Home » एन्वायरमेंट » Don't blame climate change! Green policies made Tata Steel UK over a billion Euros
 

जलवायु परिवर्तन की नीतियों से टाटा स्टील यूके ने बनाए अरबों यूरो

निहार गोखले | Updated on: 10 February 2017, 1:50 IST
QUICK PILL
  • ब्रिटेन में अपना स्टील प्लांट बंद कर रही टाटा स्टील का कहना है कि जलवायु परिवतर्न की वजह से बन रही नीतियों की वजह से उसे अपने प्लांट को चलाने के लिए ज्यादा महंगी ऊर्जा खरीदनी पड़ रही है. इस कारण उनका स्टील चीन के मुकाबले ज्यादा महंगा हो जाता है.
  • हालांकि सच यह है कि कार्बन क्रेडिट के ओवर एलोकेशन से यूरोपीय देशों की कंपनियों ने 2008-14 में 8 अरब यूरो की कमाई की. 2008-14 के बीच टाटा स्टील यूके ने 1.12 अरब यूरो का मुनाफा कमाया.

कई सालों तक विकसित देश जलवायु में हो रहे परिवर्तन को अपनी इंडस्ट्री और नौकरी के बारे में बुरी खबर के तौर पर देखते रहे हैं. ब्रिटेन में अपना स्टील प्लांट बंद कर रही टाटा स्टील का कहना है कि जलवायु परिवतर्न की वजह से बन रही नीतियों की वजह से उसे अपने प्लांट को चलाने के लिए ज्यादा महंगी ऊर्जा खरीदनी पड़ रही है और इस वजह से उसका स्टील चीन में बन रहे स्टील से महंगा हो जाता है. चीन में कंपनियों को ऊर्जा के लिए अपेक्षाकृत कम कीमत चुकानी होती है.

वहीं एक नई रिपोर्ट बताती है कि यूरोपीय कंपनियों ने कार्बन ट्रेडिंग जैसे नीतियों का इस्तेमाल कर अरबों डॉलर मुनाफा कमाया. टाटा स्टील ने भी 2008-14 के बीच 1.12 अरब यूरो का मुनाफा कमाया है.

आखिर यूरोपीय कंपनियों ने जलवायु परिवर्तन से जुड़ी नीतियों का इस्तेमाल कर कैसे जबरदस्त मुनाफा कमाया?

क्या है कार्बन ट्रेडिंग?

यूरोप में इसकी शुरुआत 2005 में हुई ताकि उद्योग कार्बन उत्सर्जन में कटौती कर सकें. कार्बन ट्रेडिंग के तहत उत्सर्जन की एक मात्रा तय की जाती है और यह काम वैज्ञानिक और सरकार मिल कर करते हैं. कार्बन उत्सर्जन की मात्रा इसलिए तय की जाती है ताकि ग्लोबल वार्मिंग के असर को कम किया जा सके.

सभी इंडस्ट्र्री के लिए उसके उत्सर्जन की मात्रा तय कर दी जाती है. मसलन कोयला आधारित बिजली संयंत्रों के लिए यह मात्रा ज्यादा होती है जबकि टेक्सटाइल कंपनियों के लिए यह मात्रा कम रखी जाती है.

कार्बन ट्रेडिंग के तहत हर इंडस्ट्री के कार्बन उत्सर्जन की एक मात्रा तय कर दी जाती है

अब अगर किसी टेक्सटाइल कंपनी को 10 टन का कोटा मिला है और उसकी जरूरत सिर्फ 7 टन ही है. और दूरी तरफ एक कोयला आधारित संयंत्र है जिसे 17 टन का कोटा मिला है लेकिन उसकी उत्सर्जन जरूरत 20 टन है.

अब कार्बन ट्रेडिग फॉर्मूले के तहत टेक्सटाइल कंपनी अपना तीन टन अतिरिक्त कोटा कोयला आधारित कंपनी को बेच देगी और इसके लिए उसे एक रकम का भुगतान किया जाएगा. इस प्रक्रिया में टेक्सटाइल कंपनी को कमाई हुई तो वहीं कोयला से बिजली बनाने वाली कंपनी का काम सामान्य तरीके से चलता रहा. इस पूरी प्रक्रिया में उत्सर्जन की मात्रा उतनी ही रही जितनी तय की गई थी.

हर साल कंपनियों को यह बताना होता है कि उनके पास कार्बन क्रेडिट ज्यादा है ताकि वह साल के उत्सर्जन कोटा की भरपाई कर सके.

 क्रेडिट के ओवर एलोकेशन से इन देशों ने 2008-14 में 8 अरब यूरो की कमाई की

ईयू एमिशन ट्रेडिंग सिस्टम्स (ईटीएस) यूरोप के स्तर पर इस कारोबार की निगरानी करती है. जहां बड़े पैमाने पर कंपनियों के बीच कार्बन ट्रेडिंग होती है.

ईटीस से मुनाफा

हालांकि इस बाजार में भी कई खामियां हैं. डच रिसर्च एजेंसी सीई डेल्ट के मुताबिक यूरोपीय कंपनियों ने इस सिस्टम की खामियों का फायदा उठाकर खूब पैसा बनाया.

मसलन क्रेडिट के ओवर एलोकेशन से इन देशों ने 2008-14 में 8 अरब यूरो की कमाई की. ऑस्ट्रिया को छोड़कर सभी देशों को उनकी जरूरतों के लिहाज से ज्यादा कार्बन क्रेडिट का कोटा मिला.

सबसे ज्यादा फायदा स्पेनिश कंपनियों को मिला. इन कंपनियों ने करीब 1.6 अरब यूरो कमाए क्योंकि इन्हें मिला एक चौथाई कार्बन क्रेडिट अतिरिक्त था. इसके बाद ब्रिटेन की कंपनियों का नंबर रहा. ब्रिटेन की कंपनियों ने करीब 1 अरब यूरो का मुनाफा कमाया.

टाटा स्टील को कैसे हुआ फायदा?

2008-14 के बीच टाटा स्टील यूके ने 1.12 अरब यूरो का मुनाफा कमाया. हालांकि सीई डेल्ट का यह कहना है कि उसका अनुमान पूरी तरह से प्रमाणिक नहीं है.

कंपनी ने अतिरिक्त कार्बन क्रेडिट के आवंटन से 16.3 करोड़ यूरो कमाया जबकि सस्ता कार्बन क्रेडिट खरीदकर 2.1 करोड़ यूरो कमाए. कंपनी ने सबसे ज्यादा मुनाफा अपने खरीदारों से अनुमानित लागत वसूलकर कमाया. इस दौरान औसत मुनाफा 94.3  करोड़ यूरो रहा. यह स्टडी टाटा स्टील ब्रिटेन की दूसरी कहानी की तरफ इशारा करती है.

2008-14 के बीच टाटा स्टील यूके ने 1.12 अरब यूरो का मुनाफा कमाया

कई लोगों ने इस मौके का इस्तेमाल कर जलवायु परिवर्तन की नीतियों को कटघरे में खड़ा किया जबकि कुछ लोगों ने इसे अव्यावहारिक बताया. तर्क यह था कि महंगी ऊर्जा की वजह से ब्रिटिश स्टील वैश्विक बाजार में महंगी बिक रही है. जबकि चीन का स्टील सस्ता मिल रहा है क्योंकि वहां पर जलवायु परिवर्तन से जुड़ी नीतियां ज्यादा सख्त नहीं है.

लेकिन नया खुलासा इस तर्क के उलट जाता है.

  • हकीकत में टाटा स्टील यूके समेत ब्रिटिश कंपनियों ने जलवायु परिवर्तन से जुड़ी नीतियों के कारण जबरदस्त मुनाफा कमाया.
  • टाटा स्टील ने ग्राहकों से अनुमानित लागत वसूलकर ज्यादा मुनाफा कमाया.

इसका सीधा मतलब यह है कि चीन की प्रतिस्पर्धा के टाटा स्टील के तर्क में जलवायु परिवर्तन की नीतियों से कहीं अधिक उसके लालच का अंश हावी है. 

First published: 13 April 2016, 11:25 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

संवाददाता, कैच न्यूज़. जल, जंगल, पर्यावरण समेत नीतिगत विषयों पर लिखते हैं.

पिछली कहानी
अगली कहानी