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अडानी पोर्ट: एनजीटी का ग्रीन सिग्नल, पर्यावरण के लिए रेड सिग्नल है

निहार गोखले | Updated on: 5 September 2016, 7:47 IST

केरल में विझिंजम समुद्र तट बहुविख्यात कोवलम तट से सिर्फ तीन किमी की दूरी पर है लेकिन यहां का खूबसूरत दृश्य कहीं से कम नहीं है. वास्तव में, यहां का वातावरण इतना शांत और स्थिर है कि पूछिए मत. कहा जाता है कि राज्य के एक वित्त मंत्री हर साल बजट तैयार करने के लिए इस तट पर आ जाते थे और तट के किनारे एक कुटिया में एकान्त में बजट को अमलीजामा पहनाते थे.

अब राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने प्राकृतिक समुद्री जल को अतंरराष्ट्रीय समुद्री तट बनाने के लिए मिली पर्यावरण मंजूरी को रद्द करने से मना कर दिया है. विझिंजम में अडानी समूह द्वारा 7,525 करोड़ रुपए की लागत से अतंरराष्ट्रीय समुद्री तट बनाने का काम शुरु हो चुका है. इसे अडानी समूह ही संचालित करेगा. केरल सरकार ने इसकी योजना तैयार की है और प्रमोट किया है.

अडानी समूह के इस कदम के खिलाफ याचिकाकर्ता के तर्कों, कि इस तट से तटीय इलाकों को नुकसान पहुंचेगा, तट से मछली पकड़ने वालों पर विपरीत असर पड़ेगा और इस जगह की सुंदरता नष्ट हो जाएगी, को खारिज करते हुए जस्टिस स्वतंतर कुमार की अगुवाई वाली एनजीटी का प्रमुख पीठ ने कहा कि यह बंदरगाह देश के साथ ही राज्य के आर्थिक विकास के लिए भी महत्वपूर्ण है.

एनजीटी ने सात सदस्यों की एक विशेषज्ञ समिति का गठन करने के लिए कहा है जो इस परियोजना में तटीय विनियमित क्षेत्र और पर्यावरण क्लीयरेंस सम्बंधी शर्तों के अनुपालन की स्थिति की निगरानी करेगी.

कमेटी को यह भी अधिकार दिया गया है कि वह अन्य तरह की निगरानियां भी करेगा. एनजीटी ने केरल तटीय क्षेत्र प्रबंधन अधिकरण से यह भी कहा है कि वह परियोजना के कारण तट की सुंदरता में आने वाले बदलावों की निगरानी के लिए एक सेल भी गठित करे. इस सेल का आर्थिक भार बंदरगाह वहन करेगा.

याचिका पर सुनवाई में देरी इस कारण हुई कि बंदरगाह के अधिकारियों ने एनजीटी के न्यायाधिकार क्षेत्र को लेकर चुनौती

विझिंजम बंदरगाह एक बार बनकर तैयार हो जाता है तो भारतीय निर्यातकों को कार्गो की ट्रांस-शिपमेंट के लिए विदेशी बंदरगाहों पर निर्भर रहने की जरुरत नहीं पड़ेगी. माल एक शिप से दूसरे पर स्थानांतरित हो जाएगा. कार्गो के लिए 2,000 मीटर का खुला स्थान सुलभ होगा और बड़े से बड़े मालवाहक जहाजों को खड़ा करने की उसकी क्षमता में भी इजाफा होगा.

उल्लेखनीय है कि बंदरगाह को पर्यावरणीय मंजूरी और कॉस्टल जोन क्लीयरेन्स जनवरी 2014 में दी गई थी. यह मंजूरी दिए जाने के दो माह बाद तिरुवनंतपुरम के पर्यावरण कार्यकर्ता विलफ्रेड जे और वी मार्यदासन ने एनजीटी के समक्ष याचिका दाखिल की थी.

याचिका पर सुनवाई में देरी इस कारण हुई कि बंदरगाह के अधिकारियों ने एनजीटी के न्यायाधिकार क्षेत्र को लेकर चुनौती दे दी थी. जब एनजीटी ने बंदरगाह के पक्ष में फैसला दिया तो याचिकाकर्ता सुप्रीम कोर्ट में चले गए. और जब शीर्षस्थ न्यायालय ने फरवरी 2014 में एनजीटी के आदेश को अनुमोदित कर दिया तो फिर मामला एनजीटी के पास आ गया. एनजीटी में रोजाना के आधार पर सुनवाई हुई. 11 अगस्त को बहसों का निष्कर्ष निकाला गया. इसके बाद एनजीटी ने निर्णय सुरक्षित रख लिया था.

इस तटीय परियोजना का सबसे ज्यादा विरोध चर्च ने किया. तिरुवनंतपुरम के आर्कबिशप एम सूसापकियम ने कहा कि इस परियोजना से 50,000 से ज्यादा मछुआरे प्रभावित हो जाएंगे. चर्च ने केरल सरकार के सामने अपना विरोध दर्ज कराया था. परियोजना पर निर्माण कार्य दिसम्बर 2015 में शुरू हो गया था.

एनजीटी के इस फैसले पर अपनी प्रतिक्रिया में केरल पोर्ट ट्रस्ट के सचिव जेम्स वर्गीज ने कहा कि यह फैसला न तो राज्य सरकार के खिलाफ है और न ही परियोजना को कोई नुकसान पहुंचाने वाला है. फैसले में एक विशेषज्ञ कमेटी का गठन करने के लिए कहा गया है. हमने पहले ही इसी तरह की एक कमेटी बनाई हुई है. कोर्ट के कहने पर हम केवल कुछ और सदस्यों को इसमें शामिल कर लेंगे और एक नई कमेटी तैयार कर ली जाएगी.

First published: 5 September 2016, 7:47 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

Nihar is a reporter with Catch, writing about the environment, water, and other public policy matters. He wrote about stock markets for a business daily before pursuing an interdisciplinary Master's degree in environmental and ecological economics. He likes listening to classical, folk and jazz music and dreams of learning to play the saxophone.

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