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दिल्ली में पानी की कहानी: जहां से पानी पैसे की मुहताज हुई

नलिन चौहान | Updated on: 22 May 2016, 13:30 IST
(कैच न्यूज)
QUICK PILL
  • मुगल कालीन दिल्ली का जल प्रबंधन और जल आपूर्ति प्रभावी था लेकिन दोहरी शासन व्यवस्था के दौरान राजधानी में अंग्रेजी प्रभाव बढ़ने के साथ जल वितरण और सीवरेज की स्थिति खराब हुई.
  • अंग्रेजों के दौर में दिल्ली में नल लगने लगे थे. बीसवीं सदी की शुरुआत में ही तब के विवाह गीतों में नल वाले पानी का विरोध दिखाई देता है. बारात जब पंगत में बैठती तो स्त्रियां गीत गाती थीं, \"फिरंगी नल मत लगवाय दियो.\"

सन 1803 में दिल्ली अंग्रेजी राज का हिस्सा बन गई थी और 1857 तक अंतिम मुगल बादशाह बहादुरशाह ज़फर की रुखसती तक देश में दोहरा शासन चला. मुगल कालीन दिल्ली का जल प्रबंधन और जल आपूर्ति प्रभावी था लेकिन दोहरी शासन व्यवस्था के दौरान राजधानी में अंग्रेजी प्रभाव बढ़ने के साथ जल वितरण और सीवरेज की स्थिति खराब हुई. पानी के प्रबंधन और रखरखाव के लिए साफ तौर पर जिम्मेदारी तय न होने और पर्याप्त संसाधनों के अभाव के कारण यह गिरावट आई.

अंग्रेजी शासन ने दिल्ली में मुगल दौर के मौजूद ढांचे और जल प्रबंधन तंत्र को पिछड़ा करार देते हुए न केवल ध्वस्त कर दिया बल्कि पानी पर स्वामित्व को लेकर एक अलग तरह का विचार कायम किया.

दिल्ली में अंग्रेजों के आगमन का राजधानी के जल प्रबंधन पर परिवर्तनकारी प्रभाव पड़ा. बिजली के आने और पहली बार सार्वजनिक जल की आपूर्ति और वितरण प्रणाली के लिए पानी उपलब्ध करवाने से जल प्रबंधन के पहले की विकेन्द्रीकृत प्रणाली बुरी तरह प्रभावित हुई.

पहले केंद्रीय सत्ता पानी के प्रबंधन को देखती थी और सामाजिक तौर पर पानी पिलाना एक धर्म का कार्य माना जाता था

इसके साथ ही ब्रिटिश टैक्स प्रणाली ने पानी के उपयोग को समाज की मूलभूत जरूरत और सत्ता की जिम्मेदारी से बदलते हुए इसे कमोडिटी में बदल दिया. यानी पानी पैसे से खरीदने की वस्तु हो गई.

उल्लेखनीय है कि अंग्रेजों से पहले केंद्रीय सत्ता पानी के प्रबंधन को देखती थी और सामाजिक तौर पर पानी पिलाना एक धर्म का कार्य माना जाता था. इस लिहाज से अंग्रेजों ने समाज में पानी के आधार पर एक नए वर्ग विभाजन की शुरूआत की.

प्राकृतिक संसाधनों पर सभी की पहुंच (सार्वजनिक उपयोग) की व्यवस्था की जगह ब्रिटिश राज ने सभी संसाधनों पर अपने पूर्ण स्वामित्व का दावा करने का प्रयास किया. अंग्रेजों के राज में पानी की दरों को भूमि-कर प्रणाली का एक अभिन्न हिस्सा बनने के कारण पानी पर टैक्स वसूला जाने लगगा.

1817 में अंग्रेजों ने दिल्ली शहर में नहर के पुर्ननिर्माण का कार्य शुरू किया, जिससे 1820 में फिर से शहर में पानी की आपूर्ति होने लगी. नहर के प्रवेश मार्गों की मरम्मत न करके केवल रिसाव को ठीक किया गया था. इस कारण से केवल नहर के पास स्थित कुओं को अतिरिक्त पानी मिला.

उसी समय यह बात तो महसूस की गई कि नहर से पानी के साथ कुओं के पानी की गुणवत्ता में सुधार हुआ. हालांकि अधिकांश कुओं को ताजे पानी की आपूर्ति नहीं होती थी. लिहाजा शहर के धनी लोगों ने अपने प्रयोग के लिए यमुना से पानी लेना शुरू कर दिया था.

इस बात से संकेत रूप में यह पता चलता है कि किस तरह उपनिवेशवाद की प्रक्रिया ने तत्कालीन जल प्रबंधन पर शासन के शक्ति संबंधों को बुरी तरह से प्रभावित किया.

दिल्ली में पानी की आपूर्ति में आंशिक रूप से सुधार करने के लिए नहरों के अधीक्षक, जॉन मेजर कोल्विन ने 1832 में लाल किले के सामने एक भूमिगत नहर की मरम्मत का सुझाव दिया. इसका लक्ष्य शहर के समूचे दक्षिण-पूर्वी हिस्से को ताजे पानी की आपूर्ति सुनिश्चित करना था. लेकिन इस प्रस्ताव पर वास्तव में कुछ काम नहीं हुआ.

अंग्रेजों ने शहर के नागरिकों को उपलब्ध करवाए जाने वाले पानी की आपूर्ति में किसी तरह से सुधार या पानी की गुणवत्ता को ठीक करने के लिए कुछ खास नहीं किया. इस मामले में अंग्रेजों का दृष्टिकोण पानी को टैक्स के दायरे मेें लाने का था.

1846 में अंग्रेजों ने लाल किला के सामने एक बड़े तालाब (एलेनबरो तालाब), जो आम तौर पर लाल डिग्गी के नाम से मशहूर था, का निर्माण किया. एक अंग्रेज अधिकारी सर एलेनबरो ने लाल किले के लाहौरी गेट के दक्षिण और दिल्ली गेट के बीच में यह तालाब बनवाया था.

साफ तौर पर यह एक सस्ता सौदा था क्योंकि इसमें किसी तरह के तकनीकी निर्माण की बजाय केवल मजदूरों को लगाना था. हालांकि इससे पानी की आपूर्ति में सुधार हुआ. “द सेवेन सिटीज आफ डेल्ही” पुस्तक में गार्डन रिजले हर्न ने इस तालाब का उल्लेख किया है. हरियाणा और राजस्थान में आज भी तालाब और हौज को डिग्गी कहे जाने की परंपरा है. अंग्रेजों से पहले करीब 350 तालाब दिल्ली में थे.

सच्चाई यह है कि नल लगते गए और जगह-जगह बने तालाब, कुएं और बावड़ियां खत्म होती गईं

1853 में लाल डिग्गी में अली मर्दन नहर से नियमित रूप से मीठे पानी की आपूर्ति किए जाने का सुझाव दिया गया. कुछ समय बाद तालाब का पानी खारा होने लगा. पीने के पानी का मामला अभी भी संदिग्ध ही बना रहा.

1857 की आजादी की पहली लड़ाई के बाद दिल्ली पर अंग्रेजों का दोबारा कब्जा हो गया. इसके बाद बदले की भावना में अंग्रेजों ने लाल किले के आस पास बने महलों व हवेलियों को ढहा दिया. इस अभियान के बाद धीरे-धीरे मिट्टी भर जाने और नहर से पानी की आमद खत्म होने के कारण एलेनबरो का तालाब खत्म हो गया.

यह अनुमान लगाया गया कि शहर की बढ़ती आबादी के साथ पानी की आपूर्ति की समस्याएं भी बढ़ेगी. उच्च शहरी मृत्युदर के कारण भारत में रहने वाले अंग्रेजों ने पानी की बेहतर और कुशल आपूर्ति के साथ पर्याप्त पानी की मांग रखी.

दिल्ली में बढ़ती स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं के कारण, अंग्रेजों की आबादी आबादी वाले सिविल लाइन्स और छावनी क्षेत्रों के लिए अलग से जल और मल की निकासी की व्यवस्था की गई. यह साफ तौर पर एक बड़ा परिवर्तन था क्योंकि अंग्रेजों ने पहली बार शाहजहांनाबाद के पुराने शहर के बाहर पानी की व्यवस्था के लिए कोई कदम उठाया था.

अंग्रेजों ने विशेष रूप से खुद के लिए पानी की जरूरत को पूरा करने के मकसद से यमुना से पानी लेने के लिए नए तंत्र के निर्माण की दिशा में प्रयास शुरू कर दिए थे.

सन 1869 में दिल्ली म्युनिसिपल कमेटी ने क्रास्टवेट नामक एक सिविल इंजीनियर द्वारा शहर में जल आपूर्ति की एक योजना का प्रस्ताव पेश किया. यह तीन सालोंं में पूरा होना था.

क्रास्टवेट ने इससे पहले कुछ समय के लिए डबलिन शहर में पानी की आपूर्ति का काम किया था. इसी क्रम में क्रास्टवेट ने अली मर्दन नहर के बेकार हो जाने के कारण पानी की आपूर्ति बढ़ाने के लिए शहर में नए कुओं को खोदे जाने की आवश्यकता पर जोर दिया.

हालांकि उसकी जलापूर्ति योजना में मुख्य हिस्सा यमुना नदी से पानी लेने पर केंद्रित था. उसका मानना था कि नदी के किनारे पर डूब के क्षेत्र में कुंए बनाकर पानी की नियमित आपूर्ति को सुनिश्चित की जा सकती है, जहां साफ और शुद्ध पानी की धारा बारहो महीने उपलब्ध होती है.

1643 में अली मर्दम खान ने सिंचाई के लिए बनी एक पुरानी नहर से पानी की आपूर्ति दिल्ली तक करने के लिए रोहतक नहर को शुरू किया था. 1870 में अंग्रेजों ने यमुना नदी पर ताजेवाला, जहां से नदी पहाडि़यों से मैदान में उतरती है, में एक तटबंध बनाकर इन दोनों नहरों को नए सिरे से तैयार किया.

पश्चिमी यमुना नहर अभी भी हरियाणा के मैदानी इलाकों से होते हुए दिल्ली पानी लाती है और रास्ते की कई एकड़ जमीन को सिंचित करती है. दिल्ली के दक्षिण क्षेत्रों में आगरा नहर से सिंचाई होती थी, जिसके लिए अंग्रेजों ने 1875 में ओखला में यमुना पर एक तटबंध बनाया. यह नहर अभी भी चल रही है.

अंग्रेजों के दौर में दिल्ली में नल लगने लगे थे. बीसवीं सदी की शुरुआत में ही तब के विवाह गीतों में नल वाले पानी का विरोध दिखाई देता है. बारात जब पंगत में बैठती तो स्त्रियां गीत गाती थीं, "फिरंगी नल मत लगवाय दियो."

लेकिन सच्चाई यह है कि नल लगते गए और जगह-जगह बने तालाब, कुएं और बावड़ियां खत्म होती गईं. इसकी जगह धीरे-धीरे अंग्रेजों के वॉटर वर्क्स ने ले ली.

अहमद अली का अंग्रेजी उपन्यास ”ट्विलाइट इन दिल्ली” में 1911 में अंग्रेजों के तीसरे दरबार के आयोजन का विस्तार से ब्यौरा दिया गया है. इस पुस्तक के अनुसार, वायसराय लॉर्ड हार्डिंग ने व्यक्तिगत रूप से दरबार की तैयारियों का जायजा लिया था.

लगभग 40 वर्ग किलोमीटर में फैले और 16 वर्ग किलोमीटर के घेरे में पूरे भारत से करीब 84,000 यूरोपीय और भारतीयों को 233 शिविरों में ठहराया गया था. उस साल बसंत के मौसम के बाद करीब 20,000 मजदूरों ने दिन रात एक करके इन शिविरों को तैयार किया था. इस दौरान 64 किलोमीटर की सड़क, शिविरों में पानी की व्यवस्था के लिए 80 किलोमीटर की पानी की मुख्य लाइन डाली गई.

अंग्रेजों की ओर से पानी को लेकर इस तरह की एक बड़ी पहल के बावजूद उस समय भी केवल आज की पुरानी दिल्ली इलाके को ही पानी उपलब्ध करवाया गया था. जबकि दिल्ली की एक तिहाई आबादी पीने के पानी की किसी भी तरह की सरकारी व्यवस्था से वंचित थी.

यह अंग्रेजों के आधुनिक समय का सामाजिक आयाम था, जहां शासक और शासित में नस्लीय भेदभाव और व्यवहार के स्तर पर गहरा अंतर था. इस बात का भी खुलासा होता है कि किस तरह पानी के मामले में उपनिवेशवादी सोच ने लोगों को न केवल आर्थिक और सामाजिक रूप से बल्कि स्थानिक रूप में भी प्रभावित किया.

First published: 22 May 2016, 13:30 IST
 
नलिन चौहान @catch_hindi

देश की राजधानी में जी टीवी के स्थानीय केबल चैनल सिटी टीवी से पत्रकारिता के जीवन की शुरुआत करने के बाद इंडिया टुडे हिंदी और फिर पीटीआई में नौकरी. संघ लोक सेवा आयोग से चयन के पश्चात दिल्ली सरकार की सूचना सेवा में उपनिदेशक के पद पर कार्यरत.

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