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अनिल दवे: क्या वे हमारी नदियों का संरक्षण करने में समर्थ हैं?

निहार गोखले | Updated on: 10 February 2017, 1:48 IST
(पीटीआई)

अनिल माधव दवे शायद भारत के पहले ऐसे पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय संभालने वाले मंत्री हैं, जिन्हें प्रभार लेने से पहले ही एक पर्यावरणविद के रूप में अच्छी तरह जाना जाता था.

उनके पूर्ववर्ती प्रकाश जावड़ेकर, जो अब मानव संसाधन विकास मंत्री हैं, न तो पहले और न ही उनके कार्यकाल के दौरान पद पर फिट बैठे. 

यहां तक कि जयराम रमेश यकीनन अब तक के सबसे प्रसिद्ध पर्यावरण मंत्री रहे, लेकिन उन पर भी एक ठप्पा था. जब उन्होंने कार्यभार संभाला तब उन पर विकास का समर्थन करने वाले विश्व बैंक के समर्थक अर्थशास्त्री होने का ठप्पा था. हालांकि कार्यभार संभालने के बाद उनके बारे में दावा किया गया था कि वे एक पर्यावरणविद् में परिवर्तित हो गए थे.

वास्तव में जिस कारण से अनिल माधव दवे को जाना जाता है, वह है नर्मदा पर उनका काम

दवे जलवायु परिवर्तन पर एक किताब लिख चुके हैं और पर्यावरण के मुद्दों पर लगातार आवाज उठाते रहे हैं. लेकिन वास्तव में जिस कारण से उनको जाना जाता है, वह है नर्मदा पर उनका काम.

वे सेना के विमान से नर्मदा का चक्कर लगा चुके हैं और 1,312 किलोमीटर लंबी इस नदी में राफ्टिंग भी कर चुके हैं. यहां तक कि दवे ने सांसद आदर्श ग्राम योजना के तहत जो गांव गोद लिया है, वह भी नर्मदा के तट के पास है. तो क्या दवे हमारी नदियों को बचा लेंगे?

अतीत का बोझ

ध्यान दें कि 60 वर्षीय दवे मूल रूप से गुजराती हैं और ऊपरी सदन में मध्य प्रदेश का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं. वे जावड़ेकर की जगह भर रहे हैं. वे एक ऐसे आदमी हैं जिनको प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उद्योग समर्थक एजेंडे को किताब में ढालने के लिए पुरस्कृत किया जा चुका है.

जावड़ेकर के अधीन रहते हुए इस मंत्रालय ने हिमालय में बांधों के निर्माण का पक्ष लेना शुरू कर दिया था. सारा मामला तब बदला जब आर्ट ऑफ लिविंग ने मार्च 2016 में यमुना के नाजुक पारिस्थितिकी वाले तटीय क्षेत्र के एक लंबे-चौड़े हिस्से पर भारी-भरकम उत्सव मनाया. इसके लिए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) द्वारा पर्यावरण मंत्रालय की खूब खिंचाई की गई थी. इस उत्सव का उद्घाटन प्रधानमंत्री मोदी द्वारा किया गया था.

यमुना जिए अभियान के संयोजक और आर्ट ऑफ लिविंग के आयोजन के खिलाफ याचिका दाखिल करने वाले मनोज मिश्रा दवे के बारे में कहते हैं, "अब ऐसा आदमी मंत्री बना है, जिसे कम से कम यह समझाने की जरूरत नहीं है कि एक नदी क्या होती है और उसकी जरूरत क्या है. हमें सिर्फ उम्मीद ही नहीं, बल्कि पूरा विश्वास है कि जो होगा अच्छा होगा. हालांकि साथ ही, एक मंत्री के पद के साथ कई तरह की मजबूरियां भी जुड़ी रहती है. हम उम्मीद करते हैं कि वह इन मजबूरियों से आसानी से पार पा लेंगे."

अब ऐसा आदमी मंत्री बना है, जिसे यह समझाने की जरूरत नहीं है कि एक नदी क्या होती है और उसकी जरूरत क्या है?

उत्तराखंड में हिमालय की सहायक नदियों पर बांधों के निर्माण के अन्य विवादास्पद मुद्दे पर जावड़ेकर के मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट में यू-टर्न ले लिया था. सुप्रीम कोर्ट राज्य में अधिक बांधों की इजाजत देने के एक मामले की सुनवाई कर रहा था.

मंत्रालय ने पहले स्वीकार किया कि राज्य में 2013 में आई केदारनाथ बाढ़ के लिए बांध ही जिम्मेदार थे, जिसमें कम से कम 5,000 लोगों की मौत हो गई थी. लेकिन जल्द ही इस मंत्रालय ने बांधों की इजाजत देने के पक्ष में तर्क देना शुरू कर दिया. इसके लिए उसने हिंदू राष्ट्रवादियों के साथ पुराने ब्रिटिश राज द्वारा हस्ताक्षरित 100 साल पुरानी संधि का हवाला दिया.

हिमालय में गंगा की सहायक नदियों पर काम करने वाले संगठन गंगा आह्वान की मल्लिका भनोट कहती हैं, "पर्यावरण मंत्रालय ने उत्तराखंड में बांधों की सुरक्षा पर अदालत में लंबित मामले में एक बहुत ही संदिग्ध भूमिका निभाई है. हमें उम्मीद है कि दवे इन गलतियों को सुधारने की दिशा में काम करेंगे. हम उन पर भरोसा कर रहे हैं."

हालांकि यह यू-टर्न भी कथित तौर पर प्रधानमंत्री कार्यालय से हस्तक्षेप के बाद लिया गया था.

कुछ संदेह

नर्मदा के संरक्षण में दवे की भूमिका को कुछ संदेह के साथ देखा जाता है. दवे मध्य प्रदेश से होकर गुजरने वाली नर्मदा पर एक वार्षिक समारोह का आयोजन करते हैं. इसे नर्मदा समग्र के नाम से जाना जाता है. और उन्होंने एक नदी महोत्सव भी शुरू कर दिया है.

नर्मदा पर एक पुस्तक के लेखक और कारवां के राजनीतिक संपादक हरतोष सिंह बल ने कहा कि दवे ने उन्हें आधिकारिक तौर पर बताया था कि वे नर्मदा पर बांध बनाने के पक्ष में नहीं हैं.

लेकिन नाम न छापने की शर्त पर एक वरिष्ठ नदी संरक्षणवादी ने कहा कि दवे आमतौर पर बांधों के सवाल से परहेज करते रहे हैं और इस मुद्दे को टाल देते हैं. "एक बैठक में उन्होंने नदियों के प्रदूषण के बारे में तो बात की थी, लेकिन बांधों की भूमिका का उल्लेख नहीं किया. इसके बजाय, उन्होंने ऐसे हल्के-फुल्के बिन्दु बताए- जैसे कि कैसे पुलों से नदियों में फेंके जाने वाले सिक्के उनको अपवित्र करते हैं. और उन्होंने नदियों में फेंकने के लिए पर्यावरण के अनुकूल विशेष सिक्के डिजाइन करने जैसी बातें की थीं."

पर्यावरण कार्यकर्ता ने कहा, "मुद्दा यह है कि इस सबसे हुआ क्या? उनकी पार्टी मध्यप्रदेश में एक दशक से भी अधिक समय से सत्ता में थी, लेकिन राज्य ने नर्मदा के लिए कुछ भी नहीं किया."

अनिव दवे मध्य प्रदेश से होकर गुजरने वाली नर्मदा नदी पर एक वार्षिक समारोह का आयोजन करते हैं

साउथ एशिया नेटवर्क ऑन डैम्स, रिवर्स एंड पीपल से जुड़े हिमांशु ठक्कर कहते हैं, "नर्मदा समग्र में दवे निर्णय लेने में लोगों और सिविल सोसाएटी की भागीदारी जैसी बात करते हैं. अब जब कि वे मंत्री बन गए हैं, हमें उम्मीद है कि वह इन विचारों को लागू करेंगे, पर्यावरण जरूरतों को और अधिक भागीदारीपूर्ण बनाते हुए."

ठक्कर ने बताया कि मंत्रालय की नदी घाटियों पर विशेषज्ञ समिति की सोमवार और मंगलवार को बैठक हो रही है. लेकिन इसका एजेंडा शुक्रवार को (बैठक से मात्र दो दिन पहले) ही जारी किया गया, जबकि एजेंडे में पांच बड़ी नदी घाटियों में परियोजनाओं का अनुमोदन भी शामिल है. इस संबंध में पहले कोई मसौदा जारी नहीं किया गया. यह मुख्य सूचना आयोग के आदेशों का उल्लंघन है.

कुल मिलाकर दवे को सोमवार की बैठक स्थगित कर देनी चाहिए और सुनिश्चित करना चाहिए कि पहले दस्तावेज तो सही क्रम में बनाए जाएं. फर्क दिखाने का दवे के पास यह पहला मौका है. यह उनकी अग्निपरीक्षा है.

क्या दवे इस अग्निपरीक्षा से बच पाएंगे?

First published: 9 July 2016, 2:23 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

संवाददाता, कैच न्यूज़. जल, जंगल, पर्यावरण समेत नीतिगत विषयों पर लिखते हैं.

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