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केंद्र के नए वेटलैंड प्रोटेक्शन रूल्स एक मजाक हैं

निहार गोखले | Updated on: 28 May 2016, 7:12 IST
(कैच न्यूज)
QUICK PILL
  • जहां देशभर में वेटलैंड्स पर \'विकास\' और अतिक्रमण का खतरा मंडरा रहा है, मोदी सरकार के ड्राफ्ट रूल्स इन खतरों से निपटने की तरफ कोई इशारा नहीं करते.
  • इन नए नियम का मूल वेटलैंड्स मैनेजमेंट को राज्यों को विकेंद्रित करना है. केंद्र केवल \'अपवाद स्वरूप मामलों\' में हस्तक्षेप करेगा. जबकि 2010 के नियम ने राज्यों को कुछ भूमिका दी थी, और ये ड्राफ्ट रूल्स उन्हें पूरी ताकत दे देंगे.

इसको पढ़िए और देखिए कि क्या इसका कोई मतलब निकलता हैः

राज्य के चीफ एग्जीक्यूटिव के रूप में मुख्यमंत्री, राज्य के वेटलैैंड प्रिजर्वेशन अथॉरिटी को एक प्रस्ताव भेजेगा कि वो राज्य में वेटलैंड की पहचान करें. स्टेट वेटलैंड अथॉरिटी के चीफ एग्जीक्यूटिव रूप में मुख्यमंत्री प्रस्ताव को स्वीकार करेंगे और इसकी संस्तुति देंगे. अंत में राज्य के चीफ एग्जीक्यूटिव के रूप में मुख्यमंत्री इन संस्तुतियों को या तो स्वीकार करेंगे या अस्वीकार और फिर पहचाने गए वेटलैंड्स की अधिसूचना के साथ आगे बढ़ेंगे.

दिमाग चकरा रहा है?

यह जानकारी पर्यावरण मंत्रालय ड्राफ्ट वेटलैंड्स रूल्स 2016 में मौजूद है. पुराने वेटलैंड रूल्स (संरक्षण एवं प्रबंधन) 2010 का स्थान लेने वाले नए ड्राफ्ट रूल्स आगामी 31 मई तक लोगों की प्रतिक्रिया के लिए खुले हैं, जिसके बाद इन्हें प्रभाव में लाया जाएगा.

ऊपर के उदाहरण को पढ़ें तो पता चलता है कि वेटलैंड कंसर्वेशन के नए नियम एक मजाक होंगे.

वेटलैंड क्या है?

झील, तालाब, दलदल जैसे जलीय स्थान और जहां से इन्हें पानी मिलता है, को वेटलैंड कहते हैं. वेटलैंड्स मछलियों-पक्षियों के लिए एक स्वर्गनुमा स्थान होते हैं और यह वाटर स्टोरेज, ग्राउंडवाटर रिचार्ज में मदद करने के साथ ही बाढ़ और तूफान के प्रतिरोधक के रूप में काम करते हैं.

किसानों, शहरी लोगों समेत पक्षी प्रेमियों को वेटलैंड्स की जरूरत होती है.

जहां देशभर में वेटलैंड्स पर 'विकास' और अतिक्रमण का खतरा मंडरा रहा है, मोदी सरकार के ड्राफ्ट रूल्स इन खतरों से निपटने की तरफ कोई इशारा नहीं करते.

जब चेन्नई में बाढ़ आई तब पता चला कि वेटलैंड्स पर अतिक्रमण कर बने घरों और ऑफिस बिल्डिंग्स की वजह से शहर बारिश के अतिरिक्त जल में डूब गया. मुंबई के सेवरी की कीचड़दार भूमि जैसे वेटलैंड्स बेहतरीन फ्लेमिंगो को आकर्षित करते हैं जिन्हें लोकल ट्रेन यात्रा के जरिये भी देखा जा सकता है.

पर्यावरणविदों का कहना है कि ड्राफ्ट रूल्स सरकार द्वारा वेटलैंड्स और वेस्टलैंड्स को देखने की रूढ़िवादी सोच को और मजबूत बनाएंगे.

एफपीडीसीसी

विकेंद्रीकरण

इन नए नियम का मूल वेटलैंड्स मैनेजमेंट को राज्यों को विकेंद्रित करना है. केंद्र केवल 'अपवाद स्वरूप मामलों' में हस्तक्षेप करेगा. जबकि 2010 के नियम ने राज्यों को कुछ भूमिका दी थी, और ये ड्राफ्ट रूल्स उन्हें पूरी ताकत दे देंगे. लेकिन इस प्रक्रिया में संरक्षण की पूरी प्रक्रिया कमजोर हो जाएगी.

कम हुईं ताकत

  • 2010 रूल: इसके तहत सेंट्रल वेटलैंड रेगुलेटरी अथॉरिटी बनाई गई. यह पर्यावरण मंत्रालय के सचिव, नौकरशाहों और विशेषज्ञों के नेतृत्व में था.
  • ड्राफ्ट रूल: इसमें इसे पूरी तरह से हटाते हुए हर राज्य में स्टेट लेवल वेटलैंड अथॉरिटीज बनाईं.

लेकिन केंद्र से स्टेट अथॉरिटी को सत्ता हस्तांतरित करने के दौरान ड्राफ्ट रूल्स में सेंट्रल अथॉरिटी की तमाम शक्तियां हट गईं. जैसेः

समयांतराल पर वेटलैंड्स की सूची और उनमें प्रतिबंधित गतिविधियों की सूची की समीक्षा.

'वेटलैंड्स के उचित इस्तेमाल, संरक्षण, परिरक्षण के लिए जरूरी कोई भी निर्देश' देने की शक्ति.

इस भाषा को हल्का करते हुए इसे 'वेटलैंड्स के संरक्षण और सतत प्रबंधन के लिए जरूरी निर्देश' कर दिया गया.

जहां केंद्र सरकार के पास पहले राज्य सरकारों को पहचाने गए वेटलैंड्स को सुरक्षित रखने के लिए कुछ शक्तियां थी, नए नियम में इस तरह की जांच की कोई बात नहीं है, क्योंकि अब यह पूरी प्रक्रिया राज्य सरकारों के अंतर्गत आ गई है.

आत्ममुग्ध होते मुख्यमंत्री

  • 2010 रूलः केंद्र सरकार द्वारा जिस प्रकार से वेटलैंड्स को अधिसूचित किया गया है, उस तरह से राज्यों को अपनी सीमा के अंदर के वेटलैंड्स की पहचान कर सीडब्लूआर के पास जानकारी देना.
  • ड्राफ्ट रूलः सरकार केे मुखिया और अथॉरिटी के मुखिया के रूप में निर्णय लेने का पूरा अधिकार मुख्यमंत्रियों के पास.

'उचित इस्तेमाल'- इस्तेमाल करने वाला ही करेगा तय

  • 2010 नियम: वेटलैंड्स में छह गतिविधियां प्रतिबंधित थीं. इनमें इसे पाटना, 50 मीटर के अंदर स्थायी निर्माण करना, उद्योगों को बढ़ाना या स्थापित करना, कचरा फेेंकना आदि शामिल था.
  • ड्राफ्ट रूलः केवल पाटने के अलावा बाकी प्रतिबंध की पूरी सूची हटा दी गई. उन गतिविधियों को अनुमति दे दी गई जो इन वेटलैंड्स का उचित इस्तेमाल करें.
2010 रूलः मछली पकड़ना, नाव चलाना, तली सेे मिट्टी निकालना जैसी अन्य गतिविधियां राज्य सरकार की पूर्व अनुमति के बिना प्रतिबंधित थीं.
ड्राफ्ट रूलः इन्हें मिटा दिया गया.

जैव विविधता

  • 2010 रूलः में बताया गया कि यह नियम वहां लागू होंगे जो क्षेत्र संरक्षित होने के अलावा "क्षेत्र जेनेटिक विविधता से समृद्ध हैं," "जबर्दस्त प्राकृतिक सुंदरता के क्षेत्र हैं".
  • ड्राफ्ट रूलः इन्हें मिटा दिया गया.

2010 रूलः वेटलैंड क्षेत्र में किसी भी प्रकार की गतिविधि से पहले पर्यावरण प्रभाव आकलन जरूरी था. 
ड्राफ्ट रूलः इन्हें मिटा दिया गया.

  • 2010 रूलः एक निर्धारित क्षेत्रफल से बड़े वेटलैंड्स और वेटलैंड्स कॉम्प्लेक्सेस विशेषरूप से शामिल थे.
  • ड्राफ्ट रूलः बिना किसी निर्धारित आकार के राज्य सरकार द्वारा अधिसूचित वेटलैंड्स शामिल.

2010 रूलः नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के सामने सेंट्रल अथॉरिटी के निर्णय पर अपील की जा सकती थी.
ड्राफ्ट रूलः इन्हें मिटा दिया गया.

सिविल सोसाइटी नाराज

बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी, डब्ल्यूडब्ल्यूएफ इंडिया, लीगल इनिशएटिव फॉर फॉरेस्टस एंड एन्वायरमेंट, इंटरनेशनल रिवर्स, इनटैक, यमुना जीये अभियान जैसे कई संगठन पर्यावरण मंत्रालय के सामने अपनी बात रखने की योजना बना रहे हैं. 

इन संगठनों की प्रमुख चिंता यह है कि 2010  के नियम मुश्किल से लागू हो रहे हैं. किसी भी राज्य ने अब तक वेटलैंड की पहचान नहीं की है.

यहां कार्रवाई के लिए कोई समयसीमा निश्चित नहीं है और कुछ भी अनिवार्य नहीं है

पर्यावरण मामलों की वकील ऋत्विक दत्ता का कहना हैं, 'इस बात के सबूत हैं कि 6 साल से राज्यों ने वेटलैंड की पहचान करने और इस मामले में केंद्र को जानकारी मुहैया कराने के लिए कुछ नहीं किया है. अब केंद्र राज्यों पर वेटलैंड को संरक्षित करने की जिम्मेदारी डालना चाहता हैं. यह कैसे संभव हैं?

कई हफ्तों बाद 22 अप्रैल को जब ड्राफ्ट नियमों को प्रकाशित किया गया, उस समय नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने केंद्र से वेटलैंड की घोषणा पर स्टेटस रिपोर्ट मांगा था और राज्यों से उनके क्षेत्र में आने वाले वेटलैंड की सूची मांगी थी.ईआईए रीसोर्स और रिस्पांस सेंटर के डायरेक्टर पुष्प जैन कहते हैं, 'यहां कार्रवाई के लिए कोई समयसीमा निश्चित नहीं है और कुछ भी अनिवार्य नहीं है. निश्चित समयसीमा के अंदर राज्यों को काम करने के लिए कहा जाना चाहिए.'

वाइल्डलाइफ संरक्षणकर्ता नेहा सिन्हा ने बताया, 'जल निकायों के संरक्षण के लिए बहुत ज्यादा स्थानीय दबाव है. वोट बैंक के चलते राज्य सरकारों को कार्रवाई करना मुश्किल होगा. इसलिए केंद्रीय अथॉरिटी की जरूरत होगी.'

सिन्हा आगे कहती हैं कि यह चिंता की बात नए नियमों से जेनेटिक विविधता के क्षेत्रों को बाहर रखा गया है. यहां जैव विविधता के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपाय नहीं किए गए हैं. 

First published: 28 May 2016, 7:12 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

Nihar is a reporter with Catch, writing about the environment, water, and other public policy matters. He wrote about stock markets for a business daily before pursuing an interdisciplinary Master's degree in environmental and ecological economics. He likes listening to classical, folk and jazz music and dreams of learning to play the saxophone.

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