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सूखा: मराठवाड़ा से बुंदेलखंड तक एक ही कहानी

निहार गोखले | Updated on: 10 February 2017, 1:50 IST

देश के कई हिस्से सूखे की चपेट में हैं और दिनोंदिन यह संकट गहराता दिख रहा है. कैच ने देश के अलग अलग हिस्सों से प्रकाशित होने वाले अखबारों से सूखे और पानी की किल्लत से जुड़ी कुछ खबरे इकट्ठा की हैं. ये खबरें अकाल की भयावहता को कहीं ज्यादा नजदीक और गहराई से सामने रखती हैं.

रेल से पहुंचा पानी पहुंचाने में असफल है लातूर नगरपालिका

लातूर को भेजी गयी पानी वाली रेल के बारे में बड़ी चर्चाएं हुई. मराठवाड़ा के इस कस्बे में पानी की आपूर्ति महीने-डेढ़ महीने में एक बार हो पा रही है. ऐसे में नयी पहल करते हुए रेल के जरिये लातूर पानी भेजा जा रहा है. 

राज्य सरकार हर रोज एक करोड़ लीटर पानी वहां भेज रही है, इसमें से 25 लाख लीटर पानी रेल से भेजा जा रहा है. लेकिन क्या यह पानी लातूर के सभी लोगों को मिल पा रहा है? 

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लोकसत्ता अखबार में छपी खबर के मुताबिक लातूर की नगरपालिका उस पानी को सही तरीके से नहीं वितरित नहीं कर पा रही है. योजना यह है कि टैंकर भेज कर हर तीन दिन में हर परिवार को कम से कम 200 लीटर पानी पहुंचा दिया जाए.

लेकिन खबर के मुताबिक वहां कई ऐसी भी जगहें हैं जहां सात दिन में एक बार पानी पहुंच रहा है. यही नहीं, अखबार के मुताबिक कुछ जगहों पर तो एक बार पानी पहुंचने में 25 दिन तक लग रहे हैं.

कजरत के लोगों की कोशिश- वैगन नहीं, जार ही सही

इस सूखे में कजरत के लोग भी अपने तरीके से मदद करने की कोशिश कर रहे हैं. कजरत मुंबई और लोनावाला के बीच पड़ता है और यहां से लातूर 400 किलोमीटर दूर है. 

यहां के कुछ लोग रेल के जरिये लातूर पानी भेजना चाहते थे. लेकिन रेल में एक वैगन पानी भर कर भेजने का खर्च 26 हजार रुपये पड़ता है, जो दे पाने में ये लोग सक्षम नहीं हैं. 

Consume court/Live/File

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लेकिन पानी भेजना तो है ही. ऐसे में वे मुंबई-लातूर एक्सप्रेस से हर रोज 50 जार (1000 लीटर) पानी लातूर भेज रहे हैं. यह पानी रेलवे स्टेशन के आसपास रहने वाले लोगों को बांट दिया जाता है और खाली जार वापसी वाली ट्रेन से कजरत आ जाते हैं.

सूख गये मराठवाड़ा के 80 फीसदी जलाशय, हजारों गांवों में जल संकट

मराठवाड़ा में 11 बड़े, 75 मंझोले और 729 छोटे जलाशय हैं, लेकिन दैनिक लोकमत की एक खबर के मुताबिक इनमें से 80 फीसदी जलाशय सूख चुके हैं. कुल मिला कर इन जलाशयों में 2320 लाख घन मीटर पानी बचा है, जो एक मंझोले आकार के बाँध की क्षमता से भी कम है. 

जो पानी बचा है, वह इन जलाशयों की कुल क्षमता का महज तीन फीसदी है. ऐसे में मई आते-आते इनमें इतना पानी भी नहीं बचेगा कि सरकार टैंकर भरवा सके. चूंकि बहुत से जलाशय पूरी तरह सूख गये हैं, ऐसे में उन पर निर्भर हजारों गांव जल संकट से जूझ रहे हैं.

बुंदेलखंड में स्टेशनों से गायब पानी, सूखे कंठ यात्रा को मजबूर यात्री

सूखे की वजह से बुंदेलखंड क्षेत्र के कई रेलवे स्टेशनों पर पीने के पानी की आपूर्ति नहीं हो पा रही है. पत्रिका के दो पत्रकारों ने दोपहर की गर्मी के दौरान सागर से जरुआखेड़ा तक बिलासपुर-भोपाल एक्सप्रेस से 34 किलोमीटर की यात्रा की. 

इस दौरान उन्होंने पाया कि बीच में पड़ने वाले तीन स्टेशनों के 20 से अधिक नलों में पीने का पानी नहीं था. जरुआखेड़ा में रेलवे के नलों में एक बूंद पानी नहीं था, पर चालू हालत में एक हैंड पम्प मिलने से प्यासे यात्रियों की आंखें चमक उठीं. 

तस्वीरें: सूखा और पानी संकट से जूझता भारत

लेकिन रेल के पांच मिनट रुकने के दौरान अधिक लोग पानी नहीं भर पाये और अधिकांश यात्रियों को बगैर पानी ही वापस रेलगाड़ी में बैठ जाना पड़ा.

झमाझम बारिश के लिए बुंदेलखंड में बाबा ने ली जमीन के अंदर समाधि

मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले (जो बुंदेलखंड क्षेत्र में ही पड़ता है) में एक स्थानीय बाबा ने इस मानसून में अच्छी बारिश की खातिर जमीन के अंदर 48 घंटे के लिए समाधि ले ली. 

Bundelkhand drought

पत्रिका की खबर के मुताबिक यह घटना रविवार को गोरइया गांव में हुई, जो छतरपुर जिला मुख्यालय से पांच किलोमीटर दूर है. इस बाबा को श्री 108 नारायणदास बैरागी पंचनामी अखाड़ा के नाम से जाना जाता है और ऐसा इन्होंने पहली बार नहीं किया है. 

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इससे पहले वह जमीन के अंदर 36 घंटे की समाधि ले चुके हैं. बाबा ने बताया कि उन्होंने ऐसा पूरे बुंदेलखंड में अच्छी बारिश के लिए किया है, जहां जल संकट की वजह से आम आदमी का जीवन कठिन हो गया है और लोग अपना घर छोड़ कर दूसरी जगह जाने लगे हैं.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी गहरा रहा है जल संकट

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी जल संकट बढ़ता दिख रहा है. पत्रिका की एक खबर के मुताबिक बिजनौर में गंगा बैराज में पानी (अप्रैल के महीने में ही) 10 साल के सबसे निचले स्तर पर चला गया है. 

जल स्तर नीचे जाने की वजह यह है कि न केवल बिजनौर बल्कि हरिद्वार और आस-पास के पहाड़ी क्षेत्रों में बारिश कम हुई थी. ऐसे में हरिद्वार से आने वाला पानी भी घटा है. इसका असर क्षेत्र में चारे की बुवाई पर पड़ा है और पशुओं को पर्याप्त चारा नहीं मिल पा रहा है. 

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इसकी वजह से पशुओं में बीमारियां बढ़ी हैं और दूध का उत्पादन कम हुआ है. इसका बुरा असर उन परिवारों पर पड़ा है जो दूध बेच कर दो वक्त के खाने का इंतजाम करते हैं.
First published: 20 April 2016, 8:33 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

संवाददाता, कैच न्यूज़. जल, जंगल, पर्यावरण समेत नीतिगत विषयों पर लिखते हैं.

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