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# COP21: मोदी के जोरदार भाषण के बावजूद पश्चिम से मात खा रहा है भारत

निहार गोखले | Updated on: 10 February 2017, 1:46 IST
QUICK PILL
  • पेरिस जलवायु सम्मेलन अपने समापन की ओर है लेकिन भारत समेत विकासशील देश अभी तक विकसित देशों के साथ कोई सर्वसहमति बना पाने में असफल रहे हैं.
  • भारत ने पारदर्शिता, क्षतिपूर्ति, तकनीक और आर्थिक मदद जैसे मसले अंतिम ड्राफ्ट में शामिल करने का दबाव डाला था लेकिन विकसित देशों के समूह ने इसमें टांग अड़ा दी.

पेरिस में जारी अंतरराष्ट्रीय जलवायु सम्मेलन ने अजीब सा संदेश दिया है. सम्मेलन में हिस्सा लेने वाले सभी 196 राष्ट्रों ने को ग्लोबल वार्मिंग को कम करने पर सहमति जतायी है. यह काफी कुछ ऐसा है कि हम दिल्ली में हर आदमी से उम्मीद करें कि वह वायु प्रदूषण को कम करने के तरीको पर सहमति जताये. इसके लिए सबको थोड़ा-थोड़ा झुकना होगा. अंतत: इससे अंत में सभी लोग कुछ न कुछ जीतेंगे.  

लेकिन करीब 10 दिन से चल रहे पेरिस जलवायु सम्मेलन में भारत को कुछ भी हासिल नहीं हुआ है बल्कि हारने का दुर्भाग्य ही प्राप्त हुआ है. 

चारो तरफ लगाई जा रही कयासोंं के बीच यह स्पष्ट है की अब तक कुछ भी भारत के पक्ष में नही हुआ है. सम्मेलन अपनी समाप्ति के मुकाम पर है तो यह सवाल उठता है कि क्या भारत पेरिस में विषय से भटक गया है? 

क्या हैं मुद्दे?

तलवारें पेरिस सम्मेलन शुरू होने से पहले ही खिंच चुकी थीं. अधिकांश का आधार समझौते का ड्राफ्ट था जिसे शिखर सम्मेलन से पहले वर्किंग ग्रुप (ADP) ने बनाया था. ड्राफ्ट में कही गई ज्यादातर बातों पर भारत पहले से ही अमेरिका से असहमत था.

चार मुख्य मुद्दे दांव पर लगे हुए हैं.

भारत क्या चाहता है?



  • जवाबदेही: पेरिस संधि का अंतिम ड्राफ्ट सभी देशों की साझेदारी के साथ-साथ अमीर देशों की ऐतिहासिक जवाबदेही की भी बात करे. इसकी बजाय विकसित देश विकासशील देशों से और अधिक योगदान की मांग कर रहे हैं और खुद की महत्कांक्षाओं पर कोई रोक नहीं लगा रहे. भारत इसका विरोध कर रहा है.
  • पारदर्शिता : 2020 से एक ढांचा बने जो सबकी पारदर्शिता सुनिश्चित करे. (इससे पता चलेगा कि कि विभिन्न देश किस तरह से पेरिस समझौते को लागू कर रहे हैं), भारत जैसे गरीब देशों पर शुरुआत में इससे कम बोझ उठाना पड़ेगा.
  •  वित्त: विकसित देशों को वित्त और सस्ती तकनीकें देने के लिए प्रतिबद्ध करना. इससे दो फायदे होंगे एक तो ग्लोबल वार्मिंग कम होगी दूसरा इसके प्रभावों से निपटने में सुविधा होगी. भारत विकसित देशों के उस प्रस्ताव का विरोध कर रहा है जिसके मुताबिक विकासशील देशों में अग्रणी देशों (भारत, चीन जैसे) को जलवायु टैक्स देना होगा.
  • नुकसान और क्षतिपूर्ति: जलवायु परिवर्तन की वजह से विकासशील देशों को हुए नुकसान और क्षति के लिए विकसित देशों को जिम्मेदार ठहराना और साथ-साथ मुआवजे की मांग करना.

अभी तक कोई जीत नही

वार्ता के अंतिम चरण तक पहुंचने के बाद भी भारत इन मांगों में से किसी को भी मनवाने में सफल नहीं हो सका है.

एडीपी 2011 से ही पेरिस सम्मेलन के लिए ड्राफ्ट ट्रीटी की तैयारी कर रहा था. शुरुआत में यह ड्राफ्ट विकसित देशों के पक्ष में झुका हुआ था. विकासशील देशों ने इसे संतुलित करवाने के लिए कठिन संघर्ष किया.

पिछले हफ्ते सभी देशों के वार्ताकारों ने मिलकर इसमें कई सारे सुधार किए.

पिछले शनिवार को इसका अंतिम ड्राफ्ट तैयार हो सका. अब इस पर देशों के पर्यावरणमंत्री मिलकर चर्चा कर रहे हैं. शुक्रवार यानी 11 दिसंबर को इस संधि पर सबके हस्ताक्षर होने हैं.

जिन चीजों का भारत विरोध कर रहा था उन पर क्या हुआ:

  • जवाबदेही: पेरिस सम्मेलन में मुख्य मुद्दा पर्यावरण को हो रहे नुकसान की जवाबदेही तय करना था. भारत चाहता था कि अमीर और गरीब देशों के लिए अलग तरीके से जवाबदेही तय की जाए. जबकि अमीर देश चाहते थे कि सभी देश बराबर का बोझ उठाएं. समझौते के मसौदे में इस मुद्दे पर चुप्पी साधते हुए इसे अनसुलझे विषयों के खाते में डाल दिया गया है.
  • पारदर्शिता: किस देश ने कार्बन उत्सर्जन में कितनी कटौती की है इसको सार्वजनिक करने के सवाल पर समझौते में कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है. जबकि भारत अमीर और गरीब देशों के लिए अलग-अलग पारदर्शिता नीति चाहता था. वहीं अमेरिका चाहता है कि इसे सभी देशों के लिए अनिवार्य बना दिया जाए. 
  • वित्त और तकनीक: अमेरिका के नेतृत्व वाले समूह ने भारत समेत सभी विकासशील देशों से पर्यावरण सुधार के लिए आर्थिक सहयोग की मांग की है. अमेरिका की हमेशा से यही राय रही है. भारत उसकी राय से असहमत रहा है. ऐसे में पैसा पाने की बात तो छोड़ दीजिए अगर भारत पैसा देने से बच जाए तो उसके लिए यही सफलता मानी जाएगी. 
  • नुकसान और क्षतिपूर्ति: अमेरिका के नेतृत्व वाले समूह ने आधिकारिक रूप से प्रस्ताव रखा है कि भारत जैसे विकासशील देश भविष्य में पर्यावरण को क्षति पहुंचाने के लिए किसी तरह की क्षतिपूर्ति का दावा न कर सकें. अगर यह प्रस्ताव पारित हो गया तो इसके लिए विकसित देशों को जवादेह भी नहीं ठहराया जा सकेगा. इस पर किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि नुकसान और क्षतिपूर्ति का मुद्दा अनसुलझे विषयों में शामिल है.

अभी इस मसौदे पर बातचीत जारी है इसलिए 11 दिसंबर तक इस स्थिति में बदलाव हो सकते हैं. लेकिन जिस तरह की बयानबाजियां सम्मेलन की शुरुआत से ही हो रही हैं और जिस तरह विभिन्न मुद्दों को अनसुलझे विषयों की श्रेणी में डाला जा रहा है वह ज्यादा उम्मीद नहीं जगाते.

सम्मेलन की शुरुआत में दिए गए भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण की काफी तारीफ हुई थी. लेकिन सम्मेलन की समाप्ति तक तारीफ की जगह आलोचनाएं लेती जा रही हैं.

First published: 11 December 2015, 2:09 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

संवाददाता, कैच न्यूज़. जल, जंगल, पर्यावरण समेत नीतिगत विषयों पर लिखते हैं.

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