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गुजरात में सूखा है, लेकिन सरकार है कि मानती ही नहीं?

निहार गोखले | Updated on: 10 February 2017, 1:49 IST

गुजरात के कम से कम दर्जन भर जिले जल संकट से जूझ रहे हैं, बावजूद इसके सरकार यहां सूखा घोषित करने से बच रही है. इसके बजाय उसने इन जिलों को ''अभावग्रस्‍त'' घोषित कर दिया है, जो सूखे से अलग एक श्रेणी है.

ध्‍यान रहे कि यह हाल तब है जब सूखे से निपटने में लापरवाही के लिए आनंदीबेन पटेल की सरकार को सुप्रीम कोर्ट ने भी आड़े हाथों लिया था.

अदालत ने जब यह पाया कि राज्‍य में खाद्य सुरक्षा कानून लागू नहीं है, तो उसने सवाल उठाया था कि क्‍या गुजरात वास्‍तव में भारत का ही अंग है.

इसके अलावा, हरियाणा और बिहार समेत कुछ अन्‍य राज्‍यों की तरह गुजरात ने भी केंद्र सरकार के साथ अपने राज्‍य में सूखा संबंधी आंकड़े साझा नहीं किए हैं. इसका नतीजा यह हुआ है कि सुप्रीम कोर्ट में एनडीए सरकार द्वारा सूखे पर दायर उस हलफनामे में गुजरात का नाम शामिल नहीं है, जो कहता है कि फिलहाल भारत की 33 करोड़ आबादी सूखे की चपेट में है.

गुजरात सरकार ने तीन जिलों राजकोट, जामनगर और देवभूमि द्वारका के 526 गांवों को ''अभावग्रस्‍त'' घोषित किया

इसी पर प्रतिक्रिया देते हुए कोर्ट ने सूखा प्रभावित क्षेत्रों के विस्‍तृत विवरणयुक्‍त एक हलफनामा दायर न करने के लिए राज्‍य को लताड़ लगायी और कहा, ''आप गुजरात हैं, इसका मतलब ये नहीं कि आप जो चाहें सो करते रहें.''

प्रधानमंत्री के गृहराज्‍य की सच्‍चाई हालांकि यही है. राज्‍य के कई हिस्‍सों में मानसून के दौरान औसत से कम वर्षा हुई. अक्‍टूबर 2015 में ही एक सरकारी फसल पूर्वानुमान केंद्र ने 19 जिलों में सूखे की भविष्यवाणी कर दी थी.

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इसके बावजूद कई महीने बाद एक अप्रैल को जाकर गुजरात सरकार ने तीन जिलों राजकोट, जामनगर और देवभूमि द्वारका के 526 गांवों को ''अभावग्रस्‍त'' घोषित किया. यह घोषणा भी शायद हकीकत से मुंह चुराने की एक कवायद साबित हुई क्‍योंकि इस अधिसूचना को जारी किए जाने के दो सप्‍ताह के भीतर 15 अप्रैल को जल संसाधन मंत्री ने आठ जिलों के 829 गांवों में पेयजल संकट को दूर करने के लिए उपायों की घोषणा की. राज्‍य बीजेपी अध्‍यक्ष विजय रुपानी ने इसके लिए 70 करोड़ रुपये के एक मास्‍टरप्‍लान की भी उस वक्‍त घोषणा की थी.

पिछले हफ्ते सरकार ने 468 और गांवों को ''अभावग्रस्‍त'' घेषित किया जिससे ऐसे गांवों की कुल संख्‍या अब 994 पर पहुंच चुकी है. इनमें 301 कच्‍छ जिले में हैं जो सूची में ताज़ा हैं जबकि बाकी गांव राजकोट, जामनगर और देवभूमि द्वारका में हैं. अब अहमदाबाद के पास के गांवों से भी पानी की कमी की खबरें आ रही हैं.

केंद्रीय कृषि मंत्रालय के अंतर्गत काम करने वाले महालनोबिस राष्‍ट्रीय फसल पूर्वानुमान केंद्र ने अक्‍टूबर 2015 में ही गुजरात के 19 जिलों को ''हलके'' या ''मध्‍यम'' सूखे से ग्रस्‍त घोषित कर दिया था. एक तुलना करें तो उसी महीने मराठवाड़ा के भीषण अकाल को भी ''हलका'' या ''मध्‍यम'' सूखा ही कहा गया था.

गुजरात के 63 जलाशय पूरी तरह सूख चुके हैं जबकि 45 में 5 फीसदी से भी कम पानी रह गया है

गुजरात के जलाशय तेजी से सूखते जा रहे हैं. राज्‍य सरकार के 22 अप्रैल तक के आंकड़ों के हिसाब से देखें तो यहां के जलाशय अपनी क्षमता के एक-चौथाई तक ही भरे हुए रह गए हैं. इस आंकड़े में नर्मदा बांध शामिल नहीं है, जहां पहले के मुकाबले आज 551 मिलियन घन मीटर पानी कम हो चुका है.

कम से कम 63 जलाशय पूरी तरह सूख चुके हैं जबकि 45 में 5 फीसदी से भी कम पानी रह गया है. केवल तीन बांध- सुरेंद्रनगर, कच्‍छ और महिसागर जिलों में- आधी क्षमता से ज्‍यादा भरे हुए हैं.

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सबसे बुरा प्रभावित सौराष्‍ट्र का इलाका है. यहां के जलाशय बमुश्किल 8 फीसदी भरे हुए हैं. क्षेत्र के 11 जिलों में से छह में जलाशय तकरीबन खाली हो चुके हैं जबकि बाकी राज्‍यों के जलाशयों में 11-20 फीसदी तक पानी बचा है.

कुल मिलाकर सौराष्‍ट्र के जलाशयों में फिलहाल 219 एमसीएम पानी बचा है, जो कि पिछले साल के पानी के मुकाबले 33 फीसदी कम है. समूचे राज्‍य में जलाशयों में पिछले साल उपलब्‍ध पानी के मुकाबले 1277 एमसीएम कम पानी है.

भावनगर जिले में जो भी जल संसाधन बचे हैं, उन्‍हें केवल पेयजल उपयोग तक सीमित कर दिया गया है. सिंचाई के लिए पानी नहीं बचा है, तो किसानों ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है.

पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने सूखा घोषित न करने के लिए गुजरात सरकार की खिंचाई की थी

गुजरात उन राज्‍यों में है जहां हर तीन साल पर सूखा पड़ता है. केंद्र सरकार की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में यह सबसे तेज़ सूखे की दर है.

स्‍वराज अभियान द्वारा दर्ज एक मुकदमे पर हुई पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने सूखा घोषित न करने के लिए गुजरात सरकार की खिंचाई की थी.

अभियान द्वारा जारी एक बयान के अनुसार राज्य सरकार ने सात अप्रैल को कोर्ट में स्‍वीकार किया कि उसने सूखे का आकलन करने में देरी कर दी है, लेकिन कहा कि यह कवायद गांव के स्‍तर पर की जानी होगी और इसके लिए उसके पास पर्याप्‍त कार्यबल नहीं है. इसके जवाब में अदालत ने कथित रूप से कहा, ''कार्यबल की कमी? इस देश में सवा अरब लोग हैं.''

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इस दौरान केंद्र सरकार ने गुजरात सरकार के ऊपर ही इस फैसले का जिम्‍मा छोड़ दिया है. सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के दौरान अतिरिक्‍त सॉलिसिटर जनरल पीई नरसिम्‍हा ने कहा कि सूखा घोषित करना राज्‍य की जिम्‍मेदारी है.

साउथ एशियन नेटवर्क ऑन डैम्‍स, रीवर्स एंड पीपुल के समन्‍वयक हिमांशु ठक्‍कर कहते हैं, ''गुजरात में जल संकट बेहद गंभीर है और विशेष रूप से तीन क्षेत्रों में व्‍याप्‍त है- सौराष्‍ट्र, कच्‍छ के कुछ इलाके और पूर्वी आदिवासी पट्टी. पानी की मुख्‍य आपूर्ति यहां चांपाकलों से होती है जो 300 मीटर गहरे हैं, लेकिन इनका जल स्‍तर भी नीचे गिरता जा रहा है. नियम-कानून के मुताबिक राज्‍य केवल 300 मीटर गहरे चांपाकलों के लिए ही अनुदान दे सकता है.'

First published: 3 May 2016, 11:20 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

संवाददाता, कैच न्यूज़. जल, जंगल, पर्यावरण समेत नीतिगत विषयों पर लिखते हैं.

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