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पर्यावरण से जुड़े एनसीआरबी के आंकड़े कितने सच्चे?

निहार गोखले | Updated on: 10 February 2017, 1:47 IST
(एएफपी)

भारत में पर्यावरण से जुड़े अपराधों की संख्या 2014 में 5,846 थी जो 2015 में 5,156 रह गई. इस तरह इसमें एक साल के भीतर 12 फीसदी की कमी आ गई.

इन आंकड़ों को राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो- एनसीआरबी) सालाना जारी करता है, जिसका मूल आधार प्रादेशिक ब्यूरो से मिले आंकड़े और सूचनाएं होती हैं. प्रादेशिक ब्यूरो को ये जानकारियां स्थानीय पुलिस स्टेशनों से मिलती है, जहां सबसे पहले अपराध दर्ज किए जाते हैं.

पर्यावरण से जुड़े अपराध वे अपराध हैं, जो आगे वर्णित इन पांच अधिनियमों के तहत दर्ज किए जाते हैं- भारतीय वन अधिनियम,1927, वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम-1972, पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम-1986, वायु प्रदूषण (निवारण और नियंत्रण) अधिनियम-1981, और जल प्रदूषण (निवारण और नियंत्रण) अधिनियम-1974.

सही मायनों में देखा जाए तो इन आंकड़ों को हमारे देश की क्षेत्रीय और सामयिक विचारधारा के अलावा पर्यावरण से जुड़े नियमों की जानकारी देनी चाहिए. पर अपराध के ये आंकड़े समाधान की बजाय, सवाल ज्यादा उठाते हैं. मेघालय, नागालैंड, उड़ीसा, सिक्किम, त्रिपुरा और पांडिचेरी सहित 5 प्रदेशों और 4 केंद्र शासित प्रदेशों में पर्यावरण से जुड़े अपराध शून्य दर्ज किए गए हैं. क्या यह सच हो सकता है? खासकर खनन-संपन्न उड़ीसा के संदर्भ में?

दिल्ली, जहां हर सर्दी में प्रदूषण 'खतरनाक' स्तर पर पहुंच जाता है वहां भी वायु अधिनियम के तहत कोई अपराध दर्ज नहीं है. जल अधिनियम के तहत, पूरे देश में महज 10 मुकदमे दर्ज किए गए, जबकि जल स्रोतों का प्रदूषण इन दिनों राष्ट्रीय चिंता का विषय है. इसी तरह वनों से समृद्ध राज्य, उत्तर-पूर्व और गोवा में वन अधिनियम के तहत कोई अपराध दर्ज नहीं हुए. 

यहां एनसीआरबी रिपोर्ट से और व्यावहारिक बुद्धि से परे कुछ पर्यावरण संबंधी आंकड़े पेश हैं:

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  • वायु प्रदूषण अधिनियम के तहत दिल्ली में दर्ज मुकदमों की संख्या.
  • पूरे देश में इस दौरान वायु प्रदूषण से जुड़े सिर्फ 50 मुकदमे दर्ज किए गए. इनमें से 42 महाराष्ट्र, राजस्थान, बंगाल में 3-3, और झारखंड और कर्नाटक में 1-1 मामले दर्ज किए गए.
  • इन मुकदमों को केंद्र में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा और संबंधित राज्यों में दर्ज करना होता है.

10

  • जल प्रदूषण अधिनियम के तहत पूरे भारत में दर्ज मुकदमों की संख्या.
  • गुजरात और पश्चिम बंगाल में 3-3 मुकदमे दर्ज किए गए. बाकी के तेलंगाना, राजस्थान, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश में दर्ज किए गए.
  • दिलचस्प है कि जिन राज्यों से गंगा बहती है, वहां किसी में (पश्चिम बंगाल को छोड़कर) कोई मुकदमा दर्ज नहीं हुआ है. लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि वहां नदी पूरी तरह से प्रदूषण मुक्त है.

100

  • कोर्ट के मुकदमों की संख्या, जो केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा प्रदूषण कानूनों के उल्लंघन के खिलाफ ड़े गए. इनमें से 40 मुकदमे अकेले नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के हैं.
  • इससे उल्लंघन की उस संख्या का पता चलता है, जो प्रत्यक्ष था. केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आदेश-पत्र में वायु और जल अधिनियम लागू करना शामिल है.
  • स्मरण रहे, इस संख्या में राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड शामिल नहीं हैं, जबकि राज्यों में इनकी ही वास्तव में जिम्मेदारी होती है.

2074

  • पर्यावरण से जुड़े कुल मुकदमो की संख्या, जो एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक राजस्थान में दर्ज किए गए.
  • ये भारत में दर्ज कुल मुकदमों का 40 फीसदी है. ये मुकदमे आमतौर पर जंगलों से लकड़ी और वन-उत्पाद लेने के संबंध में हैं.
  • राजस्थान में 27 लाख हेक्टेयर वन हैं, भारत के वनों का 4 फीसदी, पर 47 फीसदी मुकदमे भारतीय वन अधिनियम-1927 के तहत हैं.
  • ये अपराध राजस्थान के पर्यावरण संबंधी मुकदमों का 88 फीसदी है.

1779

  • उत्तर प्रदेश में दर्ज पर्यावरण संबंधी मुकदमों की संख्या.
  • यह भारत में कुल पर्यावरण संबंधी मुकदमों का 34 फीसदी है. इसका अर्थ है कि राजस्थान और यूपी दोनों के मुकदमे मिलाएं तो ये भारत के कुल पर्यावरण संबंधी अपराधों का तीन-चौथाई है.
  • राजस्थान की तरह यूपी के ज्यादातर मुकदमे वन अधिनियम के तहत दर्ज हैं.

829

  • वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम-1972 के तहत दर्ज मुकदमों की संख्या. इनमें शिकार के केस हैं.
  • आधे मुकदमे राजस्थान और उत्तर प्रदेश में दर्ज हुए हैं.
  • बिहार, गोवा और उत्तरपूर्व के राज्यों में कोई मुकदमा दर्ज नहीं किया गया.

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  • पर्यावरण (प्रदूषण ) अधिनियम के तहत 17 राज्यों और 6 केंद्र शासित प्रदेशों में दर्ज होने वाले मुकदमों की संख्या.
  • इनमें असम, बिहार, उत्तराखंड, और छतीसगढ़ एवं उड़ीसा जैसे खनिज संपदा संपन्न राज्य भी शामिल हैं.
  • यह अधिनियम पर्यावरण का उल्लंघन और तटीय क्लीयरेंस सहित पर्यावरण से जुड़े सभी तरह का नुकसान कवर करता है.

First published: 31 August 2016, 2:45 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

संवाददाता, कैच न्यूज़. जल, जंगल, पर्यावरण समेत नीतिगत विषयों पर लिखते हैं.

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