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आईपीएल के खिलाफ बॉम्बे हाईकोर्ट का आदेश महाराष्ट्र की कितनी मदद कर पाएगा?

निहार गोखले | Updated on: 10 February 2017, 1:50 IST

इंडियन प्रीमियर लीग के 30 अप्रैल के बाद महाराष्ट्र में प्रस्तावित सभी मैच बॉम्बे हाईकोर्ट ने रद्द करने का आदेश दिया है और उन्हें राज्य से बाहर कराने का आदेश दिया है. राज्य के लोगों ने अपनी जीत की तरह इस आदेश का स्वागत किया है.

महाराष्ट्र के कई भाग लगातार दो बार फेल हुए मानसून के कारण गंभीर सूखे की चपेट में हैं. और जैसे-जैसे गर्मी बढ़ेगी जलसंकट बढ़ता ही जाएगा.

हाईकोर्ट के आदेश से जहां राज्य में प्रस्तावित 13 मैच रद्द हो जाएंगे, वहीं 30 अप्रैल तक सात और मैच होंगे. जो मैच रद्द हुए हैं, वे मुम्बई, पुणे और नागपुर में प्रस्तावित थे. ये तीनों शहर जल-संकट का सामना कर रहे हैं और इनके चारों ओर का ग्रामीण क्षेत्र सूखा-ग्रस्त है. सूखे से फसलें बर्बाद होने के कारण सैकड़ों किसान आत्महत्या कर चुके हैं.

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वहीं, जब से पानी के लिए झगड़े शुरू हुए हैं, लातूर जैसे शहरों में जल-स्रोतों के आसपास निषेधाज्ञा लागू कर दी गई है. ऐसे में आश्चर्य की बात नहीं है कि हाई कोर्ट के आदेश की जय-जयकार हो रही है.

लेकिन आलोचक हैरानी जता रहे हैं कि क्या आईपीएल के मैचों पर प्रतिबंध लगाने से सूखा-ग्रस्त राज्य में जमीनी स्तर पर कोई प्रभाव पड़ेगा? हाईकोर्ट के आदेश से पहले इस संबंध में राय जाहिर करती टिप्पणियां उलझन भरी थीं कि आईपीएल पर प्रतिबंध लगना चाहिए या नहीं.

हाईकोर्ट के फैसले का महत्व क्या है?

जानकार कहते हैं इस आदेश से पानी चाहे भले कम या ज्यादा बचे लेकिन इस आदेश से लोगों को जाने वाला संदेश कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण और दूरगामी है. अधिक महत्वपूर्ण है कि पानी का उपयोग विवेकपूर्ण तरीके से हो, विशेष रूप से सूखा-ग्रस्त महाराष्ट्र में.

साउथ एशियन नेटवर्क फॉर डैम्स, रीवर्स एंड पीपल के कॉर्डिनेटर हिमांशु ठक्कर कहते हैं, “महाराष्ट्र बहुत गंभीर संकट का सामना कर रहा है, इतना गंभीर और इतना खराब कि राज्य ने पहले कभी देखा ही नहीं. ऐसी स्थिति में पानी का बेजा इस्तेमाल जितना कम हो सके, उतना कम करना चाहिए. 

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यह सिर्फ मराठवाड़ा के बारे में नहीं है. मुम्बई को पानी की आपूर्ति करने वाले मध्य वैतरणा बांध के पास रहने वाले आदिवासी भी जल-संकट का सामना कर रहे हैं. अदालत ने उपलब्ध पानी के उचित उपयोग का मुद्दा उठाया है.”

हार्इकोर्ट का आदेश इस पर भी प्रकाश डाला है कि जल-संकट के समय राज्य सरकार पानी के संबंध में कड़े फैसले लेने में असफल रही.

गन्ना उत्पादन बहुत बड़े भू-भाग पर हो रहा है और शायद इसमें आईपीएल मैचों की तुलना में कई गुना ज्यादा पानी का उपयोग हो रहा है

भारतीय जल एवं स्वच्छता फोरम के राष्ट्रीय समन्वयक देपिंदर कपूर कहते हैं, “हालांकि कुछ मैचों को महाराष्ट्र से बाहर कर देने भर से जल संकट का हल नहीं निकल आएगा, लेकिन यह आदेश यह ताे बता ही रहा है कि संकट कितना गहरा है और यह भी कि इस संकट का हल निकालने के लिए अभी कोई पारदर्शी योजना नजर नहीं आ रही है.”

ठक्कर का कहना है, “अदालत को यह भी पूछना चाहिए था कि सरकार ने आईपीएल को महाराष्ट्र में मैच कराने की अनुमति किस आधार पर दे दी? आप केवल तभी कह सकते हैं कि महाराष्ट्र में कैसी जल नीति है जो जल-आवंटन पर नियंत्रण रखती है. जब इतने सारे लोग मैचों के लिए आ रहे हों तो यह मुद्दा इससे भी बड़ा हो जाता है कि पिच और मैदान पर कितना पानी उपयोग किया जा रहा है.”

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एक राय यह भी है कि अदालत को अपने आदेश को सिर्फ आईपीएल तक सीमित नहीं रखना चाहिए था बल्कि उसका इतना विस्तार करना चाहिए था कि उसमें राज्य में पानी के दुरुपयोग वाली तमाम चीजें भी शामिल हो जातीं. उदाहरण के तौर पर गन्ने के उत्पादन पर बर्बाद किया जाने वाला पानी.

कपूर कहते हैं, “गन्ना उत्पादन बहुत बड़े भू-भाग पर हो रहा है और शायद इसमें आईपीएल मैचों की तुलना में कई गुना ज्यादा पानी का उपयोग हो रहा है. हाईकोर्ट का निर्णय यह नहीं बताता कि प्रदेश में इस तरह के पानी के उपयोग को कैसे कम किया जाए.”

असली सवाल यह है कि किसी विशेष गतिविधि के लिए पानी का उपयोग कर हम किस तरह के संस्कारों को प्रोत्साहित कर रहे हैं

ठक्कर ने कहा, “अदालत को आईपीएल से कहीं आगे जाना चाहिए और उपलब्ध पानी के समुचित उपयोग के सवाल का जवाब तलाशना चाहिए. यह बात गन्ने की खेती, पांच सितारा होटलों, टैंकर माफिया और ऐसी ही अन्य चीजों पर लागू होती है.”

फिर भी, भूमि और जल प्रबंधन संस्थान के रिटायर्ड एसोसिएट प्रोफेसर और औरंगाबाद के वाटर एक्टिविस्ट प्रदीप पुरंदरे के अनुसार, आईपीएल मैचों पर प्रतिबंध लगाना एक महत्वपूर्ण प्रतीकात्मक संकेत है.

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पुरंदरे का कहना है, “जब ऑस्ट्रेलिया में सूखा पड़ा, तब वहां की संसद ने अपने परिसर का फव्वारा तक बंद कर दिया था. यह जल बचाने के लिए एक बड़ा संदेश था. जब इस तरह के कदम उठाए जाते हैं तो हम सदा एक सवाल कर सकते हैं कि इससे वास्तव में कितना पानी बचा लेंगे? 

लेकिन असली सवाल यह है कि किसी विशेष गतिविधि के लिए पानी का उपयोग कर हम किस तरह के संस्कारों को प्रोत्साहित कर रहे हैं.”

पुरंदरे आगे कहते हैं, “यह एक नैतिक सवाल है. हम आईपीएल का विरोध नहीं कर रहे हैं. हमें सिर्फ यह सवाल नहीं उठाना चाहिए कि आईपीएल के लिए मैदानों पर कितना पानी खर्च होगा, बल्कि सवाल यह होना चाहिए कि यह किस तरह की जीवनशैली को प्रोत्साहित कर रहा है?”

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कपूर कहते हैं, “भले निर्णय सांकेतिक है, लेकिन बहुत महत्वपूर्ण है. यह निर्णय सरकार पर यह जिम्मेदारी डाल देता है कि इस तरह के सूखे से निपटने के लिए सरकार के पास पूरी कार्ययोजना होनी चाहिए. यह सरकार को नैतिक तौर पर ऊंटपटांग आयोजन करने से रोकता है.”

First published: 16 April 2016, 9:13 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

संवाददाता, कैच न्यूज़. जल, जंगल, पर्यावरण समेत नीतिगत विषयों पर लिखते हैं.

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