Home » एन्वायरमेंट » Even-odd second phase: Pvt cars don't contribute proven again
 

सम-विषम 2.0: सिर्फ निजी कारें ही दिल्ली की हवा नहीं बिगाड़ रहीं

निहार गोखले | Updated on: 21 May 2016, 16:21 IST
QUICK PILL
  • सम-विषम के दूसरे चरण ने इस तथ्य को पुख्ता किया है कि दिल्ली के वायु प्रदूषण की सबसे बड़ी वजह कारें नहीं हैं. 15 से 30 अप्रैल तक दिल्ली में हवा की गुणवत्ता में कोई खास सुधार नहीं हुआ है.
  • वायु प्रदूषण का समाधान तब तक नहीं हो सकता जबतक दिल्ली बार्डर से बाहर प्रदूषण के अन्य स्रोतों मसलन धूल, कारखाने, निर्माण उद्योग, कचरा-खेत का भूसा आदि जलाने पर लगाम नहीं लगती.

सम-विषम के दूसरे चरण ने इस तथ्य को और पुख्ता किया है कि दिल्ली के वायु प्रदूषण की सबसे बड़ी वजह कारें नहीं हैं. 15 से 30 अप्रैल तक दिल्ली में हवा की गुणवत्ता में कोई खास सुधार नहीं हुआ है. 

लेकिन अंतिम रूप से वायु प्रदूषण के प्रमुख कारक पीएम 2.5 का औसत स्तर नीचे नहीं गिरा. अप्रैल 2015 की तुलना में तो कुछ इलाकों में यह बल्कि ज्यादा ही नजर आया. बेशक सम-विषम का नियम कार मालिकों द्वारा सार्वजनिक परिवहन के इस्तेमाल और जाम से निजात दिलाने का बेहतरीन तरीका है. 

पढ़ेंः दुनिया के 15 सबसे प्रदूषित शहरों में से 10 भारत में हैं

लेकिन हमारे पॉलिसीमेकर्स के लिए सम-विषम का पाठ बहुत साफ हैः यह तब तक वायु प्रदूषण का समाधान नहीं बन सकता जबतक वे दिल्ली बार्डर से बाहर प्रदूषण के अन्य स्रोतों मसलन धूल, कारखाने, निर्माण उद्योग, कचरा-खेत का भूसा आदि जलाने पर लगाम नहीं लगाते. 

हवा की गुणवत्ता पर कोई प्रभाव नहीं

15 से 30 अप्रैल तक सम-विषम का दूसरा चरण था. दिल्ली के प्रदूषण के प्रमुख कारण यानी विभिन्न आकार के पर्टिकुलेट मैटर (पीएम) के स्तर में सम-विषम के चलते कोई गिरावट नहीं आई.

केंद्र सरकार का सिस्टम ऑफ एयर क्वालिटी एंड वेदर फोरकास्टिंग एंड रिसर्च (एसएएफएआर) के वायु गुणवत्ता आंकड़े बताते हैं कि प्रदूषण के ट्रेंड्स में 15 अप्रैल के बाद से कोई बदलाव नहीं आया.

आंकड़ें बताते हैं

  • पीएम 2.5 का प्रतिदिन औसत स्तर अधिकतम मान्य सीमा (60 माइक्रोग्राम्स प्रति क्यूबिक सेंटीमीटर) से ज्यादा ही रहा.
  • 17 से 25 अप्रैल तक पीएम 2.5 पिछले साल से कम रहा.
  • लेकिन 26 अप्रैल से यह बढ़ा और बीते वर्ष के स्तरों से आगे निकल गया.
  • पीएम 2.5 से ज्यादा खतरनाक पीएम 1 के स्तर (1 माइक्रॉन डायमीटर से कम) में भी बढ़ोत्तरी हुई.
  • दिल्ली सरकार के अंतर्गत आने वाले दिल्ली पॉल्यूशन कंट्रोल कमेटी द्वारा तैयार किए गए आंकड़े भी बहुत बेहतर नहीं हैं.
  • 15 से 30 अप्रैल के बीच पीएम 2.5 का औसत स्तर बीते वर्ष इसी दौरान आनंद विहार, आरके पुरम, पंजाबी बाग और मंदिर मार्ग की तुलना में ज्यादा था. सिविल लाइंस और आईजीआई एयरपोर्ट के दो केंद्रों पर डीपीसीसी के आंकड़े उपलब्ध नहीं थे.

सम-विषम ने क्यों नहीं किया काम?

सम-विषम की नीति मुख्यत: निजी कारों पर लागू होती है. डिप्लोमैटिक, सेना और व्यावसायिक वाहनों के अलावा अकेली महिला और अन्य दोपहिया वाहनों को इससे छूट है.

लेकिन आम धारणा से अलग दिल्ली के वायु प्रदूषण में निजी कारों का सबसे ज्यादा योगदान नहीं है. दिल्ली के प्रदूषण की सबसे ताजा शोध ने इसपर मोहर लगा दी है. दिल्ली सरकार ने 2013 में आईआईटी कानपुर को यह जांच सौंपी थी कि वो पता लगाए कि दिल्ली के वायु प्रदूषण के किन स्रोतों का कितना योगदान है.

आईआईटी कानपुर द्वारा 2015 के अंत में यह रिपोर्ट सौंपी गई. इसके मुताबिक दिल्ली के कुल प्रदूषण में पीएम 2.5 के लिए 10 फीसदी योगदान कारों का है. पीएम 2.5 (यानी 2.5 माइक्रॉन डायमीटर के कण) के महीन कण फेफड़ों के जरिये रक्तधाराओं में पहुंच जाते हैं और यहां तक की दिल की बीमारी का कारण बनते हैं.

टेरी ने अपने अध्ययन में कहा था कि वायु प्रदूषण में कारों का प्रभाव काफी कम है

दिल्ली की बेहद खराब आबोहवा की सबसे बड़ी बड़ी वजह ट्रक और धूल हैं. सड़कों की धूल का इसमें 38 फीसदी योगदान है. हवा की गुणवत्ता बिगाड़ने में कारखानों-उद्योगों की हिस्सेदारी 13 फीसदी जबकि घरेलू स्रोतों की 10 फीसदी है. अन्य स्रोतों में कचरा जलाना, कंक्रीट बैचिंग आदि शामिल होते हैं. 

इसका मतलब कि दिल्ली के वायु प्रदूषण में सुधार के लिए सम-विषम नीति को लागू करने में 90 फीसदी अन्य कारणों को दरकिनार कर दिया गया.

हवा की गुणवत्ता को किनारे रखें तो सम-विषम ने इससे बढ़कर दिल्ली वालों का दिमाग परिवर्तित जरूर कर दिया है. 1 से लेकर 15 जनवरी तक सम-विषम के पहले चरण के बाद दिल्ली सरकार ने कहा था पीक्स हैड फालेन. लेकिन अप्रैल में यह भी नहीं दिखाई दिया.

पहले सम-विषम प्रयोग के बाद केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने कहा, “यह स्पष्ट हो चुका है कि इस अवधि में प्रदूषण के अन्य स्रोतों द्वारा किए गए उत्सर्जन का दिल्ली की आबोहवा प्रभावित करने में प्रमुख भूमिका है. पूर्णरूप से यह कहा जा सकता है कि जहां सम-विषम नीति के जरिये दिल्ली के प्रदूषण स्तर में कुछ गिरावट आने की संभावना है, यह भी सुनिश्चित है कि किसी एक कारक या कार्य के जरिये दिल्ली के वायु प्रदूषण के स्तर में तुरंत कमी नहीं लाई जा सकती. इसलिए जरूरी है कि सभी पक्षों को ध्यान में रखते हुए एक समेकित रास्ता निकाला जाए ताकि हवा की गुणवत्ता में जरूरी सुधार हो सके.”

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में भारत स्टेज 4 उत्सर्जन मानकों को ट्रकों पर भी लागू करना होगा

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के सामने भी बोर्ड ने इस बात को दोहराया था. जनवरी में लागू सम-विषम नीति के बाद द एनर्जी एंड रिसोर्स इंस्टीट्यूट (टेरी) ने अपने अध्ययन में कहा था कि वायु प्रदूषण में कारों का प्रभाव काफी कम है और "वायु गुणवत्ता के मानकों को पाने के लिए इस नियम पर भरोसा नहीं किया जा सकता." 

टेरी की सलाह थी कि दिल्ली के बाहर जाकर विस्तृत राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में भारत स्टेज 4 उत्सर्जन मानकों को ट्रकों पर भी लागू करना होगा. इसमें पिछले बीएस 3 की तुलना में ज्यादा कड़े मानक हैं. इसके साथ ही 24X7 बिजली मुहैया कराई जाए ताकि डीजल जनरेटर सेट न चलें क्योंकि वे पीएम की काफी मात्रा उत्सर्जित करते हैं.

दिल्ली के आसपास चल रहे भारी संख्या में उद्योगों में प्रदूषण नियंत्रित किया जाए. कृषि कचरा को जलाने पर नियंत्रण रखा जाए हालांकि यह जाड़ों में प्रदूषण की मुख्य वजह है, अप्रैल में नहीं.

First published: 21 May 2016, 16:21 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

Nihar is a reporter with Catch, writing about the environment, water, and other public policy matters. He wrote about stock markets for a business daily before pursuing an interdisciplinary Master's degree in environmental and ecological economics. He likes listening to classical, folk and jazz music and dreams of learning to play the saxophone.

पिछली कहानी
अगली कहानी