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शिवाजी स्मारकः ताक पर पर्यावरण, मोदी करेंगे अनावरण

पार्थ एमएन | Updated on: 24 December 2016, 8:14 IST

छत्रपति शिवाजी टर्मिनस का नाम बदलकर छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस करने के बाद महाराष्ट्र सरकार ने अब एक नया मुद्दा छेड़ दिया है. 24 दिसम्बर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अरब महासागर में मराठा नरेश छत्रपति शिवाजी के बहुप्रतीक्षित स्मारक की आधारशिला रखेंगे.

शिवाजी की यह 192 मीटर उंची व राजभवन से करीब 1.5 किलोमीटर दूर, समुद्र में 3.5 किलोमीटर अंदर जाकर लगने वाली यह प्रतिमा संभवतः विश्व की सबसे उंची प्रतिमा होगी. हालांकि कर वसूली से होने वाली 3500 करोड़ की आय के अलावा यह मुंबई शहर का सबसे बड़ा ऑर्डर साबित होगा.

प्रभावित होगा समुद्रतट

पर्यावरणविदों का मानना है कि इससे समुद्र तट का 110 किलोमीटर हिस्सा बुरी तरह प्रभावित होगा. इससे एक तो समुद्री जनजीवन पर बुरा असर पड़ेगा, दूसरा, हजारों मछुआरों की आजीविका बर्बाद हो जाएगी. वनशक्ति नाम के एक एनजीओ से जुड़े स्टालिन दयानंद ने बताया कि प्रदूषण नियंत्रण मंडल को इस प्रोजेक्ट में इस्तेमाल होने वाली मिट्टी की जांच करनी चाहिए.

उन्होंने कहा, 'कानून के मुताबिक अगर कोई समुद्री जमीन पर अपना हक जताता हो तो उसके लिए समुद्री मिट्टी का ही उपयोग करना चाहिए. लेकिन सच्चाई यह है कि अगर प्रोजेक्ट अधिकारी समुद्री मिट्टी का इस्तेमाल करेंगे तो यह कभी पूरा ही नहीं होगा क्योंकि समुद्री मिट्टी की लागत कई गुना अधिक होती है. इस प्रोजेक्ट से 54 करोड़ टन कीचड़ बनेगा, जिसे नष्ट करने की कोई योजना नहीं है.

शिवाजी मेमोरियल बनाने में अपनाई जाने वाली प्रक्रिया में कई तरह के जहरीले तत्व घुलने से समुद्र का पानी गंदा होना तय है. समुद्री जीवन बर्बाद हो जाएगा और सबसे ज्यादा असर मछुआरों पर पड़ेगा. अखिल महाराष्ट्र मच्छीमार कृति समिति के दामोदर तंदेल ने कहा, '80,000 से ज्यादा मछुआरों की रोजी-रोटी इस समुद्र से ही चलती है. समुद्र के जिस 42 एकड़ में यह प्रोजेक्ट बनना प्रस्तावित है वह हमारे मछली पकड़ने लिए बहुत महत्वपूर्ण है. इस इलाके में मछली, प्रॉन, लॉब्स्टर व क्रैब सहित 40

प्रजातियों के झींगे मिलते हैं. महाराष्ट्र से सालाना 2000 करोड़ रुपए की मछली का निर्यात होता है. इसमें से आधी दक्षिण मुंबई के दो बंदरगाहों से निर्यात की जाती हैं. हम स्मारक के विरोध में नहीं हैं, बस इसकी लोकेशन हमारे लिए चिंताजनक है.’

तंदेल ने कहा, समुद्र में रोजमर्रा का व्यापार करने वाली 450 छोटी और 1500 बड़ी नौकाओं के मालिक शिलान्यास के लिए यहां आने पर मोदी को काले झंडे दिखाएंगे. इस दौरान सासून, भउचा ढाका और क्रॉफर्ड जैसे तीन बड़े थोक मछली बाजार बंद रहेंगे. करीब 100 खुदरा बाजार भी हड़ताल करेंगे.

मरीन ड्राइव पर मानव श्रृंखला बना कर मछुआरिनें प्रधानमंत्री को काले झंडे दिखाएंगी. पुलिस तंदेल के कर्मचारियों को कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दे रही है लेकिन वे किसी भी कीमत पर पीछे हटने को तैयार नहीं हैं. उन्होंने कहा, ‘हम अपने संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग कर रहे हैं.'

छत्रपति शिवाजी महाराज स्मारक समिति के प्रमुख विनायक मेते ने कहा, 'स्मारक बनाने के लिए राज्य सरकार ने पिछले माह ही इस समिति का गठन किया है. समिति ने मछुआरों के सारे आरोपों को निराधार बताया है. साथ ही राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (नीरी) और राष्ट्रीय समुद्र शास्त्र संस्थान (नियो) को इस संदर्भ में स्पष्टीकरण देते हुए सकारात्मक रिपोर्ट भी सौंप दी है.

एनजीटी में लंबित है मामला

हालांकि नेशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल में इस संबंध में एक मामला लंबित चल रहा है. याचिकाकर्ताओं के वकील असीम सरोडे ने राज्य सरकार के बचाव में कही गई दलीलों में कमियों को उजागर किया है. वे कहते हैं, ‘नियो ने एक ओर तो सुधार के उपाय करने को कहा है व दूसरी ओर कहा है कि इससे पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं पहुंचेगा. क्या ये दोनों ही बातें विरोधाभासी नहीं हैं?

उन्होने कहा, 'इससे इस संगठन की साख प्रभावित होती है क्योंकि यह अपनी जानकारी व ज्ञान का इस्तेमाल सरकार के लिए कर रहे हैं.’ फरवरी 2015 में नियो और नीरी ने प्रदेश के पर्यावरण पर असर (ईआईए) को लेकर एक रिपोर्ट तैयार की थी. साल भर किए गए अध्ययन में पाया गया कि इस प्रोजेक्ट से सड़कों पर यातायात बढ़ जाएगा. साथ ही वायु प्रदूषण और ठोस कचरा भी.

सरोडे ने इसके बाद सरकार को जनसुनवाई से मिली छूट पर उंगली उठाई. पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने अपने हलफनामे में कहा है कि इस प्रोजेक्ट में जनता का पुनर्वास करना शामिल नहीं है और चूंकि स्मारक स्थल आबादी क्षेत्र से दूर स्थित है, इसलिए जन सुनवाई निरस्त कर दी गई.

पर्यावरण मंत्रालय के अनुमति पत्र में कहा गया है कि स्मारक स्थल पर किसी तरह की कोई तलाशी नहीं ली जानी चाहिए. सरोडे ने कहा, 'सरकार को प्रोजेक्ट के निर्माण के लिए पानी जरूरत पड़ेगी क्योंकि समुद्र का खारा पानी तो निर्माण में काम नहीं लिया जा सकता. उनके मुताबिक सरकार ने मैरीटाइम बोर्ड से सम्पर्क किया था, जिसके अनुसार पानी के भीतर एक सुरंग बनानी होगी लेकिन बिना तलाशी के किसी भी प्रकार सुरंग बनाना संभव नहीं है.

सरकार ने 22 दिसम्बर को एनजीटी को जवाब देने के लिए कुछ और समय भी मांगा था. अब उसे इसके लिए 31 जनवरी तक का समय दिया गया है. इस स्मारक से पर्यावरण के नुकसान के अलावा पहले से ही भीड़-भाड़ वाले इलाके दक्षिणी मुंबई में यातायात की भी गंभीर समस्या भी उत्पन्न हो जाएगी. स्टालिन का कहना है कि अगर मरीन ड्राइव पर पर्यटन स्थल बनाया जाएगा तो पार्किंग स्थल भी बनाने होंगे. इससे कोलाबा और मरीन ड्राइव का इलाका पूरी तरह से बंद हो जाएगा.

गंभीर चिंता का विषय

इस समस्या से निपटने के लिए हो न हो वे मरीन ड्राइव पर ही पार्किंग स्थल बना लेंगे. इससे मरीन ड्राइव का पर्यावरण बिगड़ना तय है. राजनीतिक टिप्पणीकारों का मानना है कि भाजपा मुंबई में होने वाले निकाय चुनाव के लिए यह आधार तैयार कर रही है. स्टालिन ने कहा, ‘वोटों की सस्ती राजनीति के लिए शिवाजी स्मारक जैसा महंगा खर्च किया जा रहा है. अगर वाकई में योद्धा के प्रति सम्मान जताना है तो इसका दसवां हिस्सा ही खर्च करके रायगढ़ के किले का निर्माण करो.’

पिछले कुछ समय से यह स्मारक सुर्खियों में है. विशेषज्ञों ने पर्यावरण और यातायात को लेकर गंभीर चिंता जताई हैं, 'आम जनता पर इसका भार 3,500 करोड़ रुपए आता है. चेंज डॉट ओआरजी पर

15,000 से ज्यादा लोगों की एक याचिका के अनुसार, यही पैसा किसी अच्छे काम जैसे शिक्षा, बुनियादी सुविधाओं, भोजन वगैरह पर खर्च किया जा सकता था. खास तौर पर तब जब राज्य में भुखमरी से मौतें हो रही हैं और कृषि संबंधी समस्याएं चल रही हैं.

राज्य विधानसभा में मुख्यमंत्री फड़नवीस ने कहा, ‘जब हम अपने पिता से ही यह नहीं पूछ सकते कि भोजन पर कितना खर्च होता है तो फिर हम शिवाजी के लिए स्मारक बनवाने में आ रहे खर्च का हिसाब कैसे रख सकते हैं. वे हमारे गौरव हैं और उनकी याद में स्मारक बनवाना उचित है.’

मुख्यमंत्री नहीं मानेंगे, क्योंकि प्रधानमंत्री यहां शिलान्यास करने आने वाले हैं. उन्हें इस बात की परवाह नहीं है कि मछुआरों पर क्या गुजरेगी या फिर पर्यावरण को क्या खतरा होगा. तंदेल पूछते हैं, 'प्रधानमंत्री विकसित देशों की यात्रा करते रहते हैं, क्या उन्होंने वहां यह नहीं देखा कि उन देशों में पर्यावरण की रक्षा किस प्रकार की जाती है?'

First published: 24 December 2016, 8:14 IST
 
पार्थ एमएन @catchhindi

Parth is a special correspondent with the Los Angeles Times. He has a degree in mass communication and journalism from Journalism Mentor, Mumbai. Prior to journalism, Parth was a professional cricketer in Mumbai for 10 years.

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