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रेन नहीं अब 'ड्रेन वॉटर हॉर्वेस्टिंग' का समय है वरना शहर प्यासे रह जाएंगे

स्कंद विवेक धर | Updated on: 24 January 2017, 7:50 IST
QUICK PILL
  • फिलहाल देश में महज 30 फीसदी सीवेज का ही होता है ट्रीटमेंट, 70 फीसदी सीवेज बिना ट्रीटमेंट सीधा नदियों-तालाबों में बहा दिया जाता है.
  • जिस सीवेज को बिना ट्रीटमेंट के बहाया जा रहा है वो कुप्रबंधन की वजह से स्वच्छ जलस्रोतों को प्रदूषित कर रहा है.
  • ऐसी तकनीकों का उपयोग हो रहा है जिसे इस्तेमाल करके सीवेज के पानी को पीने के स्तर तक शुद्ध ट्रीटमेंट किया जा सकता है.
  • 62,000 एमएलडी सीवेज उत्पन्न होता है रोजाना शहरों में. 23,277 एमएलडी सीवेज के ट्रीटमेंट की क्षमता है देश में. सिर्फ 18,883 एमएलडी सीवेज का ही हो पाता है ट्रीटमेंट

देश में चल रहे स्वच्छ भारत अभियान और स्मार्ट सिटी मिशन के बीच ये आंकड़े एक गंभीर खतरे की ओर इशारा करते हैं कि हमारे देश में तीन-चौथाई स्वच्छ जल स्रोत बुरी तरह प्रदूषित हो चुके हैं. इस प्रदूषण में 75 से 80 फीसदी हिस्सेदारी उस घरेलू सीवेज की है, जिसे बिना ट्रीटमेंट नालियों में बहा दिया जाता है.

डाटा रिसर्च पोर्टल इंडिया स्पेंड डॉट कॉम की एक रिपोर्ट के मुताबिक, शहरी भारत के 37.7 करोड़ लोगों द्वारा उत्पन्न किया जाने वाले सीवेज में सिर्फ 30 फीसदी का ही ट्रीटमेंट यानी शोधन होता है, शेष गंदा पानी बिना किसी ट्रीटमेंट के नदियों, झीलों, समुद्र एवं कुओं में बहा दिया जाता है.

शहरों में पानी की किल्लत की स्थिति को मध्य प्रदेश के दो बड़े शहरों भोपाल और इंदौर के उदाहरण से समझा जा सकता हैं, जहां पानी की आपूर्ति के लिए हजारों करोड़ रुपए खर्च करके 70 किमी दूर स्थित स्थित नर्मदा नदी से पानी की आपूर्ति की जा रही है, वहीं सीवेज का ट्रीटमेंट न होने की वजह से शहर के नजदीक स्थित जल स्रोत बुरी तरह प्रदूषित हो रहे हैं. यह दोतरफा संकट है.

दिल्ली के केशवपुर स्थित एसटीपी में तैयार हुए पानी को पीते हुए दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल

मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल को रोजाना 266 मिलियन लीटर पानी (एमएलडी) हर दिन मिलता है, जबकि 285 एमएलडी सीवेज निकलता है. इसमें से सिर्फ 39 एमएलडी सीवेज का ही ट्रीटमेंट होता है, बाकी 246 एमएलडी सीवेज बिना ट्रीटमेंट के नालियों में बहा दिया जाता है, जिसका बड़ा हिस्सा बड़े तालाब और झीलों में मिल जाता है. तेजी से बढ़ते शहर की पानी की मांग को पूरा करने के लिए 67 किमी दूर से नर्मदा का पानी लिफ्ट करके भोपाल लाया जाता है, जिसकी लागत 50 से 70 रुपए प्रति लीटर तक पड़ती है.

लंबे समय से भोपाल में शहरी विकास के मुद्दे को कवर कर रहे पत्रकार देवेंद्र शर्मा बताते हैं, 'भोपाल में पेयजल और सीवेज को लेकर बीते नौ साल में 1500 करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं. प्रोजेक्ट उदय के बाद जेएनएनयूआरएम में भी काफी राशि खर्च हुई, लेकिन भोपाल को लाभ नहीं मिला. सरकारी एजेंसियों में तालमेल की कमी और विशेषज्ञों के अभाव के चलते कोई भी योजना साकार रूप नहीं ले पाई.'

इंदौर, भाेपाल 70 किमी दूर से नर्मदा और क्षिप्रा नदी से पानी लिफ्ट करके लाते हैं, इनकी लागत बहुत ज्यादा है

इसी तरह, मध्य प्रदेश की वाणिज्यिक राजधानी इंदौर को रोजाना 200 एमएलडी पानी की आपूर्ति होती है, जबकि रोजाना 240 एमएलडी सीवेज यहां से पैदा होता है. इस सीवेज का एक चौथाई हिस्सा ही ट्रीट हो पाता है, बाकी सीवेज खान नदी में बहा दिया जाता है. खान नदी आगे जाकर शिप्रा नदी में मिल जाती है, इस तरह इंदौर का पूरा सीवेज शिप्रा नदी में मिल जाता है और इसी नदी से पूरे उज्जैन शहर को पानी की आपूर्ति होती है.

अपनी पानी की जरूरत को पूरा करने के लिए इंदौर, भाेपाल की ही तरह 70 किमी दूर से नर्मदा नदी से पानी लिफ्ट करके लाता है. इतने के बावजूद इन शहरों को जरूरत भर पानी नहीं मिल पाता है और दोनों शहरों की बड़ी आबादी अपनी पानी की जरूरत के लिए भूजल पर निर्भर है.

बेंगलुरु स्थित स्वतंत्र शोध संस्थान अशोक ट्रस्ट फॉर रिसर्च इन इकोलॉजी एंड एन्वायरमेंट की फेलो मेघा शिनॉय कहती हैं, 'शहरों में पानी की आपूर्ति करने वाले स्रोत सीमित हैं. तेजी से बढ़ते शहरों को अगर पानी की सतत आपूर्ति सुनिश्चित करनी है, तो हमें तत्काल पानी का प्रबंधन शुरू करना होगा.'

शिनॉय बताती हैं, 'रेन वॉटर हॉर्वेस्टिंग पर सभी राज्यों में खासा जोर दिया गया है. जबकि बारिश वर्ष में कुछ ही दिन होती है. वहीं, हर शहर में हम रोजाना करोड़ों लीटर पानी सीवेज में बहा देते हैं. यदि हम इस पानी को भी इस्तेमाल कर सकें तो शहरों में पानी की समस्या काफी हद तक दूर हो सकती है.'

ड्रेन वाटर हॉर्वेस्टिंग

देश की आईटी राजधानी बेंगलुरु में 'ड्रेन वॉटर हॉर्वेस्टिंग' की ओर पहला कदम बढ़ा दिया है. कर्नाटक सरकार ने 20 या इससे अधिक फ्लैट वाली इमारतों के लिए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) लगाना और इससे ट्रीट होने वाले पानी का उपयोग करना जरूरी कर दिया है.

इसके अलावा, 2000 वर्ग मीटर से अधिक के कॉमर्शियल कॉम्प्लेक्स, 5000 वर्ग मीटर से अधिक के शैक्षणिक संस्थानों के लिए भी एसटीपी लगाना और ट्रीट किए गए पानी का उपयोग करना अनिवार्य बना दिया गया है. बेंगलुरु में लगने वाले इस एसटीपी की लागत 10 से 15 लाख रुपए के बीच है. वहीं, इसमें सीवेज ट्रीटमेंट का खर्च प्रति किलो लीटर 40 से 60 रुपए बैठता है.

भारत में भले ही सीवेज ट्रीटमेंट के जरिए पीने योग्य पानी बनाने की अभी शुरुआत हो रही हो, लेकिन मलेशिया से पानी का आयात कर अपनी जरूरत पूरी करने वाला सिंगापुर अपनी जरूरत का 30 फीसदी पेय जल सीवेज के ट्रीटमेंट से ही पूरा करता है.

सिंगापुर दुनिया के उन देशों में शुमार है जहां पीने के पानी की सबसे अधिक किल्लत है. सिंगापुर ने सबसे पहले सीवेज का ट्रीटमेंट कर पीने योग्य पानी बनाने की शुरुआत की थी. अब सिंगापुर की कंपनियां देशों में सीवेज ट्रीटमेंट में कंसल्टेंसी दे रही हैं.

First published: 24 January 2017, 7:50 IST
 
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