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स्वच्छ भारत अभियान के तहत कितने शौचालय बने, वाकई गिनने की जरूरत

निहार गोखले | Updated on: 10 February 2017, 1:47 IST

सरकार का दावा है कि दो अक्टूबर 2014 को स्वच्छ भारत मिशन लांच करने के बाद से लेकर अब तक भारत में 2.1 करोड़ शौचालय बनाए जा चुके हैं. अभियान के बाद से शौचालय वाले घरों की संख्या में 12 प्रतिशत बढ़ोत्तरी देखी गई और अब देश के 54 फीसदी घरों में शौचालय है.

ये सब आंकड़े पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय (एमडीडब्लूएस) की वेबसाइट से लिए गए हैं. पर ये आंकड़े कितना सही हैं? शौचालयों के इस्तेमाल पर निगरानी रखना काफी मुश्किल काम है लेकिन क्या निर्मित शौचालयों की वास्तविक संख्या भी सवालों के घेरे में है?

ग्रामीण विकास मंत्रालय ने एमडीडब्ल्यूएस और अपनी जांच में मिले आंकड़ों में काफी फर्क पाया है. इसके अलावा निगरानी तंत्र के आंकड़े भी अपने ही पिछले आंकड़ों से मेल नहीं खाते. इससे मोदी सरकार की इस फ्लैगशिप योजना में हुई आॅडिटिंग की अनियमितता उजागर होती है.

आंकड़ों का झोल

ग्रामीण विकास मंत्रालय हर साल अपने पैनल में नियुक्त सेवानिवृत्त अधिकारियों को गांवों को चुनने भेजते हैं. वे मनरेगा, इंदिरा आवास योजना और स्वच्छ भारत जैसी सामाजिक क्षेत्र की योजनाओं की निगरानी करते हैं.

इस प्रक्रिया को राष्ट्रीय स्तर की निगरानी कहते हैं और इन सब योजनाओं पर एक ही रिपोर्ट एनएलएम के तहत तैयार की जाती है. नवीनतम एनएलएम रिपोर्ट के अनुसार एमडीडब्लूएस और पैनल अधिकारियों द्वारा बताई गई निर्मित शौचालयों की संख्या में काफी अंतर देखने को मिला.

उदाहरण के लिए एक ही समय में राजस्थान के चयनित गांवों में बताए गए और वास्तव में पाए गए शौचालयों की संख्या में 28 फीसदी का अंतर था. अरूणाचल प्रदेश और मणिपुर में यह अंतर 40 फीसदी से अधिक है. गुजरात, राजस्थान, झारखंड और कर्नाटक में यह अंतर 25 प्रतिशत है.

हालांकि ये आंकड़े टाइम्स आॅफ इंडिया की रिपोर्ट से लिए गए हैं, फिर भी कैच ने ग्रामीण विकास मंत्रालय के निगरानी निदेशालय के एक वरिष्ठ अधिकारी से इन आंकड़ों की पुष्टि की. फिर वही हुआ, आंकड़ों में मिला भारी अंतर चौंकाने वाला था.

टाइम्स आॅफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय ने राज्य सरकारों को पत्र लिखकर आंकड़ों में अंतर पर जवाब मांगा है. हालांकि, अगर एनएलएम के आंकड़ों पर भी गौर किया जाए तो वे भी सच्चे नहीं लगते. एनएलएम के ताजा आंकड़े फरवरी से अप्रैल 2016 के बीच किए गए अध्ययन पर आधारित हैं.

पिछली एनएलएम रिपोर्ट जो सार्वजनिक की गई थी, वह कुछ माह पहले अक्टूबर से दिसम्बर 2015 के बीच किए गए सर्वे पर आधारित थी. इन दोनों सर्वे के नतीजों में ही बड़ा अंतर है.

अरुणाचल प्रदेश में वर्ष 2015 में किए गए सर्वे में यहां के संदर्भ में कोई अंतर नहीं पाया गया जबकि नई रिपोर्ट में वास्तविक संख्या और बताई गई संख्या में 41 प्रतिशत का अंतर है.

गुजरात और राजस्थान में भी, ताजा रिपोर्ट में क्रमश: 23 फीसदी और 28 फीसदी का फर्क पाया गया. परन्तु पिछली रिपोर्ट के अनुसार,यह फर्क 10 प्रतिशत से भी कम था. मध्य प्रदेश में जहां, एनएलएम की नई रिपोर्ट में शौचालयों की वास्तविक संख्या मंत्रालय द्वारा बताई गई संख्या से अधिक दिखाई गई है. 2015 में स्थिति इसके ठीक विपरीत थी.

एनएलएम की निगरानी करने वाले ग्रामीण विकास मंत्रालय के निगरानी निदेशालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि सेवानिवृत्त अधिकारियों द्वारा तैयार की गई रिपोर्टों में सांख्यिकी संबंधी गड़बड़ियां हैं.

चूंकि एनएलएम हर बार एक नया जिला चुनता है, और यह चयन सांख्यिकीय आंकड़ों के आधार पर किया जाता है. इसका मतलब है एक सर्वे के बीच त्रुटियां कम होनी चाहिए. जाहिर है, ऐसा हुआ नहीं.

स्वच्छ भारत अभियान से जुड़े एमडीडब्ल्यूएस के एक और अधिकारी ने भी माना है कि एनएलएम की रिपोर्टों में भारी गड़बड़ियां हैं. उन्होंने कहा. ‘उनके बजाय हमारे आंकड़े ज्यादा सटीक हैं, हमने हर एक शौचालय को गिना है, जो बन चुका है.’

अधिकारी ने बताया चूंकि एनएलएम हर गांव में विभिन्न ग्रामीण योजनाओं का अध्ययन करता है, इसलिए वह शौचालय निर्माण के आंकड़ों का सटीक अध्ययन कर सके,यह जरूरी नहीं.

उन्होंने कहा, ‘जो भी अध्ययन करने जाता है, उसके लिए मौजूदा हालात की समझ होना जरूरी है. भविष्य में हम सुनिश्चित करेंगे कि क्षेत्र में जाने से पहले उन्हें हमारे कार्य की वास्तुस्थिति का अंदाजा हो.’

ऐसा नहीं है कि एमडीडब्ल्यू के अपने आंकड़े सही ही हों, ये आंकड़े राज्य सरकारों द्वारा ही भेजे जाते हैं और हरेक राज्य के अपने गांव को खुले में शौच मुक्त दिखाने के अपने मापदंड हैं- यही तो स्वच्छ भारत मिशन का उद्देश्य है. मंत्रालय फिलहाल इसकी परिभाषा को दुरुस्त करने में जुटा है और गत एक अगस्त को राज्यों को भेजे पत्रों में इस संबंध में दिशा निर्देश जारी कर चुका है.

मंत्रालय ने 22 अगत को जयपुर में इस संबंध में एक कार्यशाला आयोजित की. इसका मकसद यह जानना और एक-दूसरे को बताना था कि राज्य किस आधार पर एक गांव को खुले में शौच मुक्त घोषित कर रहे हैं.

First published: 24 August 2016, 7:59 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

संवाददाता, कैच न्यूज़. जल, जंगल, पर्यावरण समेत नीतिगत विषयों पर लिखते हैं.

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