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सूखे का धंधा

गुलाब कोठारी | Updated on: 21 May 2016, 18:45 IST
QUICK PILL
आज पानी की जो त्राहि-त्राहि मची है, वह पानी की कमी से नहीं पैदा हुई है. आप हर बरसात के पानी की मात्रा निकालेंगे, उसमें कितना पड़ोसी राज्यों से बहकर आता है, कितना वर्षा के पूर्व हमारे संग्रह में रहता है, इन आंकड़ों पर दृष्टि डालेंगे तो दंग रह जाएंगे.
राजस्थान पत्रिका समूह के एडिटर इन चीफ गुलाब कोठारी देश में वर्तमान सूखे और अकाल की समस्या की समीक्षा कर रहे हैं:

प्रकृति सदा आवश्यकता से अधिक ही देती है. सत्ता का जो जाल प्रकृति ने मृत्यु-लोक में बना डाला है, उन्हीं में सत्ता के छोटे-छोटे स्वरूप बन गए हैं. उनके भीतर भी 33 देवता कार्य करते हैं, किंतु प्रकृति की प्रतिकृति होने से 99 असुर अधिक बलवान हैं. कहीं-कहीं ब्रह्मा-विष्णु-महेश के अवतार भी विश्व में सत्ता संभाले हुए हैं. 

माया सदा सत-रज-तम से बांधे रखने का प्रयास करती है. हर देवता की अपनी माया है. उसका पहला प्रभाव तो उसके देवता को ही भोगना पड़ता है. विष्णु सृष्टि को अपनी ओर ले जाना चाहेंगे, किंतु लक्ष्मी उन लोगों को अपनी माया में फंसाना चाहेगी.

इस पानी से हमारी चार से पांच साल की आवश्यकता पूरी हो सकती है. बीच में बाढ़ के हालात भी बनते हैं

आज पानी की जो त्राहि-त्राहि मची है, वह पानी की कमी से नहीं पैदा हुई है. आप हर बरसात के पानी की मात्रा निकालेंगे, उसमें कितना पड़ोसी राज्यों से बहकर आता है, कितना वर्षा के पूर्व हमारे संग्रह में रहता है, इन आंकड़ों पर दृष्टि डालेंगे तो दंग रह जाएंगे.

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इस पानी से हमारी चार से पांच साल की आवश्यकता पूरी हो सकती है. बीच-बीच में अतिवृष्टि और बाढ़ के हालात भी बनते हैं. फिर भी हम प्यासे. धिक्कार है, बारम्बार धिक्कार है. हमारे सत्ताधारियों को जिनके भ्रष्ट और प्रमादपूर्ण जीवन ने हमारे गले सुखा रखे हैं. 

लक्ष्मी के प्रभाव ने इनकी चेतना को सुला दिया है. विष्णु ने तो अच्छे घर और अच्छे करियर से ही जोड़ा था ताकि वे लोगों की सेवा करके नर से नारायण बन सकें. इनके कार्यों के पीछे भी तो कोई माया होगी.

अनाज सूखा और बाढ़ व्यापार बन गए हैं. व्यापार ही नहीं बड़े उद्योग बन गए हैं. अरबों रुपए की कमाई और लेन-देन बन गए. कौन सत्ताधारी इन कमाऊ पूतों को खोना चाहेगा.

जो सत्ता की बिरादरी और पंचायत के लोग हैं, उनको अपना हिस्सा बना बनाया मिल जाता है. इसका भी तंत्र है

रही बात जनता की, तो वह कौन सी काकाजी-बुआजी लगती है, जिनके लिए सोने के अण्डे छोड़े जाएं. हां, जो सत्ता की बिरादरी और पंचायत के लोग हैं, उनको अपना हिस्सा बना बनाया मिल जाता है. इसका भी तंत्र है.

बाढ़ राहत के लिए कितना बजट होता है. प्रत्येक जिलों को बजट मिलता है. बाढ़ राहत के नाम पर दिल्ली वालों के हवाई सर्वे नेताओं का नया स्टाइल बन गया है. बाढग़्रस्त क्षेत्रों में इन ‘खास’ मेहमान की आवभगत में राहत का तीन-चौथाई से अधिक अंश काम आ जाता है. 

राज्य के दर्जनों बड़े अधिकारी वहां सारे काम छोड़कर बैठे रहते हैं. मैंने इनकी रेलमपेल बहुत नजदीक से देखी है. इस पूरे बजट का बाढ़ में कितना अंश काम आता है और काम क्या होता है, इसका श्रेष्ठ उदाहरण बाड़मेर जिले का कवास गांव है.

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वहां सरकार से पहले राजस्थान पत्रिका ने पीडि़तों को सहायता राशि बंटवाई थी. तत्कालीन उपराष्ट्रपति भैरों सिंह शेखावत के हाथों. आज भी गांव का वही नजारा दर्शकों को उपलब्ध है. हवाई सर्वे वाले बाराती खा-पीकर लौट गए. दुल्हन के घर वाले भी अपने-अपने भत्ते उठाकर घटना को भूल चूके. न दूल्हा आया, न डोली उठी. प्रश्न यह है कि तब बाढ़ रक्षा के उपाय क्यों किए जाएं. पिछले 70 सालों में बाढ़ के नाम पर कितनी राशि खर्च हुई, रिकॉर्ड पर है. कहीं भी इस राशि के खण्डहर भी नहीं दिखाई पड़ेंगे.

सूखे का व्यापार तो बहुत लम्बा-चौड़ा है. पहले तो सूखा पैदा किया जाता है. आज भी डार्क जोन में कितने लोग सूखे के नाम पर पानी का व्यापार कर रहे हैं, बोरिंग चला रहे हैं. वे सरकार के क्या लगते हैं. आज भी नहरी क्षेत्रों में फसलें लहलहाती हैं. उसी क्षेत्र में पडऩे वाले गांवों में लोगों के कण्ठ सूख रहे हैं.

पिछले 70 सालों में बाढ़ के नाम पर कितनी राशि खर्च हुई, रिकॉर्ड पर है. कहीं भी इस राशि के खण्डहर भी नहीं दिखाई पड़ेंगे

बड़े-बड़े बांधों, झीलों के पानी पर सत्ता का कब्जा है. सारे फाटक बंद करके उद्योगों को पानी दिया जाता है. बांध क्षेत्र में पानी बंद होने से सारे गांव उजड़ जाते हैं. पशुधन मर जाता है. खेत सूख जाते हैं. इन सबके बदले चंद सत्ताधारियों के खेत हरे रहते हैं. क्योंकि हमारा युवा अभी सो रहा  है.

बांध का खर्च आज सत्ता का निजी नुकसान बन गया है. प्रकृति के उस जल से जनता का अधिकार जनता के प्रतिनिधि ही छीनकर खा रहे हैं. यही हैं आज 99 असुरों की बिरादरी के लोग. 

इनका विकास ही देश का विकास है. धूल है ऐसी क्षुद्र समझ पर. क्या बिगड़ जाएगा इनका यदि बांध का कोई एक गेट रोजाना आधा इंच खुला रह जाए? एक गांव नहीं उजड़ेगा, एक व्यक्ति नहीं मरेगा. पूरा क्षेत्र हरा-भरा हो जाएगा. सत्ता को यह मान्य नहीं है.

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यह भी सच है कि राज्य में अभी भी छोटे-बड़े 5-6 हजार जलाशय हैं, झीलें हैं, बांध हैं. सत्ता का अहंकार सबको रामगढ़ बना देना चाहता है. सब गांव सूखाग्रस्त हो जाएं, हम कटोरा लेकर दिल्ली जाएं, 3-4 हजार करोड़ लेकर लौटें. सूखा समाप्त! हर साल सूखाग्रस्त क्षेत्र का तेज गति से विकास हो, जल संग्रह की जागरुकता के करोड़ों-करोड़ खर्च किए जाएं, ताकि सत्ताधारियों की भावना भी जनमानस में छाप छोड़ सके.

गांवों में सूखे का बड़ा भार पशुधन का होता है. पशुओं के चारा-पानी का एक बड़ा धंधा सरकार की झोली में आ पड़ता है. आजकल तो दूरदराज क्षेत्रों में हवाई जहाज से पैकेट डालने का भी एक रोमांच हो गया है.

मेरा अनुभव कहता है कि बाढ़ हो या सूखा, खाने-कपड़े एकत्र करने और बांटने की व्यवस्था स्वयं जनता करती है. सरकार तो कालाबाजारियों को प्रश्रय देती है. ऊंचे दामों में खरीद दिखाकर सहायता की फाइलें भरती रहती है. यही राहत है, यही विकास है.

First published: 21 May 2016, 18:45 IST
 
गुलाब कोठारी

लेखक राजस्थान पत्रिका समूह के एडिटर इन चीफ हैं

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