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आधा-अधूरा राष्ट्रीय वन नीति का नया मसौदा

निहार गोखले | Updated on: 10 February 2017, 1:49 IST
QUICK PILL
  • भारत के पहले राष्ट्रीय वन नीति के मसौदे में औद्योगिक स्तर पर वन लगाने की बात कही गई है. यह एक ऐसा विचार है जिसे लेकर कई विकासशील देशों में विवाद होता रहा है क्योंकि इससे पानी की कमी, जमीन का नष्ट होना और आजीविका का संकट पैदा होता है.
  • औद्योगिक वृक्षारोपण मुख्य तौर पर ब्राजील, इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे देशों में होता है. इन देशों में यह सब 1970 से चल रहा है ताकि लकड़ी, पॉम ऑयल और कागज की आपूर्ति की जा सके.

भारत के पहले राष्ट्रीय वन नीति के मसौदे में औद्योगिक स्तर पर वन लगाने की बात कही गई है. यह एक ऐसा विचार है जिसे लेकर कई विकासशील देशों में विवाद होता रहा है क्योंकि इससे पानी की कमी, जमीन का नष्ट होना और आजीविका का संकट पैदा होता है.

एग्रो फॉरेस्ट्री, फॉर्म फॉरेस्ट्री और फॉरेस्ट इंडस्ट्री इंटरफेस इस नीति के कुछ हिस्से हैं जिसमें गैर वन्य इलाके में व्यावसायिक तरीके से वनों को लगाने की बात की गई है. 

नीति कहती है, 'जंगल आधारित इंडस्ट्री सेक्टर के ग्रोथ को तेज किए जाने की जरूरत है. वन आधारित इंडस्ट्री ने पहले से ही अपना बगान लगा रखा है और उन्होंने यह काम किसानों को साथ लेकर किया है. इस साझेदारी को और आगे बढ़ाए जाने की जरूरत है ताकि इंडस्ट्र्री को पारस्पारिक साझेदारी के तहत कच्चे माल की आपूर्ति की जा सके.

नीति में जंगल के बाहर के इलाकों में वन आवरण को दोगुना करने की बात की गई है. इससे भारत के लकड़ी के आयात को कम करने में मदद मिलेगी. नीति के मुताबिक लकड़ी अन्य पदार्थ के मुकाबले ज्यादा पर्यावरण हितैषी है. इसका कार्बन फुट प्रिंट ज्यादा नहीं होता है. 

नीति में वुड इज गुड यानी लकड़ी बेहतर विकल्प है, के नाम से जागरुकता अभियान चलाने की भी सिफारिश की गई है.

हालांकि इस तरह की बागवानी को लेकर अंतरराष्ट्रीय अनुभव थोड़ा उल्टा रहा है. इससे स्थानीय लोगों के साथ होने वाले टकरावों में बढ़ोतरी हुई है, पानी की उपलब्धता में कमी आई है और जमीन की गुणवत्ता में भी गिरावट देखने को मिली है. इसके अलावा अधिक मात्रा में कीटनाशक के इस्तेमाल से संक्रमण भी बढ़ा है.

औद्योगिक वृक्षारोपण मुख्य तौर पर ब्राजील, इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे देशों में होता रहा है

औद्योगिक वृक्षारोपण मुख्य तौर पर ब्राजील, इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे देशों में होता रहा है. इन देशों में यह सब कुछ 1970 से चल रहा है ताकि लकड़ी, पॉम ऑयल और कागज की आपूर्ति की जा सके.

पाम ट्री की की खेती की वजह से मलेशिया में 2015 में जंगल में भारी आग लगी थी. भारत की वन नीति में वन इलाकों से बाहर भी वनों को लगाए जाने का जिक्र किया गया है. दुनिया के अन्य देशों में इसकी आड़ में किसानों की जमीन हड़पने का काम किया जाता है.

2012 की एनवायरमेंट जस्टिस, ऑर्गनाइजेशन लायबिलिटीज एंड ट्रेड की रिपोेर्ट बताती है, 'सामाजिक और पर्यावरण न्याय को बागवानी के नकारात्मक पहलू से नुकसान होता है. इसके साथ ही सामाजिक, आर्थिक, पर्यावरण और सांस्कृतिक स्तर पर भी प्रभाव पड़ता है.' रिपोर्ट बताती है कि इस तरह के संघर्ष में सबसे अधिक नुकसान महिलाओं को होता है.

मसौदा नीति में हालांकि इस तरह के किसी भी संघर्ष का जिक्र नहीं किया गया है और नहीं इससे निपटने के बारे में कुछ कहा गया है. 2000 में यूएन फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गनाइजेशन ने कहा था कि औद्योगिक वृक्षारोपण से लकड़ी का विकल्प खोजने में मदद मिलेगी लेकि न यह पूरा काम सावधानी से किया जाना चाहिए.

रिपोेर्ट में कहा गया था, 'बिना किसी पर्याप्त योजना और बेहतर प्रबंधन के वनों का वृक्षारोपण गलत होगा. कुछ मामलों में इससे जमीन की संरचना में बदलाव आया और साथ ही पानी में कमी आई जिससे स्थानीय समुदाय को परेशानी होने लगी. जमीन के इस्तेमाल की वजह से होने वाले संघर्ष की वजह से कृषि को भी नुकसान हुआ.'

भारत की पहली वन नीति का मसौदा 30 जून तक लोगों की रायशुमारी के लिए रखा गया है

भारत की पहली वन नीति का मसौदा 30 जून तक लोगों की रायशुमारी के लिए रखा गया है. इसका असर दो से तीन दशकों के बाद दिखेगा. नया कानून 1988 की नीति की जगह लेगा. नीति को पर्यावरण मंत्रालय के तहत काम करने वाले इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ फॉरेस्ट मैनेजमेंट ने राज्यों की तरफ से मिले आंकड़ों के आधार पर तैयार किया है.

नीति के कुछ अहम प्रावधान

नेशनल बोर्ड ऑफ फॉरेस्ट्री की स्थापना की कल्पना की गई है. हालांकि वाइल्ड लाइफ बोर्ड की अध्यक्षता प्रधानमंत्री या फिर राज्यों के मुख्यमंत्रियों के पास होती है. इस संस्था को वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन एक्ट के तहत कानूनी शक्ति मिली हुई है.

इसमें वन अधिकारों को नजरअंदाज किया गया है. हालांकि 2015 के नोट में पुराने वन नीति के समीक्षा की बात की गई थी लेकिन मसौदा नीति में इसका कहीं भी उल्लेख नहीं किया गया है.

नीति में पर्यावरण हितैषी व्यवहार कोष को प्रोत्साहित करने के लिए ग्रीन टैक्स लगाए जाने का सुझाव रखा गया है ताकि वनिकी को वित्तीय समर्थन दिया जा सके. 

First published: 23 June 2016, 8:07 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

संवाददाता, कैच न्यूज़. जल, जंगल, पर्यावरण समेत नीतिगत विषयों पर लिखते हैं.

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