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आर्ट ऑफ किलिंग: श्री श्री रविशंकर ने यमुना को 10 साल पीछे धकेल दिया

मेधा पाटकर | Updated on: 19 August 2016, 13:42 IST

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) द्वारा नियुक्त की गई विशेषज्ञों की समिति ने स्पष्ट रूप से खुलासा किया है कि इस वर्ष मार्च में दिल्ली में आयोजित हुए 'आर्ट ऑफ लिविंग' के कार्यक्रम के बाद यमुना नदी के तटीय क्षेत्र (फ्लडप्लेन) को भारी नुकसान पहुंचा है. इस कार्यक्रम के मुख्य स्थान के लिए यमुना के पूरे फ्लडप्लेन का इस्तेमाल किया गया था, जिससे वहां मौजूद जैवविविधता को इस कदर हानि पहुंची है कि अब वह वापस नहीं लौट सकती! जाहिर है पर्यावरण के लिहाज से यह तथ्य वाकई चिंताजनक है.

जब यह कार्यक्रम आयोजित होने वाला था तभी ये तथ्य सामने आ रहे थे कि यमुना किनारे पर्यावरण और जैव विविधता को नुकसान पहुंचाया जा रहा है पर 'आर्ट ऑफ लिविंग' के संस्थापक श्री श्री रविशंकर कहते रहे कि वे तो इको-फ्रेंडली ढंग से ही कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं.

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जबकि ऐसी रिपोर्ट आई थी कि यमुना के तटीय क्षेत्र में अवैध अतिक्रमण किया गया है और इसका गंभीर प्रभाव पड़ने वाला है. उस वक्त जिन वकीलों ने इसके खिलाफ मामला दर्ज कराया था, उन्होंने भी यमुना को नुकसान की बात पर जोर दिया था.

एनजीटी की रिपोर्ट उस वक्त यमुना को होने वाले नुकसान के पक्ष में दिए गए तथ्यों का समर्थन करती है. यह रिपोर्ट सच साबित करने वाली रिपोर्ट है. एनजीटी ने श्री श्री के संगठन पर जुर्माना भी लगाया था और उन्होंने बड़े मुश्किल से पांच करोड़ रुपए दिए थे.

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दरअसल, यह पूरा मामला बताता है कि हमारे देश में नदियों के बहाव क्षेत्र की कोई अहमियत नहीं समझी जाती है और न ही समझने का प्रयास हो रहा है. सरकारों द्वारा इस तरह की जो भी मंजूरी दी जाती है, वे इसके प्रभावों को ध्यान में ही नहीं रखती हैं, मसलन, हाल ही में आंध्र प्रदेश में अमरावती नदी के बहाव क्षेत्र पर अतिक्रमण का बड़ा मामला सामने आया. हमें समझना होगा कि बहाव क्षेत्र के बर्बाद होने से नदियों में आने वाली बाढ़ का बड़ा बुरा असर होता है.

गुजरात में नर्मदा नदी में भी यही हो रहा है. इसके बहाव क्षेत्र को भी खत्म किया जा रहा है. इससे नदी का जो मौजूदा डूब क्षेत्र है, वह उससे ज्यादा हो जाएगा. जिससे खतरा बढ़ जाएगा. यमुना नदी किनारे हुए आर्ट ऑफ लिविंग कार्यक्रम पर एनजीटी की रिपोर्ट ने पर्यावरण को होने वाले नुकसानों के लिए जिम्मेदार सरकारी तंत्र और रसूखदारों के गठजोड़ की पोल फिर खोल दी है. अक्सर देखने में आता है कि पर्यावरण को हानि पहुंचाने वाले कारपोरेट और रसूखदारों के खिलाफ या तो सरकारी जांच नहीं होती. अगर होती है तो कोई सख्त कार्रवाई नहीं होती.

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एनजीटी की रिपोर्ट के बाद अब 'आर्ट ऑफ लिविंग' के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए. खुद श्री श्री रविशंकर ने हलफनामा दिया था कि एनजीटी की अंतिम रिपोर्ट के आधार पर वे सब कुछ सही मान लेंगे. पर गलतियां सरकारी स्तर पर ज्यादा है. ऐसी रिपोर्टस तो बनवा ली जाती हैं पर नुकसान के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई नहीं होती.

जब तक पर्यावरण के बचाव के लिए समाज की सक्रिय भागीदारी नहीं होगी नदियां, नहरें और पारिस्थितिकी तंत्र को नष्ट किया जाता रहेगा. आखिर नदियों के बहाव क्षेत्र के नष्ट होने का खामियाजा भी आम नागरिकों को ही भुगतना पड़ेगा न कि कार्यक्रम के आयोजकों को.

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कानून का उल्लंघन कर और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाकर आयोजित हो रहे कार्यक्रम में जब खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही हिस्सा लेने जाएेंगे तो समाज में क्या संदेश जाएगा? इससे तो यही माना जाएगा कि कानून के इस उल्लंघन को प्रधानमंत्री ने मौन स्वीकृति दी थी.

गलती दिल्ली सरकार की भी बराबर की रही है. एनजीटी की आपत्तियों के बावजूद मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कार्यक्रम का समर्थन किया. एनजीटी द्वारा आर्ट ऑफ लिविंग के खिलाफ इस मामले की फौरन व्यवस्थित सुनवाई होनी चाहिए और इस रिपोर्ट के आधार पर अपना फैसला देना चाहिए. ताकि रसूखदारों को सख्त संदेश मिले.

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हालांकि यह कोई इकलौता मामला नहीं है. कई जगह बड़े-बड़े धार्मिक स्थल नदियों के किनारे कानून का उल्लंघन कर बनाए गए हैं. तालाबों, नालों को पाटकर भवन बनाए गए हैं. पर्यावरण को झटका पहुंचाने वाली परियोजनाओं को खुद सरकारें आगे बढ़ाती हैं. उन्हें कोरे विकास की तो चिंता है पर पर्यावरण की नहीं.

सरकारें कहती हैं कि जो परियोजनाएं रोकी गई हैं, उनको आगे बढ़ाया जाएगा. पर वे यह नहीं बतातीं कि किस तरह कानून का उल्लंघन करके, पर्यावरण को हानि पहुंचाकर विकास हो रहा है. यह अंधा विकास समाज के लिए विनाशकारी साबित हो रहा है. यह विनाश राजनीतिक शह पर हो रहा है.

आज कोई किसान खेत का पेड़ काटे तो वह आपराधिक कार्य है और गंगा को प्रदूषित करने वाले, यमुना व नर्मदा की जैव-विविधता को नुकसान पहुंचाने वाले, अन्य नदियों के बहाव क्षेत्र को खनन से खोखला करने वाले बचे रहते हैं.

First published: 19 August 2016, 13:42 IST
 
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