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पेरिस समझौता: संगे-ए-मील बनेगा या पिछले सम्मेलनों की तरह दम तोड़ देगा?

निहार गोखले | Updated on: 6 October 2016, 7:05 IST
(मलिक सज्जाद/कैच न्यूज़)
QUICK PILL
  • जलवायु परिवर्तन पर बेहद अहम पेरिस समझौता पूरा हो चुका है लेकिन फिलहाल सीलबंद है. भारत ने 2 अक्टूबर को इस समझौते को मंजूरी दे दी थी.
  • ऑक्सफोर्ड सम्मेलन में इस बात पर बल दिया गया कि ग्लोबल वार्मिंग का हल उत्पादन और साथ ही साथ खपत में समान रूप से निहित है.
  • इसका मतलब यह है कि केवल हमारे ऊर्जा स्रोत और कार्बन उत्सर्जन ही महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि मांग भी महत्वपूर्ण है.

जलवायु परिवर्तन पर बेहद अहम पेरिस समझौता पूरा हो चुका है लेकिन फिलहाल सीलबंद है. भारत ने 2 अक्टूबर को इस समझौते को मंजूरी दे दी थी. अब इस पर यूरोपीय संघ की मंजूरी मिलना बाकी है, जो इस सप्ताह कभी भी मिल सकती है. इस समझौते के तहत दुनिया का 55 प्रतिशत से भी ज्यादा उत्सर्जन कवर हो रहा है. अब, बस इस समझौते के लागू होने का इंतजार है. इसके एक माह बाद से यह सौदा प्रभावी होगा.

पेरिस में आयोजित कॉप 21 जलवायु सम्मेलन में जब इस समझौते का पत्र पढ़ा जा रहा था तो खुशी भरे चीयर्स और सजल नेत्रों से दुनिया को यह संदेश दिया गया कि मानवता की रक्षा की प्रक्रिया पहले ही शुरू हो चुकी है, क्योंकि पिछले हजार वर्षों से तापमान में 1 डिग्री की ही वृद्धि देखी गई. इसे ज्यादा से ज्यादा 1.5 से 2 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ा हुआ देखा जा सकता है. इस समझाौते में भी यह प्रावधान रखा गया है.

क्या हम ऐसा कर सकते हैं? अगले माह जब पेरिस समझौता लागू होगा, तब भी ऐसा ही कुछ माहौल होगा. जब मोरक्को में सीओपी 22 सम्मेलन शुरु होगा, उसमें बताया जाएगा कि डील कैसे क्रियान्वित होगी. क्या हमें हाथ पर हाथ धर कर यह मान लेना चाहिए कि हम सुरक्षित हैं.

हम नहीं हैं

जलवायु वैज्ञानिकों द्वारा जारी एक ताजा रिपोर्ट में बताया गया है कि ऐसा क्यों नहीं है. आज की तारीख में कार्बन उत्सर्जन की मात्रा 54 गीगा टन कार्बनडाई ऑक्साइड के बराबर है. 2 डिग्री सेल्सियस तक तापमान न पहुंचे, इसके लिए हमें अपने जीएचजी उत्सर्जन को 2030 तक 22 फीसदी घटाना होगा. लेकिन पेरिस समझौते से इतर देखें तो कार्बन उत्सर्जन 65 गीगा टन तक बढ़ सकत है. इस समझौते के बाद हम 52 से 57 जीटी की रेंज में कहीं होंगे. इसलिए समझौता हो या न हो प्रदूषण के मामले में हमारी स्थिति भयावह ही है.

रिपोर्ट का शीर्षक है- ‘द ट्रुथ अबाउट क्लाईमेट चेंज’ जलवायु परिवर्तन पर इंटर गवर्नमेंटल पैनल (आईपीसीसी) के पूर्व अध्यक्ष सर रॉबर्ट वाटसन के नेतृत्व में सात लेखकों ने यह रिपोर्ट तैयार की है. इसी रिपोर्ट से हमें उक्त आंकड़े मिले.

सर वाटसन और उनकी टीम ने तर्क दिया कि पेरिस समझौता लागू होने के बाद भी वायुमंडलीय तापमान 2 डिग्री सेंटीग्रेड तक रखने के लिए हमें अब भी कार्बन स्तर में 33 प्रतिशत से अधिक सुधार लाना होगा. नतीजतन आज से 34 साल बाद तापमान में एकदम तेजी देखी जा सकती है.

कोई ऊर्जा पुनर्जीवित होने योग्य नहीं

पेरिस समझौते का क्रियान्वयन जैव एवं अजैव स्रोतों जैसे सौर और वायु से विद्युत उत्पादन के तरीके पर निर्भर करता है. भारत ने तय किया है कि वह सौर ऊर्जा से 2022 तक 100 गीगा वाट बिजली उत्पादन करेगा, लेकिन यह तो मात्र तय मापदंड है, असलियत में यह मात्रा थोड़ी कम होगी क्योंकि ऊर्जा के ये स्रोत प्राकृतिक रूप से सतत नहीं हैं (बिना बादलों वाले साफ दिन या हवाओं वाले दिन). और हमारे पास उसे बैटरी से जोड़ने का भी कोई तरीका नहीं है. इसी के चलते नवीनीकरण उपायों का इस्तेमाल उनकी क्षमता से मात्र 5 प्रतिशत कम हो रहा है.

अगर यह भी पर्याप्त नहीं है तो चाहे 100 प्रतिशत क्षमताओं का दोहन कर लिया जाए, फिर भी यह सर्वश्रेष्ठ स्थिति नहीं है. शुक्र है शब्दों के लिहाज से हलके-फुल्के पेरिस समझौते में यह जरूरी नहीं और हर देश अपने लक्ष्य कम भी कर सकता है.

विकासशील देशों द्वारा ऐसी कई पहल उन्हेें विकसित देशों से मिलने वाली आर्थिक सहायता पर निर्भर करती है. भारत भी इसमें शामिल है, जो प्रति जीडीपी 35 प्रतिशत तक कार्बन उत्सर्जन में कमी करने को प्रतिबद्ध है, अगर इसे दुनिया से उसे 2.5 खरब की सहायता मिल जाएं. अब तक 100 अरब डॉलर का फंड इसके तय आंकड़ों का केवल एक अंश है और अब भी पेरिस समझौते के 83 फीसदी प्रावधान इस फंड पर निर्भर है.

शून्य उत्सर्जन

ऐसा शायद इसलिए है कि ‘नेट शून्य’ उत्सर्जन पर सबकी उम्मीदें टिकी हैं. इसका मतलब यह है कि हालांकि अर्थव्यवस्था ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन पर टिकी है लेकिन इससे बचने का एक रास्ता है, उन्हें इस तरह के भूमिगत या खनिजों में भंडारण के रूप में वातावरण से दूर रखा जाए. 

अब तक केवल पायलट प्रोजेक्टों में ऐसा होता आया है. बायोरेक्रो कंपनी द्वारा एक करोड़ टन कार्बन डाई ऑक्साइड पकड़ी गई व उसका भंडारण किया गया. यह भी हमारी वास्तविक जरूरत का एक अंश मात्र है. 1.5 सेल्सियस तक का लक्ष्य हासिल पर ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में हाल ही एक सम्मेलन में फर्म के मुखिया ने कहा कि सवाल यह भी था कि इसे कैसे बढ़ाया जा सकता है और इसके लिए कौन जिम्मेदार होगा.

नेताओं के बड़े बोल

और फिर बार-बार हमें बताया जाता है कि पेरिस समझौता वाकई दुनिया को बचा लेगा. संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून ने इसे ‘एक ऐतिहासिक पल’ और ‘भविष्य का अनुबंध’ कहा  है. मील का पत्थर और ‘ऐतिहासिक’ जैसे शब्दों का प्रयोग कर दुनिया को विश्वास दिलाया जा रहा है कि अब बदलते हुए मौसम की मार से बचने के लिए विभिन्न देश अपनी सरकारों पर भरोसा कर सकते हैं.

ऑक्सफोर्ड सम्मेलन में इस बात पर बल दिया गया कि ग्लोबल वार्मिंग का हल उत्पादन और साथ ही साथ खपत में समान रूप से निहित है. इसका मतलब यह है कि केवल हमारे ऊर्जा स्रोत और कार्बन उत्सर्जन ही महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि मांग भी महत्वपूर्ण है.

अब तक किसी के पास इसका सही समाधान नहीं है. भारत ने वाजिब खपत की बात की है. पेरिस समझौते में भी आधा ही समाधान सुझाया गया है, वह भी कई तरह से बचते हुए. ज्यादा उम्मीदें ना ही बांधें तो अच्छा है.

First published: 6 October 2016, 7:05 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

Nihar is a reporter with Catch, writing about the environment, water, and other public policy matters. He wrote about stock markets for a business daily before pursuing an interdisciplinary Master's degree in environmental and ecological economics. He likes listening to classical, folk and jazz music and dreams of learning to play the saxophone.

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