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ट्रंप और जाॅनसन के नेतृत्व वाली दुनिया पर्यावरण की तबाही का सबब बन सकती है

निहार गोखले | Updated on: 29 June 2016, 14:06 IST
(कैच न्यूज)

डोनाल्ड ट्रंप के अमेरिका का राष्ट्रपति बनने की संभावना ने उन लोगों के बीच हलचल मचा दी है जो चाहते हैं कि 2100 एडी के बाद भी मनुष्य इस ग्रह के निवासी के रूप में जाने जाएं.

इसके बाद जेहन में एक और तस्वीर आती है सुनहरे बालों वाले एक और शख्स बोरिस जॉनसन की. ब्रेग्जिट और उसके फलस्वरूप ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन के इस्तीफे ने लंदन के पूर्व मेयर को इस शीर्ष पद के संभावित उम्मीदवार के रूप में सबसे आगे खड़ा कर दिया है.

अगर ट्रंप और जॉनसन अमरीका और ब्रिटेन के राष्ट्राध्यक्ष होते तो क्या होता? जब हम यह सवाल कर रहे हैं तब ध्यान रहे कि विश्व में होने वाले कार्बन उत्सर्जन का 2 प्रतिशत सिर्फ यूके में ही होता है. और ट्रंप फिलहाल हिलेरी क्लिंटन से लोकप्रियता के मामले में दोहरे अंकों वाले प्रतिशत से पीछे चल रहे हैं.

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लेकिन ट्रंप वे हैं जो पेरिस समझौते को रद्द करने के पक्षधर हैं और जॉनसन ने हाल ही में ब्रिटेन के राष्ट्रीय पार्कों में गैस और तेल के उत्खनन की अनुमति दी है.

हालांकि यह अतिशयोक्ति हो सकती है लेकिन अगर होने वाले नुकसान की गणना की जाय तो हमारे लिये आशंकाओं की अनदेखी करना बेहद मुश्किल होगा. आईये आपको पांच ऐसे उदाहरण देते हैं जो स्पष्ट कर देंगे कि अगर ट्रंप और जॉनसन सत्ता में आते हैं तो कैसे जलवायु के लिये विनाशक साबित हो सकते हैं:

जलवायु को लेकर नकारात्मकताः दोनों ही नेताओं ने जलवायु परिवर्तन के अस्तित्व को नकारने में जबरदस्त रुचि प्रदर्शित की है. ट्रंप का इस बारे में नकारात्मक रवैया जगजाहिर है.

लेकिन अगर आपको फिर भी आवश्यकता हो तो. बोरिस जॉनसन भी वर्ष 2013 में टेलीग्राफ में लिखे अपने एक लेख के चलते काफी चर्चा और आलोचना बटोर चुके हैं. इसमें उन्होंने जलवायु विज्ञान पर ही सवालिया निशान लगाया था.

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जॉनसन की भूमिका इसलिये भी बेहद संदिग्ध हो जाती है क्योंकि लंदन के मेयर के रूप में उन्होंने बीते वर्ष पेरिस जलवायु सम्मेलन में भाग लिया था जिसमें उन्होंने शहरों को अधिक सतत बनाने की दिशा में प्रयास करने और नए तरीके खोजने के लिये दुनियाभर के कई मेयरों के साथ बैठकों में हिस्सा लिया था.

अगर ब्रेग्जिट के मतदाताओं के रुख को देखा जाए तो जॉनसन जलवायु परिवर्तन की समस्या के पक्ष में विचार नहीं रखते. ब्रेग्जिट ने पहले ही जलवायु को लेकर नकारात्मक रुख रखने वालों को बढ़ावा दिया है और ऐसे में ट्रंप और जॉनसन का सत्ता में आना एक बड़ा प्रोत्साहन होगा.

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उत्खनन को बढ़ावा देना

ट्रंप और जॉनसन, दोनों ही प्राकृतिक गैस (शेल गैस) को निकालने की विधि के पक्षधर हैं. हालांकि गैस स्वयं में ऊर्जा का एक गैर-प्रदूषणकारी स्रोत है लेकिन उत्खनन जल स्रोतों को बड़े पैमाने पर प्रदूषित करने के अलावा अत्यधिक मात्रा में ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन करता है.

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अध्ययन बताते हैं कि सस्ती शेल गैस की उच्च उपलब्धता कॉर्बन डाई ऑक्साइड गैसों के उत्सर्जन में वृद्धि ही करेगी. जॉनसन ने मेयर के रूप में दिसंबर 2015 में पार्कों में उत्खनन की इजाजत दी थी.

बदलती राजनीति

हालांकि यूके एक बहुत छोटा उत्सर्जक है लेकिन वह एक प्रमुख अर्थव्यवस्था है. अबतक अंतरराष्ट्रीय जलवायु वार्ताओं में उसकी हिस्सेदारी सिर्फ यूरोपीय संघ के दायरे तक ही सीमित थी. अब जब वह इस संघ का हिस्सा नहीं है तो यूके एक बिल्कुल अलग इकाई के रूप में देखा जाएगा.

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जलवायु को लेकर नकारात्मक रुख रखने वाला बोरिस जॉनसन जैसा व्यक्ति अगर प्रधानमंत्री बनता है तो यह अपने आप में काफी खतरनाक होगा. यूके आने वाले दिनों में विकसित देशों की लॉबी मानी जाने वाली संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन का एक हिस्सा हो सकता है, जिसका एक सदस्य अमरीका भी है.

बदलती प्रतिबद्धताएं

पेरिस समझौते से पहले सदस्य देशों ने ग्लोबल वार्मिंग में कमी करने के लिए अपनी-अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त की थी. जिसे विभिन्न देशों द्वारा जलवायु में सुधार के लिए स्वत: तय की गई जिम्मेदारी या आईएनडीसी के नाम से जाना जाता है.

ईयू ने अपने सभी सदस्यों के लिये आईएनडीसी बनाई है. चुंकि ब्रिटेन अब इससे अलग हो चुका है लिहाजा उसकी आईएनडीसी के प्रति समर्पण को फिर से तय करना होगा. जाॅनसन जैसे नेता की मौजूदगी में यह काम और कठिन हो सकता है.

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वह स्थिति कहीं ज्यादा बदतर होगी जब कानूनी तौर पर बाध्यकारी न होने के चलते नई सरकार इसे नजरअंदाज करना शुरू कर देगी.

पेरिस समझौते का अनिश्चित भविष्य

ट्रंप ने कहा है कि वे पेरिस समझौते को रद्द कर देंगे. यूके ने भी अभी तक पेरिस समझौते की पुष्टि नहीं की है. इसलिए इस बात की प्रबल संभावना है कि बदले हुए राजनीतिक परिदश्य में इस प्रक्रिया में और अधिक देरी होगी.

First published: 29 June 2016, 14:06 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

Nihar is a reporter with Catch, writing about the environment, water, and other public policy matters. He wrote about stock markets for a business daily before pursuing an interdisciplinary Master's degree in environmental and ecological economics. He likes listening to classical, folk and jazz music and dreams of learning to play the saxophone.

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