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वनों पर अधिकार खत्म करने से वंचितों का अधिकार खत्म होगा

विशाख उन्नीकृष्णन | Updated on: 12 January 2016, 8:18 IST
QUICK PILL
  • वन अधिकार अधिनियम 2006 से लाखों वनवासियों और वनाश्रितों को सुरक्षा प्रदान की गयी थी. लेकिन महाराष्ट्र सरकार ने साल 2014 में केंद्रीय कानून को कमजोर करने वाला कानून बनाया है.
  • सामाजिक कार्यकर्ता इस अधिनियम को कमजोर करने की आलोचना करते हुए कहते हैं कि इससे लाखों वनवासियों को मिला अधिकार छिन जाएगा.

भारत में जंगल की परिभाषा विवादास्पद है. भारत सरकार का पर्यावरण मंत्रालय पिछले दो दशकों से यह परिभाषित करने की कोशिश कर रहा है कि जंगल क्या है?

जंगल में रहन वालों के अधिकारों की रक्षा के लिए साल 2006 में वन अधिकार अधिनियम लागू हुआ.

हाल ही एक राष्ट्रीय दैनिक में आई खबर के अनुसार केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्रालय ने इस अधिनियम की व्याख्या की है. इसके मुताबिक कई राज्यों के वन विभागों का स्थानीय जंगलों पर मनमाना अधिकार हो जाएगा.

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सवाल ये है कि सरकार एक ऐसा कानून को क्यों कमजोर बना रही है जिससे लाखों वनवासियों को लाभ हो सकता है?

ये मुद्दा पहली बार 2014 में तब उठा जब महाराष्ट्र सरकार ने एक कानून बनाकर यह सुनिश्चित किया कि राज्य के जंगलों पर राज्य सरकार का अधिकार बना रहे. राज्य के कानून में कई केंद्रीय कानूनों की अनदेखी की गयी.

महाराष्ट्र सरकार ने केंद्रीय वन अधिकार अधिनियम 2006 को कमजोर करने वाला कानून बनाया है

जनजातीय कार्य मंत्रालय ने माना कि राज्य का कानून वन अधिकार अधिनियम के कई प्रावधानों का उल्लंघन करता है. मंत्रालय पहले ही यह साफ कर चुका है कि जंगलों पर वहां रहने वालों का ही अधिकार है.

मंत्रालय के रुख को देखते हुए केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी और प्रकाश जावडेकर ने जनजातीय कार्य मंत्री जुएल उरांव को इस मामले में एक पत्र लिखा. जावडेकर के पास पर्यावरण मंत्रालय का भी प्रभार है लेकिन गडकरी के मंत्रालय का जंगल और वनवासियों से कोई लेना देना नहीं.

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वन अधिकार अधिनियम वनवासियों और वनाश्रितों को निम्नलिखित अधिकार देता है:

  1. जिस किसी के पास सरकारी लीज़ है और उसे गैर-कानूनी रूप से वन विभाग ने ले लिया है या जिसकी ज़मीन पर वन विभाग या राजस्व विभाग ने मुकदमा चल रहा है, वो अपनी जमीन पर दावा कर सकता है. ऐसी जमीन किसी को स्थांतरित की जा सकती है. इसे बस उत्तराधिकार में नहीं दिया जा सकता.
  2. ये कानून वनाश्रितों को जंगल से जड़ी-बूटियां और चिकित्सा में प्रयोग होने वाले वनोत्पाद इकट्ठा करने की छूट देता है.
  3. इस कानून के पहले जंगल की रक्षा का पूरा अधिकार जनजातीय विभाग के पास था. इस कानून से जंगल में रहने वालों को जंगल के देखरेख और रक्षा का अधिकार मिला. उन्हें सामुदायिक वनोत्पाद और वन्यजीवों की रक्षा का भी अधिकार दिया गया.

इस कानून के बाद वनवासियों को वन माफिया, कारोबारियों और जमीन कब्जा करने वालों से सुरक्षा मिली.

मंत्रालय द्वारा इस कानून को कमजोर बनाने को लाखों वनवासियों के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है.

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सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर ने कहा, "इस कानून से लाखों वनवासियों और वनाश्रितों को सुरक्षा मिली थी. पिछले महीने जनजातीय कार्य मंत्रालय ने हमें आश्वासन दिया था कि किसी भी स्थिति में हम इसे कमजोर नहीं करेंगे. ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि एक महीने के अंदर वो दबाव के आगे झुक गये."

जनजातियों के अधिकारों के लिए काम करने वाले शंकर गोपालकृष्णन भी मेधा से सहमत हैं. वो कहते हैं, "पहले भी इस कानून को कमजोर करने की कोशिश की जाती रही है. और जब से एनडीए सरकार केंद्र में आयी है इसे कमजोर करने की गंभीर कोशिश की जा रही है."

ईशा खांडेलवालः मुझे लगता है कि राज्य इस कानून को लागू नहीं करना चाहते. इसे कमजोर करने से इसके असल मकसद को झटका लगेगा

गोपालकृष्णन के अनुसार पिछले पांच सालों में खदान, बांध और कारोबारी परियोजनाओं की वजह से करीब पांच लाख हेक्टेयर जंगल नष्ट हो गया.

वो कहते हैं, "महाराष्ट्र सरकार ने मार्च 2014 में नए नियम बनाने की कोशिश की. उन्हें पता था कि वो वन अधिकार अधिनियम का उल्लंघन नहीं कर सकते इसीलिए उन्होंने जंगल पर नियंत्रण के लिए नया कानून बनाया. जिसके बाद जनजातीय कार्य मंत्रालय ने इस मामले में हस्तक्षेप किया."

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गोपालकृष्णन इस बात से चिंतित हैं कि दूसरे राज्य भी महाराष्ट्र की राह पर चल सकते हैं. मध्य प्रदेश पहले ही इस तरह के कानून का प्रस्ताव ला चुका है.

ईशा खांडेलवाल जगदलपुर स्थित लीगल एड ग्रुप से जुड़ी हैं. संस्था जनजातियों को कानून सहायता उपलब्ध कराती है. ये पूरा इलाक़ा माओवाद से प्रभावित है.

ईशा कहती हैं, "मुझे लगता है कि अभी राज्य इस कानून को नहीं लागू करना चाहते. इस कानून को कमजोर करने से इसके असल मकसद को झटका लगेगा."

जंगलों में रहने वाले का हमेशा शोषण होता रहा है. वन अधिकार अधिनियम से उन्हें सुरक्षा मिली थी. इस कानून को बनाते समय सरकार ने कहा था कि इसका मक़सद आदिवासियों और वनवासियों के साथ हुए 'ऐतिहासिक अन्याय की भरपायी' करना है.

पाटकर कहती हैं कि पिछले महीने इस कानून के बने नौ साल हुए, मुझे उम्मीद है कि ये आखिरी साल नहीं होगा.

First published: 12 January 2016, 8:18 IST
 
विशाख उन्नीकृष्णन @sparksofvishdom

A graduate of the Asian College of Journalism, Vishakh tracks stories on public policy, environment and culture. Previously at Mint, he enjoys bringing in a touch of humour to the darkest of times and hardest of stories. One word self-description: Quipster

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