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पर्यावरण 2016: इन बिलों पर रहेगी खास नजर

निहार गोखले | Updated on: 10 February 2017, 1:48 IST
QUICK PILL
  • इस साल केंद्र सरकार पर्यावरण से जुड़ा नए कानून लाने की तैयारी में है. पर क्या ये कानून पर्यावरण की सुरक्षा की उम्मीद जगाते हैं?
  • इन कानूनों में से एक कानून ऐसा है जिससे नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल को कमजोर करेगा जबकि दूसरा सरकार की स्थिति को अौर भी अधिक मजबूत करेगा.

2016 में भारत सरकार की पर्यावरण को लेकर क्या योजनाएं है? नए साल की शुरुआत हो चुकी है तो यह जानना जरूरी है कि देश में पर्यावरण को किन बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है? क्या इन सभी चुनौतियों का जवाब दिल्ली स्थित संसद और सरकार के पास है?

नए साल में सरकार पर्यावरण को लेकर कई बिल लाने की तैयारी में है और यह कहीं से भी उम्मीद नहीं जगाते. इन कानूनों में से एक नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल को कमजोर करेगा जबकि दूसरा सरकार की स्थिति को अौर भी अधिक मजबूत करेगा.

जंगलों से शुुरुअात करते हैं:

कंपनसेटेरी एफॉरेस्टेशन फंड बिल-2015

वर्तमान स्थिति: बिल को लोकसभा में पेश किया जा चुका है. इसे संसदीय समिति के पास भेजा गया. उम्मीद की जा रही है कि जनवरी के अंत में इस बिल पर संसदीय समिति की सिफारिश आ जाएगी.

इस बिल का मतलब है कि खनन या उद्योगों के लिए अगर वनक्षेत्र की कटाई होगी तो जितने पेड़ काटे जाएंगे उतने ही पेड़ कहीं और लगाने होंगे. यह एक तरह से हरित क्षेत्र में होने वाले नुकसान का मुआवजा है.

साथ ही, सरकार नए पेड़ लगाने के लिए पेड़ काटने वाली कंपनी से पैसे लेगी. करीब एक दशक तक यह नीति प्रभाव में रही लेकिन इसे लागू करने के लिए मिले फंड का सही तरीके से इस्तेमाल नहीं हो पाया. इस वजह से करीब 35 हजार करोड़ रुपये यूं ही पड़े रह गए. 2015 का बिल इस फंड के इस्तेमाल को प्रोत्साहित करेगा.

इस बिल से नए पेड़ तो लग जाएंगे लेकिन जंगल विकसित होने में कम से कम एक सदी लगेंगे

हालांकि आलोचकों का कहना है कि सरकार बिल को लेकर तेजी से काम कर रही है लेकिन पहली नजर में यह पूरा विचार ही खामियों से भरा हुआ है.

नेशनल बोर्ड ऑफ वाइल्ड लाइफ के पूर्व सदस्य बताते हैं, 'आप एक ऐसी स्थिति की कल्पना कीजिए जहां ताजमहल को विशेष आर्थिक क्षेत्र में तब्दील कर दिया गया और मुआवजे के तौर पर किसी और जगह ताजमहल का निर्माण किया जा रहा है. यह बेकार की नीति है जिसका वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं है. '

पर्यावरण वैज्ञानिक का मानना है कि जंगलों को एक जगह से उठाकर दूसरी जगह नहीं ले जा सकते. पुराने जंगल, विविध फ्लोरा और फॉना के स्रोत होते हैं, जो जंगल को परिभाषित करते हैं.

इसके विपरीत पौधारोपण की प्रक्रिया में सिर्फ यूकेलिप्टस और सागौन का पेड़ लगाने की चर्चा है. ये पेड़ ना ही पारिस्थितिकी तौर पर असरदार है और ना ही जानवरों या अन्य पौधों के लिए अनूकुल हैं.

इसके अलावा पौधों की विभिन्न प्रजातियां को लगाने पर इसे पुराने जंगल में तब्दील होने के लिए कम से कम एक सदी लग जाएंगे. इसके अलावा एक बड़े जंगल को हमेशा छोटे-छोटे जंगलों की तुलना में बेहतर माना जाता है.

वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि अलग-अलग स्थानों पर जंगल बनाने से जानवरों को खास मदद नहीं मिलने वाली है. इसके अलावा आप एक हाथी के रहने वाले जगह पर कैसे पौधारोपण करेंगे.

वन्य अधिकार कार्यकर्ता एक महत्वपूर्ण मुद्दे को लगातार उठा रहे हैं. उनका कहना है कि वनीकरण की वजह से जंगल में रहने वाले समुदायों की खेती योग्य भूमि लगातार कम होती जा रही है.

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के पर कतरने की तैयारी

वर्तमान स्थिति: ड्रॉफ्ट तैयार है, इसे जल्द ही संसद में रखा जाएगा.

पांच साल पहले नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) की स्थापना हुई और इसने पर्यावरण की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है. सरकार के पर्यावरण और जंगल से जुड़े फैसले को एनजीटी में चुनौती दी जा सकती है और इसके फैसले को सिर्फ सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है. पिछले पांच साल में एनजीटी ने सरकार और उद्योगपतियों के खिलाफ कड़ेे फैसले लिए हैं.

अब सरकार एनजीटी के कानूनी आधार में ही संशोधन करना चाहती है. पर्यावरण कानून (संशोधन), 2015 के जरिए सरकार एनजीटी की शक्तियों को कम करना चाहती है. इसके लिए उसने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल कानून, 2015 और पर्यावरण (सुरक्षा) कानून 1986 में संशोधन की तैयारी कर ली है.

एनजीटी के फैसले को सिर्फ सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है. सरकार इस नियम को बदलने की तैयारी में है

एनजीटी का अस्तित्व बना रहेगा लेकिन सरकार द्वारा लिए फैसले को केवल नए न्याय प्राधिकरण में चुनौती दी जा सकेगी. नए न्याय प्राधिकरण के सदस्यों का चुनाव सरकार या उसके अधिकारी करेंगे.

वर्तमान में एनजीटी को काफी आजादी मिली हुई है. इसकी अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट/हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश करते हैं. एनजीटी से अलग बनने वाली व्यवस्था सरकार के रबर स्टांप की तरह होगी.

अन्य कानून

इन दोनों कानूनों के अलावा मोदी सरकार देश के हर हरित कानून में बदलाव करना चाहती है. इसका एक मात्र उद्देश्य व्यापार के रास्ते को सुगम बनाना है. इसका मतलब यह नहीं है कि बदलाव पर्यावरण के लिए अच्छा है.

पिछले साल नई सरकार बनने के बाद केंद्र ने पूर्व कैबिनेट सचिव टीएसआर सुब्रह्मण्यम की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई थी, जिसने अभी मौजूदा सभी बड़े पर्यावरण कानूनों को ‘रिव्यू’ किया था. कमेटी ने अपनी रिपोर्ट तीन महीने में सौंप दी थी. कमेटी ने तकरीबन सभी कानूनों में बदलाव की सिफारिश की.

इस समिति ने सिफारिश की थी कि नो-गो (जहां खनन की इजाजत नहीं होती) के दायको कम करके कोयला खनन से जुड़ी परियोजनाओं में तेजी लाई जाय.

इस रिपोर्ट को अगस्त महीने में संसदीय समिति ने यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि इसे बनाते वक्त बहुत सारे पक्षों की सलाह नहीं ली गई. सरकार को रिपोर्ट की खामियों में सुधार करने के लिए एक नए पैनल का गठन करने की सलाह दी गई है.

हालांकि इसमें बदलाव की कम ही गुजांइश है. सरकार टीएसआर रिपोर्ट को लेकर बेहद उत्साहित है और उसने इसकी सिफारिशों को लागू करने के लिए निजी कंसल्टिंग कंपनियों को हायर भी किया है.

सरकार की नई समिति जो भी संशोधन का सुझाव देगी उसमें बदलाव की उम्मीद कम ही नजर आती है.

First published: 3 January 2016, 10:30 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

संवाददाता, कैच न्यूज़. जल, जंगल, पर्यावरण समेत नीतिगत विषयों पर लिखते हैं.

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