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राजेंद्र सिंह: पूंजीपतियों को नहीं, लोगों को पानी का मालिक बनाना होगा

अतुल चौरसिया | Updated on: 4 April 2016, 8:23 IST
QUICK PILL
पानी पर एक दार्शनिक दोहा हिंदी के प्रतिष्ठित कवि अब्दुल रहीम खानखाना ने सोलहवीं सदी में लिखा था-\"रहिन पानी राखिए, बिन पानी सब सून, पानी गए न ऊबरैं, मोती मानस चून.”पानी\r\n के बिना मनुष्य और जीवन अकल्पनीय है, विडंबना यह है कि आज देश भर में पानी\r\n के संसाधन बेतरह दबाव में हैं. भूगर्भीय और भूस्तरीय दोनों जलस्रोतों पर \r\nया तो प्रदूषण की मार है या फिर वे अतिशय दोहन के शिकार हैं. देश के एक \r\nजिले लातूर और उस्मानाबाद में पीने के पानी की किल्लत इतनी बड़ी हो गई कि \r\nपिछले महीने वहां धारा 144 लागू करनी पड़ी. गर्मियां आने के \r\nसाथ देश के मुख्तलिफ हिस्सों से पानी की ऐसी ही अविश्वसनीय, अराजक कहानियां\r\n आने लगती हैं. साल दर साल चला आ रहा ये सिलसिला इस बार थोड़ा और जटिल हो \r\nगया क्योंकि पिछली बारिश का चौमासा सूखा-सूखा बीत गया.देश के\r\n ग्रामीण और शहरी इलाकों की पानी पर निर्भरता अलग-अलग है लेकिन उनकी समस्या\r\n एक है, साफ पीने के पानी का अभाव. पानी का व्यावसायीकरण एक अलग समस्या बन \r\nगया है. लोगों को शुद्ध पानी मिले न मिले, पानी बेचने वाली कंपनियों का \r\nशुद्ध मुनाफा सबसे ज्यादा है.अकाल के आसन्न खतरे से जूझ रहे \r\nदेश के सामने विकल्प क्या हैं, समस्या की वजह क्या है, निपटने का तरीका \r\nक्या हो सकता है, फिलहाल कौन से उपाय अपनाए जा रहे हैं, आदि कुछ सवालों पर \r\nमैगसेसे पुरस्कार विजेता और जलपुरुष राजेंद्र सिंह से अतुल चौरसिया की \r\nबातचीत:

महाराष्ट्र के लातूर-उस्मानाबाद जिले में टैंकर के पानी को लेकर दंगे की स्थिति बन गई. प्रशासन ने अभूतपूर्व कदम उठाते हुए धारा 144 लागू कर दी. देश में पानी के लिए दंगा पहली बार साबित होता दिखा. क्या हम पानी के लिए युद्ध की दिशा में बढ़ रहे हैं?


लातूर-उस्मानाबाद की स्थिति जितना बताया जा रहा है उससे कही ज्यादा गंभीर है. हाल के दिनों में मैं तीन बार लातूर जा चुका हूं. जिस समय की यह घटना है, मैं वहीं पर था. युद्ध जैसी स्थिति थी वहां पर. समस्या हमारे यहां अदूरदर्शी नेतृत्व की है.

हमने युद्ध से निपटने के लिए सेना, रिजर्व फोर्स, बटालियन तो बना रखी है लेकिन युद्ध की वजहों से निपटने की हमारे पास कोई योजना नहीं है. कारणों के निवारण पर हमारी सोच शून्य है. धरती के ऊपर और नीचे दोनों जगहों पर पानी के सुरक्षित भंडारण की दीर्घकालिक नीति बनानी होगी. हमारे पास यही दो स्रोत हैं. 

लेकिन इसे सहेजने का कोई स्थायी उपाय नहीं है. सिर्फ भंडारण की नहीं बल्कि हमें पांच साल तक अकाल की कल्पना करके जल संरक्षण की नीति तय करनी होगी.

यह स्थिति सिर्फ महाराष्ट्र की नहीं है. कर्नाटक, तेलंगाना, बुंदेलखंड जैसे तमाम परती, रेतीले इलाके आज इस समस्या से दो-चार हैं. हमारे देश की राजव्यवस्था पानी के संकट से निपटने में ऐतिहासिक अदूरदर्शिता का परिचय दे रही है.

देश में जलसकंट की प्रमुख वजहें सरकार के अलावा कौन सी रहीं?

पानी का प्राइवेटाइजेशन और कॉमर्सलाइजेशन कर सरकारों ने इस समस्या की नींव रखी थी. सरकार ठेकेदारी प्रथा के भरोसे चल रही है. एक कृत्रिम व्यवस्था बनाकर पानी जैसी प्राकृतिक जरूरत को सुलझाने का सपना देखा जा रहा है. पर सच्चाई यह है कि ठेकेदारी सिर्फ मुनाफे पर ध्यान देती है.

देश में पानी का धंधा करने वाली कंपनियों का नेट मुनाफा सबसे ज्यादा है. जिसे पानी की सबसे ज्यादा जरूरत है उसके पास पानी ही नहीं है (प्यासा आदमी और प्यासी धरती). यह उल्टी गंगा सरकारों ने बहा रखी है. 

जीवन की मूलभूत आवश्यकता को सबसे पहले व्यापारी-ठेकेदार पाता है उसके बाद धरती और प्यासे लोग. कोकाकोला को धरती उलीचने का लाइसेंस तत्काल मिल जाता है, किसान को कुआं या ट्यूबवेल के लिए इजाजत नहीं दी जाती.

आज देश के ग्रामीण और शहरी, दोनों इलाकों में पीने के साफ पानी का संकट है. ग्रामीण इलाके जहां भू-गर्भीय जल के ऊपर निर्भर हैं वहीं शहरी आबादी सप्लाई के पानी पर निर्भर है. आज दोनों ही स्रोत या तो प्रदूषित हैं या फिर कमी का शिकार हैं. इसका कारण क्या है?

आज आप देखिए कि दिल्ली, मुंबई, जयपुर, लखनऊ समेत तमाम बड़े शहरों को पीने का पानी 100-150 किमी  दूर से पहुंचाया जा रहा है. यह व्यावहारिक उपाय नहीं है. 

इसका असर उन ग्रामीण इलाकों के भूगर्भीय जल पर पड़ता है. ग्रामीण अपनी जरूरत के लिए भूगर्भीय जल का दोहन कर रहे हैं. लिहाजा दोनों जल स्रोतों पर विपरीत असर हो रहा है. सरकार की यह भेदभाव भरी नीति है. गांवो का सरफेस वाटर आप शहरों को भेज देते हैं. 

शहरी आबादी को सब्सिडी पर पानी दिया जा रहा है. बीस हजार लीटर मुफ्त जैसी योजनाएं शहरों के लिए हैं. ग्रामीण अपने हिस्सा का पानी भी नहीं पा रहा.

इस पूरी व्यवस्था में सबल-निर्बल का भी बड़ा भेद है. शहरी गरीब, झुग्गियों में रहने वाला टैंकरों के पानी के भरोसे जिंदा है. यहां उसे हजार दो हजार रुपए में एक टैंकर पानी मिलता है. सरकार की पूरी नीति शहर केंद्रित है. 

इससे गांवों में फोर्स्ड विस्थापन बढ़ रहा है और शहरों पर आबादी का बोझ बढ़ रहा है.

तो इस समस्या का उपाय क्या है?

हल धारा 144 में नहीं है. हल यह था कि लातूर उस्मानाबाद के इलाकों में गन्ने की खेती पर रोक लगाई जाती, कम पानी वाली फसलें उगायी जाती. सरफेस वाटर के संरक्षण पर व्यापक काम होता. तो यह स्थिति अपने आप बदल सकती थी.

क्या कोई ऐसा स्वावलंबन का सफल मॉडल है जिसका अनुसरण किया जा सके?

इसका सफल मॉडल भारत में है, राजस्थान में है. जल संरक्षण सिर्फ सरकार नहीं समाज का भी दायित्व है. इन इलाकों में लोगों ने 80 के दशक में अपने पानी को सहेजना शुरू कर दिया था. 

पानी एक बार जमीन में जाने लगा तो धरती खुद ही हरी हो गई. इस साल मानसून नहीं आया लेकिन गेंहू की फसल यहां लहलहा रही है क्योंकि धरती में नमी है.

विकेंद्रित सामुदायिक जल प्रबंधन के जरिए इस समस्या से निपटा जा सकता है.

पानी का अधिकार किसी उद्योगपति को देने की बजाय लोगों को पानी का मालिक बनाना होगा, उन्हें इस जिम्मेदारी का बोध कराना होगा, उन्हें अधिकार देना होगा. हमने राजस्थान में एक दो नहीं 1200 गांवों में इसे सफल बनाया है.

पानी की मौजूदा समस्या जारी रहती है तो किस तरह की दिक्कतें हमारे सामने आ सकती हैं?

जिस तरह की स्थितियां आज मध्य एशिया और अफ्रीका के कुछ देशों में हैं वही हालात यहां पानी के कारण पैदा हो सकते हैं. हमारी आबादी इतनी बड़ी है और उसमें असमानता इतनी ज्यादा है कि उम्मीद से पहले ही यह संकट हमारे सामने आ पहुंचेगा. 

अमीर-गरीब के बीच, गांव-शहर के बीच, पढ़े-अनपढ़ के बीच, राज्यों के बीच. इन सबके बीच सिर्फ पानी की वजह से टकराव हो सकते हैं.

आजकल सरकारों का जोर बोतलबंद पानी की तरफ है. क्या यह समस्या का इलाज है?

यह कोई विकल्प ही नहीं है. सबके लिए बोतलबंद पानी संभव नहीं है. इस देश में 60% लोग बोतलबंद पानी पर निर्भर ही नहीं रह सकते. सरकार जिस वजह से पानी के व्यापारियों को आगे बढ़ा रही है वह एकदम अलग मसला है. उसका लक्ष्य पानी की समस्या का समाधान नहीं है बल्कि समस्या से मुंह मोड़ना है.

पानी मूल अधिकार है. संविधान में दिए गए राइट टू लाइफ और राइट टू फूड का लेना देना राइट टू वाटर से है. पानी के अधिकार के बिना ये सभी अधिकार बेमानी हैं.

First published: 4 April 2016, 8:23 IST
 
अतुल चौरसिया @beechbazar

एडिटर, कैच हिंदी, इससे पूर्व प्रतिष्ठित पत्रिका तहलका हिंदी के संपादक के तौर पर काम किया

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