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जलवायु परिवर्तन: क्या पेरिस शिखर सम्मेलन से कुछ हासिल होगा ?

निहार गोखले | Updated on: 10 February 2017, 1:47 IST
QUICK PILL
  • अमीर देशों को वातावरण सफाई के वैश्विक अभियान का नेतृत्व करना चाहिए. आज की तारीख में अमीर और विकसित देश पर्यावरण प्रदूषण के अपने फेयर शेयर के आधे\r\nहिस्से का भार भी नहीं\r\nउठा रहे हैं.
  • गरीब देश अपने फेयर शेयर के बराबर यानि नौ जीगाटन\r\nकार्बन\r\nउत्सर्जन में कटौती करने के\r\nलिए प्रतिबद्ध है. वास्तव\r\nमें भारत, केन्या, चीन\r\nऔर इंडोनेशिया फेयर शेयर में\r\nअपने हिस्से से ज्यादा के लिए\r\nप्रतिबद्ध है.

 पेरिस में सोमवार से जलवायु परिवर्तन सम्मेलन शुरू हो गया है. दुनिया भर के नेताओं के समक्ष संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की मून ने जलवायु परिवर्तन के मसले पर मजबूत और निर्णायक कदम उठाने की मांग रखी है.

हालांकि पूरा शिखर सम्मेलन ही एक किस्म के पक्षपातपूर्ण समझौते पर टिका है और इस बात को लेकर कहीं कोई चर्चा नहीं हो रही है.

अमेरिका, ब्रिटेन और दूसरे अमीर यूरोपीय देश मौजूदा ग्लोबल वार्मिंग की समस्या के लिए सबसे अधिक जिम्मेदार है, बावजूद इसके वे इस समस्या को सुलझाने के लिए कुछ खास नहीं करना चाहते.

पेरिस में जारी सम्मेलन के दौरान तमाम तरह के अध्ययनों के जरिए यह दिखाया गया कि किस तरह से भारत और चीन जैसे देशों का इस समस्या में ज्यादा योगदान नहीं हैं. फिर भी वे इसके समाधान के लिए अपनी हैसियत से आगे बढ़कर कोई रास्ता निकालने को लेकर प्रतिबद्ध हैं.

''फेयर शेयर'' का क्या मतलब है?

अगर आप प्रदूषण फैलाते हैं तो सफाई के लिए भी जिम्मेदार है. यह 'एक हाथ दे, एक हाथ ले' के सरल से सिद्धांत पर आधारित है. जो प्रदूषण फैलाएगा वही उसे साफ करेगा. ''फेयर शेयर'' इससे आगे की प्रक्रिया है. तीन लोग मिलकर प्रदूषण फैला रहे हैं लेकिन उनमें एक 70 फीसदी प्रदूषण के लिए जिम्मेदार है. इसका मतलब है कि 70 फीसदी प्रदूषण फैलाने वाला ही 70 फीसदी सफाई के लिए जिम्मेदार है. यहां ऐसा नहीं होगा कि बाकी दो भी 70 फीसदी प्रदूषण फैलाने वाले का बोझ अपने सर पर उठाए.

पूरा पेरिस जलवायु सम्मेलन ही एक किस्म के पक्षपातपूर्ण समझौते पर टिका है और इस बात को लेकर कहीं कोई चर्चा नहीं हो रही है


जलवायु परिवर्तन का मामला कुछ-कुछ ऐसा ही है. हवा में फैला कार्बन दशकों तक बना रहता है. आज भारत और चीन भारी मात्रा में कार्बन उत्सर्जन कर रहे हैं, बावजूद इसके इनकी ऐतिहासिक जिम्मेदारी अमेरिका, जापान और यूरोपीय देशों की तुलना में कम है. क्योटो प्रोटोकॉल में ग्लोबल वार्मिंग का कारण बताया गया है कि विकसित देश 70 फीसदी कार्बन उत्सर्जित करते हैं.

बड़ी दरार

गरीब देश, अमीर देशों से वातावरण को साफ करने में नेतृत्व करने की उम्मीद करते हैं. एक एनजीओ ने अमीर देशों के फेयर शेयर का आकलन किया है. उसके मुताबिक आज की तारीख में फेयर शेयर के आधे हिस्से का भार भी ये देश नहीं उठा रहे हैं.

उदाहरण के लिए अमेरिका और यूरोपीय देश अपने-अपने फेयर शेयर का मात्र 20 फीसदी भार उठा रहे है.

अमेरिका ने 1950 के बाद से नौ अरब टन से अधिक कार्बन उत्सर्जित किया है लेकिन सिर्फ 2 अरब कटौती करने का वादा किया है.

विज्ञान और पर्यावरण केंद्र के एक अध्ययन के अनुसार ''व्यवसाय करने के अलावा'' अमेरिका ने जलवायु परिवर्तन के लिए कोई असाधारण काम नहीं किया है. जापान ने फेयर शेयर का दस फीसदी भार उठाने का वादा किया है.

रूस ने फिलहाल कोई वादा नहीं किया है उल्टे यह भविष्य में ज्यादा उत्सर्जन का लक्ष्य बना रहा है.

अमेरिका ने 1950 के बाद से नौ अरब टन से अधिक कार्बन उत्सर्जित किया है लेकिन सिर्फ 2 अरब कटौती करने का वादा किया है


अमीर देशों को 26 जीगाटन्स कार्बन उत्सर्जन घटाने के लक्ष्य का वादा करना चाहिए जबकि अभी वो छह जीगाटन्स ही घटा रहे हैं.

दूसरी ओर गरीब देश अपनी उचित हिस्सेदारी के बराबर यानि नौ जीगाटन्स, कार्बन उत्सर्जन में कटौती करने के लिए प्रतिबद्ध है.

वास्तव में भारत, केन्या, चीन और इंडोनेशिया फेयर शेयर में अपने हिस्से से ज्यादा के लिए प्रतिबद्ध है.

भारत ने 1950 से 35 करोड़ तीस लाख टन कार्बन उत्सर्जन किया जबकि इसने 2030 तक 48 करोड़ 36 लाख टन कटौती का वादा किया है.

भारत ने अमीर देशों से पैसे और तकनीक मिलने की शर्त पर यह वादा किया है.

अमीर देशों को क्या करना चाहिए?

एक एनजीओ की रिपोर्ट कहती है कि फेयर शेयर में विकसित देशों का हिस्सा काफी ज्यादा है और इस अनुपात में उनके लिए कटौती करना असंभव है.

यहां उनकी उम्मीदें गरीब देशों से है. अमीर देश अपनी सीमाओं के भीतर गरीब देशों के लिए सस्ती तकनीक और पैसा देने की उम्मीद कर रहे हैं. कई अमीर देश जिनका जलवायु समस्या पैदा करने में योगदान है वे बाकी दुनिया को "जलवायु कर्ज " देकर मदद करना चाहते हैं.

अमीर देशों को बढ़ते तापमान, बाढ़, चक्रवात और सूखे के खिलाफ गरीब देशों की बचाव क्षमता को सुधारने में मदद करनी चाहिए. विकसित देश इस तरह से जलवायु परिवर्तन में योगदान दे सकते हैं.
इसके तहत सिर्फ भयानक प्राकृतिक आपदाओं से बचने के लिए ढांचागत सुविधाओं का निर्माण ही नहीं शामिल है बल्कि साथ में साफ पेयजल की आपूर्ति और कीटरोधी फसलों का उत्पादन आदि भी सुनिश्चित करना है. इसके लिए पैसे और नई तकनीकों की जरूरत होगी. ये नई तकनीकें अक्सर विकसित देशों के पास मौजूद होती है और बौद्धिक संपदा कानूनों के चलते बेहद महंगी भी होती है.

अमीर देशों को बढ़ते तापमान, बाढ़, चक्रवात और सूखे से गरीब देशों की बचाव क्षमता को सुधारने में मदद करनी होगी

इसमें उन गरीब देशों की सहायता का प्रावधान भी है जिनका इस समस्या में कोई योगदान नहीं है, लेकिन वे इससे बुरी तरह प्रभावित हैं. यहां भी विकसित देश अपना वादा पूरा कर पाने में असफल रहे हैं. एक्शन एड की रिपोर्ट इस बात को स्थापित करती है.

2013 में गरीब देशों को केवल 3.5 अरब डॉलर की सहायता मिली. 2020 तक हर साल गरीब देशों को 50 अरब डॉलर की सहायता देनी होगी. 2025 में इसे बढ़ाकर 150 अरब डॉलर करना होगा.

अमीर देशों के लिए यह रकम कुछ भी नहीं है. एक्शनएड के अनुसार यह राशि उनके सकल घरेलू उत्पाद का केवल 0.1 फीसदी के बराबर है.

वर्तमान में अमेरिका अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के मामले में काफी पीछे है. उसे अपना वादा पूरा करने के लिए 2020 तक अपना योगदान 60 गुणा तक बढ़ाना होगा. इसी तरह फ्रांस को भी अपना योगदान 30 गुणा बढ़ाने की जरूरत है.

पेरिस सम्मलेन के मायने क्या है?

"फेयर शेयर्स: ए सिविलि सोसाइटी इक्विटी रिव्यू ऑफ आईएनडीसीएस'' के नाम से जारी एक एनजीओ की रिपोर्ट के अनुसार इस तरह के भेदभाव ही जलवायु समस्या का कारण है और हमें इसका समाधान खोजने की जरूरत है.

एनजीओ की रिपोर्ट कहती है कि पेरिस सम्मेलन में ''ऐतिसाहिक असमानताओं'' की चर्चा नहीं होगी. उसकी जगह पेरिस में जलवायु परिवर्तन को लेकर पूरी दुनिया के लिए एक समझौते पर सहमति कायम करने और नया काूनन लाने का प्रयास हो रहा है.

एक्शन एड के मुताबिक नया समझौते लागू करने में नाकाम होने पर पहले से जारी असमानताएं और बढ़ेगी.

क्या अमीर देश इसे सुन रहे हैं?

First published: 5 December 2015, 3:36 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

संवाददाता, कैच न्यूज़. जल, जंगल, पर्यावरण समेत नीतिगत विषयों पर लिखते हैं.

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