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वन्यजीव संरक्षण अधिनियम-2016: शिकारियों की मुश्किल और उद्यमियों की सहूलियत

निहार गोखले | Updated on: 7 February 2017, 8:19 IST
(एएफपी)

वन्यजीव अपराधियों की धरपकड़ करने में सरकार की मदद करके आप 25 लाख रुपए कमा सकते हैं! दरअसल वन्यजीव (संरक्षण और प्रबंधन) अधिनियम-2016 का ड्राफ्ट चाहता है कि वन्यजीव अपराधों की अग्रिम सूचना देने वालों को जुर्माने का 50 फीसदी दिया जाए.

इस ड्राफ्ट पर पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने विचार किया है. ड्राफ्ट ने वन्यजीव अपराधों पर जुर्माने की राशि भी बढ़ाई है, जो जेल की सजा के अलावा अधिकतम 50 लाख रुपए है (बाघ और ऐसी संकटग्रस्त प्रजातियों का बार-बार शिकार करने वालों पर).

पुराने नियमों में परिवर्तन

यदि अधिनियम का ड्राफ्ट पारित हो जाता है, तो यह वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की जगह लेगा. व्यक्तियों और समुदायों को अपनी जमीन 'सामुदायिक रिजर्व्स' में बदलने की अनुमति देकर यह कानून अभ्यारण्यों का विस्तार भी करेगा. ड्राफ्ट, जिसकी एक कॉपी का कैच ने मुआयना किया है, अभी सार्वजनिक नहीं की गई है और उसमें अब भी परिवर्तन की गुंजाइश बाकी है.

जहां इस ड्राफ्ट में शिकारियों के लिए कानून पहले से सख्त बनाने का प्रस्ताव है, वहीं यह उद्यमियों को सहूलियत भी देता है, जो मोदी सरकार के निवेश-समर्थक एजेंडे जैसा है.

वन्यजीव क्षेत्रों के आस-पास बड़े इंडस्ट्रियल प्रोजेक्ट्स लाने वालों को चेतावनी देने वाला वन्यजीव राष्ट्रीय बोर्ड को महज एक परामर्श संस्था में बदलने का प्रस्ताव है. इससे वन्यजीवों में कमी करना (दुर्बल जीवों को मारकर) भी आसान हो जाएगा. 

ड्राफ्ट की कुछ खास बातें:

नगद इनाम

वर्तमान कानून के मुताबिक जो शख्स वन्यजीव अपराधियों को ढंूढ़ निकालने या पकड़ने में मदद करेगा, उसे अपराधी के मुजरिम ठहराए जाने पर जुर्माने का 20 फीसदी इनाम में दिया जाएगा. नया ड्राफ्ट इस राशि को 50 फीसदी तक बढ़ाना चाहता है. यह एक और धारा जोड़ता है कि ऐसे शख्स को प्रदेश सरकार 10,000 रुपए की अतिरिक्त राशि दे.

जुर्माना

साथ ही वन्यजीव का शिकार करने वाले अपराधियों पर जुर्माना भी दुगुना करने का प्रस्ताव है. जहां वर्तमान कानून में जुर्माना 500 से लेकर 25,000 रुपए तक है, नए कानून में कम से कम जुर्माना 5,000 रुपए है और अधिकतम 50 लाख रुपए है. उच्चतम जुर्माना उन अपराधियों से वसूला जाएगा, जो बार-बार शिकार करते हैं या 'अनुसूची-1' की प्रजातियों के अवशेष के साथ पाए जाते हैं. इनमें बाघ, तेंदुआ, ग्वाल और साल आदि शामिल हैं.

चिड़ियाघरों में पशुओं को खाना खिलाने पर रोक

पुराने कानून में ज्ञेय अपराधों के खिलाफ मजिस्ट्रेट के पास शिकायत दर्ज कराने के लिए केवल दो वरिष्ठ अधिकारियों को अधिकार दिया गया था- पहला, राज्य के मुख्य वन्यजीव वार्डन और दूसरा, वन्यजीव संरक्षण के निदेशक.

नया कानून अन्य अधिकारियों के समूह को भी अधिकार देता है. इनमें चिड़ियाघर के निदेशक भी शामिल है, जो उन लोगों के खिलाफ शिकायत दर्ज करवा सकते हैं, जो चिड़ियाघर के जानवरों को चिढ़ाते, सताते या खाना खिलाते पाए गए हों.

सामुदायिक रिजर्व

अब आप जंगली इलाके को अपने अभ्यारण्य में बदल सकते हैं. सरकार 'सामुदायिक रिजर्व' की अनुमति देने की योजना बना रही है, जो जमीन पर पेड़-पौधे, जीव-जंतु, पारंपरिक या सांस्कृतिक संरक्षण के मूल्य और उनको व्यवहार में लाने के लिए व्यक्तियों या समुदायों की ओर से प्रस्तावित हो सकते हैं.

सामुदायिक रिजर्व तय करने की एक समिति होगी, जिसमें जमीन के मालिक, वन्य अधिकारी और विशेषज्ञ होंगे. ये रिजर्व की संरक्षण गतिविधियों पर चौकसी रखेंगे.

जानवरों की कटौती आसान

अब बुरी खबर. कानून राज्य सरकारों को वन्यजीवों को 'संभालने' के लिए नियम बनाने का अधिकार देता है. इसमें प्रतिकूल प्रबंधन के लिए जीवों का स्थानान्तरण भी शामिल है और संरक्षित क्षेत्र के बाहर जनसंख्या का प्रबंधन, जिसमें निजी और सार्वजनिक परिसर शामिल हैं- जब वे किसानों को परेशान करें, तब उन्हें मारे जाने की बात को मान्यता देता है.

वन्यजीव राष्ट्रीय बोर्ड कमजोर

वन्यजीव राष्ट्रीय बोर्ड प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली संस्था है, जिसे कम से कम साल में एक बार बैठक करनी होती है. जो भी इंडस्ट्रियल प्रोजेक्ट वन्यजीव क्षेत्र के करीब आ रहा है, उसे वन्यजीव राष्ट्रीय बोर्ड से अनुमति लेनी होगी.

बोर्ड की स्थाई समिति ऐसे प्रोजेक्ट्स को आंकने के लिए बराबर बैठक करती है, और साइट पर देखने जा सकती है. नया कानून इन सब से मुक्ति देता है. न तो वन्यजीव राष्ट्रीय बोर्ड को साल में एक बार बैठक करना आवश्यक है, उसके पास प्रोजेक्ट्स को आंकने का अधिकार भी नहीं है. यह अधिकार वन्यजीव प्रादेशिक बोर्ड को दे दिया गया है.

निकोबार जनजाति को संरक्षण नहीं

वतर्मान अधिनियम की एक धारा निकोबार द्वीप पर रह रहे अनुसूचित जनजाति के लोगों को शिकार की छूट देता है. यह छूट 1967 की अधिसूचना के माध्यम से दी गई थी. इस धारा को नए ड्राफ्ट से हटा दिया गया 

First published: 29 August 2016, 7:42 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

संवाददाता, कैच न्यूज़. जल, जंगल, पर्यावरण समेत नीतिगत विषयों पर लिखते हैं.

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