े तीन करोड़ लोगों के बैठने की व्यवस्था की गई. इस वजह से क्षेत्र में भूजल दोहन की क्षमता प्रभावित हुई और दिल्ली को बाढ़ से बचाने की भी. इसके अलावा यहां के पर्यावरण पर निर्भर पेड़-पौधों, पक्षियों और मछली प्रजाति को भी नुकसान पहुंचा है.

एओएलएफ ने हालांकि किसी तरह का नुकसान करने से इनकार किया. फाउंडेशन ने एक शपथ पत्र जारी करके कहा कि आयोजन स्थल को बाढ़ रोधी के तौर पर चिन्हित नहीं किया गया था.

एनजीटी ने एओएलएफ, मिश्रा और अन्य पक्षों को मामले में जवाब देने के लिए तीन सप्ताह का समय दिया है. समिति की अध्यक्षता प्रशासनिक अधिकारी शशि शेखर कर रहे हैं और कुछ पर्यावरणविद एवं बाढ़ विशेषज्ञ इसके सदस्य हैं.

एनजीटी द्वारा 28 सितंबर को मामले की सुनवाई की जाएगी

नोएडा के रहने वाले पक्षी प्रेमी याचिकाकर्ता आनंद आर्य की दलील है कि इन मैदानों के बर्बाद होने का सबूत इस बात से मिलता है कि अब यहां पानी का असामान्य ठहराव देखा जा सकता है जो पूर्व में नहीं था. आर्य ने कहा,ऐसा केवल तभी होता है, जब यमुना में हथिनीकुंड का पानी छोड़ा जाता है और वह बहाव बिंदु से ऊपर बहने लगती है.

आर्य ने कहा, 'अगर पानी की कीमत 15 पैसे प्रति लीटर लगाई जाए तो भूजल दोहन के अभाव में शहर का सालाना 20 करोड़ रूपए का नुकसान हो रहा है.'

एओएलएफ के प्रवक्ता जयदीप नाथ ने कहा, 'एनजीटी समिति अपने एक सदस्य सीआर बाबू की वजह से एकतरफा रवैया अपना रही है. उन्होंने समिति के जायजा लेने का काम पूरा होने से पूर्व ही दिए साक्षात्कार में फाउन्डेशन के खिलाफ बयान दिया था.'

नाथ ने उस पत्र का भी हवाला दिया जो समिति प्रमुख शशि शेखर ने एनजीटी अध्यक्ष को लिखा था, उसमें कहा गया था कि समिति ने 120 करोड़ के नुकसान का आकलन बिना किसी वैज्ञानिक आधार के किया है. हमें लगता है कि समिति एकतरफा पक्ष को ध्यान में रख रही है और हम अपनी इस बात पर कायम हैं.

First published: 12 August 2016, 8:23 IST
 
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