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जीएम सरसों और तिलहन पर पड़ने वाले असर का आकलन

निहार गोखले | Updated on: 11 September 2016, 7:37 IST

जेनेटिकली मॉडीफाइड यानी संशोधित जीन वाली सरसों के समर्थकों का तर्क है कि उच्च तकनीक के बीजों को काम में लेने से भारत में सरसों का उत्पादन बढ़ेगा और खाद्य तेल के आयात पर आने वाले 65,000 करोड़ रुपए के खर्च को कम करने में मदद मिलेगी.

इस खर्चे और उसके इतिहास पर गहराई से नजर डालें तो पता चलता है कि उनके इस तर्क का कोई आधार नहीं है. दरअसल आयात बिल से यह तथ्य सामने आता है कि किस तरह भारत की खाद्य तेलों में आत्मनिर्भरता 1991 के आर्थिक सुधारों और विश्व व्यापार संगठन में शामिल होने से कम हो गई है.

इन सुविधाओं से सरसों और श्वेत सरसों के उत्पादकों सहित तिलहन के किसानों को भारी नुकसान हुआ है. आयात बिल इस बात का भी सूचक है कि भारत के सरसों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार और खाद्य तेलों के लिए बनाई गई सरकार की त्रुटिपूर्ण नीतियां भी जिम्मेदार हैं, जो तेल निकालने की पूरी इंडस्ट्री को प्रभावित कर रहा है. यह वह समस्या है, जिसका समाधान जीएम तकनीक में कम और व्यापार नीति को सुधारने में ज्यादा है.

कहानी की शुरुआत 1980 के दशक में हुई थी, जब भारत ने तिलहन तकनीक के लिए एक मिशन लागू किया था. इसने तिलहन के उत्पादन में उस हद तक वृद्धि की कि भारत लगभग आत्मनिर्भर बन गया था.

हालात तब बदले जब सरकार ने 1994 में तिलहन के आयात-निर्यात को सहज बनाना शुुरू किया. यह सरलीकरण 1991 में कांग्रेस सरकार द्वारा शुरू किए वृहद आर्थिक सुधार के हिस्से के तहत हुआ. आयात ड्यूटी पर सहजता भी विश्व व्यापार संगठन में शामिल होने की शर्तों के अनुरूप था.

यह उस समय हुआ, जब भारत और विदेशों में सरसों के भावों में काफी बड़ा अंतर था

यह उस समय हुआ, जब भारत और विदेशों में सरसों के भावों में काफी बड़ा अंतर था. मसलन, 1994-1997 के दौरान जब भारत में एक टन श्वेत सरसों की कीमत 839.3 से 962.3 डॉलर थी, तब इसके अंतरराष्ट्रीय भाव लगभग 557-617 डॉलर प्रति टन थे. इस तरह सरसों के भारतीय किसान मार्केट से बाहर हो गए.

1999 में एशिया और प्रशांत के लिए संयुक्त राष्ट्र का आर्थिक और सामाजिक आयोग की एक सहायक संस्था के अध्ययन का अनुमान था कि सरसों के आयात में उदारीकरण से भारत में किसानों को मिलने वाला शुद्ध लाभ 25 फीसदी घट गया.

2006 में राजस्थान के अर्थशास्त्री एनसी पहरिया के एक अध्ययन के मुताबिक, 'उदारीकरण से सरसों के स्थानीय भावों में आई गिरावट से किसानों को 1.09 लाख करोड़ रुपए का नुकसान हुआ. सस्ते भावों ने उपभोक्ताओं को 1.17 लाख करोड़ का फायदा दिया, मतलब समग्र अर्थव्यवस्था को शुद्ध लाभ किसानों की कीमत पर हुआ. राजस्थान के किसान बुरी तरह प्रभावित हुए थे.'

पहरिया ने अपनी रिपोर्ट में आगे लिखा, ‘अंतरराष्ट्रीय भावों से स्थानीय भाव ज्यादा होने की एक वजह यूरोपीय देशों के खाद्य तेल निर्यातक देशों में उत्पादकों को दी गई उच्च स्तरीय आर्थिक सहायता नजर आती है. हालांकि कुछ इनपुट सब्सिडीज भारत के उत्पादकों को भी दी जाती है. तिलहन के लिए दी गई इनपुट सब्सिडीज बहुत कम है.’

उनके मुताबिक, 1999 में तिलहन के किसानों को दी जाने वाली इनपुट सब्सिडी चावल उत्पादकों से महज चौथाई थी. हैरानी की बात नहीं है, यदि कहा जाए कि 1998 में ही भारत दुनिया में खाद्य तेलों का सबसे बड़ा निर्यातक बनने के लिए आत्मनिर्भरता खो चुका था.

पर हाल में सरकार जीएम सरसों को प्रोत्साहित करने के लिए जो जल्दबाजी कर रही है

इस बीच, भारत की सरसों पैदा करने वाली 6 मिलियन हेक्टेयर जमीन निष्क्रिय पड़ी रही. तिलहन और खाद्य तेलों की स्थानीय उपज धीमी रही, 26 मिलियन टन तिलहन से कुल आठ मिलियन टन तेल निकाला गया.

खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय के अनुसार भारत से खाद्य तेलों का निर्यात 2005 से 2015 में तिगुना लगभग 12 मिलियन टन हो गया. तिलहन का 65,000 करोड़ रुपए का बिल भी 2010-2011 से दुगुना और 2009-2010 से चौगुना है.

पर हाल में सरकार जीएम सरसों को प्रोत्साहित करने के लिए जो जल्दबाजी कर रही है, वह इसलिए क्योंकि सरकार की गलत आयात ड्यूटी इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे देशों से सस्ते पाम के तेल के आयात को प्रोत्साहित करती है.

भारत में बीज पर आयात ड्यूटी कच्चे खाद्य तेल से ज्यादा है, और यह ड्यूटी रिफाइंड तेल से ज्यादा है. जैसा कि कृषि लागत एवं मूल्य आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है, यह ‘सही अर्थशास्त्रीय सिद्धांत’ के विरुद्ध है, जहां रिफाइंड तेल पर सबसे ज्यादा ड्यूटी है, इसके बाद कच्चे तेल पर, फिर बीज पर, जिससे स्थानीय उद्योगों को प्रोत्साहन मिलता है.

बजाय इसके हो यह रहा है कि उद्योगों के लिए आयातित बीज बहुत महंगे हैं, जबकि तेल विक्रेता स्थानीय निर्माताओं के बिना रिफाइंड किया तेल सीधा आयात कर रहे हैं.

इस संगठन के मुताबिक भारत में रिफाइंड ताड़ के तेल का आयात एक साल में 225 फीसदी बढ़ गया है

खाद्य तेलों पर ड्यूटी 12.5 फीसदी है, जिसकी वजह से रिफाइंड तेल को आयात करना अपने आप सस्ता है. तिलहन के आयात पर ड्यूटी लगभग 20 फीसदी है. इन निर्माताओं का उद्योग संगठन- सोल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने इसे 5-10 फीसदी करने की मांग की है.

इस संगठन के मुताबिक भारत में रिफाइंड ताड़ के तेल का आयात एक साल में 225 फीसदी बढ़ गया है क्योंकि यह कच्चे खाद्य तेल से काफी सस्ता है. कई रिपोर्टों के मुताबिक इस साल खली का निर्यात 94 फीसदी घट गया, क्योंकि पिछले साल इंडस्ट्री अपनी क्षमता का महज 30 फीसदी चल रही थी.

कृषि विश्लेषक देविंदर शर्मा ने कहा, ‘आयात बिल को कम करना उत्पादन का प्रश्न नहीं है, बल्कि व्यापार नीति का है. सस्ते आयात के कारण, किसान और व्यवसायी दोनों बिजनेस से बाहर हो रहे हैं.’

अपनी बात जारी रखते हुए वे आगे कहते हैं, ‘त्रासदी यह है कि हम विश्व व्यापार संगठन के एहसानों से सोया को छोड़कर तिलहन पर 300 फीसदी ड्यूटी थोप सकते हैं.’

पुनश्च: आज, सरसों के स्थानीय भाव अंतरराष्ट्रीय कीमतों से 27 फीसदी ज्यादा हैं. बावजूद इसके कि इंडस्ट्रीज अपनी क्षमता से कम चल रही हैं, कृषि लागत और मूल्य आयोग की 2016-17 की रबी फसलों पर रिपोर्ट के मुताबिक भारत सरसों का निर्यात कर रहा है (हालांकि कम मात्रा में), जबकि बीजों का आयात बिलकुल नहीं है.

यदि जीएम सरसों सच में भारत में सरसों का उत्पादन बढ़ा सकता है, तो वास्तव में क्या बदलेगा?

First published: 11 September 2016, 7:37 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

Nihar is a reporter with Catch, writing about the environment, water, and other public policy matters. He wrote about stock markets for a business daily before pursuing an interdisciplinary Master's degree in environmental and ecological economics. He likes listening to classical, folk and jazz music and dreams of learning to play the saxophone.

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