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तटवर्ती क्षेत्र में 'विकास' की सरकार को कोई चिंता नहीं

निहार गोखले | Updated on: 10 February 2017, 1:51 IST

भारत की नरेंद्र मोदी सरकार का 'मैक्सिमम गवर्नेंस' का नारा शायद देश के 7517 किलोमीटर लंबे समुद्र तट पर लागू नहीं होता.

इस साल 31 जनवरी को भारत का कोस्टल ज़ोन मैनेमेंट प्लान (सीज़ेडएपी) की समय सीमा पूरी हो गयी लेकिन सरकार ने इसका नवीनीकरण नहीं किया है. देश के समुद्र तटों पर होने वाले विकास का नियमन इसी प्लान के तहत होता है.

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इस प्लान के बिना समुद्र तट के नियामक संस्थान तट के 500 मीटर के अंदर विकास के किसी भी प्रस्ताव को स्वीकार या अस्वीकार नहीं कर सकते. इन प्रस्तावों में घरों की मरम्मत, सड़क और होटल निर्माण जैसी सभी गतिविधियां शामिल हैं. समुद्र तट के 500 मीटर की सीमा में आने वाले इलाके को तटवर्ती क्षेत्र कहा जाता है.

भारत के कोस्टल ज़ोन मैनेमेंट प्लान को पिछले चार साल से विस्तार दिया जा रहा है

आपको शायद ये जानकर हैरानी होगी कि पिछले पांच सालों से इस प्लान को एक-एक साल का विस्तार दिया जा रहा है. अभी भी इस बात का कोई संकेत नहीं मिल रहा है कि सरकार इसकी समय सीमा को विस्तार देने के बजाय इसकी समीक्षा करेगी.

सीज़ेडएपी


सीज़ेडएमपी के तहत इस बात पर विचार किया जाता है कि तटवर्ती इलाके में किस तरह के निर्माण से जैव पारिस्थितिकी को खतरा पहुुंच सकता है.

1991 में पहले सीज़ेडएमपी की अधिसूचना जारी हुई थी. 1996 में इसका अंतिम मसौदा तैयार हआ था.

साल 2011 में सीज़ेडएमपी की नई अधिसूचना जारी हुई, जिसमें 1996 के बाद तटवर्ती क्षेत्र में आए कई बदलावों के मद्देनजर नया प्लान तैयार करने की जरूरत बतायी गयी.

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सीज़ेडएमपी बनाने के लिए पहले सभी संबंधित राज्य एक ड्राफ्ट प्लान बनाकर केंद्र सरकार के पास भेजते हैं. उसके बाद पर्यावरण मंत्रालय सीज़ेडएमपी तैयार करता है.

साल 2011 में 1996 के सीज़ेडएमपी को 31 जनवरी 2013 तक इस तर्क के साथ अनुमति दी गयी कि राज्यों को ड्राफ्ट प्लान तैयार करने में करीब दो साल लगेंगे. हालांकि, उसके बाद से इसे चार बार विस्तार दिया जा चुका है. किसी भी संबंधित राज्य ने समय सीमा का पालन नहीं किया.

कोस्टल ज़ोन मैनेमेंट प्लान के बिना तटवर्ती इलाके में विकास कार्य को मंजूरी नहीं दी जा सकती

31 जनवरी, 2016 को समय सीमा समाप्त होने के बाद अगर एक बार फिर पुराने प्लान को विस्तार दे दिया जाए तो भी समस्या पूरी तरह हल नहीं होगी. क्योंकि नए सीज़ेडएमपी बनाने की राह में कई रोड़े हैं.

इसमें सबसे बड़ा रोड़ा है तटरेखा की परिभाषा को लेकर अस्पष्टता. तटरेखा के दो मुख्य प्रकार हैं, लो टाइड लाइन(एलटीएल) और हाई टाइड लाइन(एचटीएल). एचटीएल से 500 मीटर तक कोस्टल रेगुलेशन ज़ोन होता है. लेकिन एचटीएल के निर्धारण को लेकर विवाद है.

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अलग-अलग राज्य एचटीएल को भिन्न-भिन्न तरीके से परिभाषित करता है. उनकी परिभाषाओं में परस्पर गतिरोध हुआ है.

केंद्र सरकार के पर्यावरण मंत्रालय ने चेन्नई स्थित नेशनल सेंटर फॉर सस्टेनेबल कोस्टल मैनेजमेंट(एनसीएससीएम) को एचटीएल के निर्धारण का जिम्मा सौंपा. एनसीएससीएम ने अभी अपनी आखिरी रिपोर्ट नहीं सौंपी है.

अगर एनसीएससीएम एचटीएल की परिभाषा तय करेगा तो दूसरी बड़ी दिक्कत ये होगी कि राज्यों की उसके हिसाब से अपनी-अपनी तटरेखा की परिभाषा को बदलना होगा.

तमिलनाडु और कर्नाटक जैसे राज्य अपना ड्राफ्ट प्लान पूरा कर चुके हैं लेकिन एनसीएससीएम की रिपोर्ट के बाद उन्हें भी अपने ड्राफ्ट पर पुनर्विचार करना होगा.

जाहिर है जिस मामले को यूपीए ने लटकाया था उसे अब एनडीए झुला रही है.

First published: 29 March 2016, 12:10 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

संवाददाता, कैच न्यूज़. जल, जंगल, पर्यावरण समेत नीतिगत विषयों पर लिखते हैं.

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