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जावड़ेकर की हेलीकॉप्टर की सवारी और पैसे की बर्बादी, जानिए कैसे

निहार गोखले | Updated on: 10 February 2017, 1:49 IST

ऊपर से नीचे बनाम नीचे से ऊपर. नीति निर्माण की दुनिया को इन्हीं दो आधारों पर बांटा जाता है. पहली में सरकार दिखावा करने वाली नौकरशाही पर आधारित दृष्टिकोण वाली होती है. जबकि दूसरी में लोगों को और जमीनी हकीकत को सबसे पहले रखने वाली प्रक्रिया अपनाई जाती है.

पर्यावरण मंत्रालय ऊपर से नीचे के नीति निर्धारण को एक कदम और आगे ले गया है. यह समझने के लिए कि अरावली की पहाड़ियों पर वन हैं या नहीं, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने उन्हें कई हजार फीट ऊपर से एक हेलीकॉप्टर से देखा. यह सब इसलिए हुआ ताकि अंतिम फैसला लिया जा सके कि अरावली की पहाड़ियों पर वन हैं या नहीं.

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इसे पहले हरियाणा के मुख्यमंत्री एमएल खट्टर ने भी हाल ही में ऐसा ही किया था. उन्होंने अरावली की पहाड़ियों में ही स्थित झाड़दार जंगल मंगर बणी के ऊपर से उड़ान भरी थी.

अरावली को वनों के रूप में अधिसूचित किया जाए या नहीं, यह उलझन इस तथ्य के कारण पैदा हुई कि अरावली की पहाड़ियों पर बड़े पैमाने पर झाड़ीदार वन हैं और बड़े-फैले हुए पेड़ तो 10% से भी कम क्षेत्र में हैं. मंत्रीजी की यह उड़ान यह सुनिश्चित करने का प्रयास था कि सरकार के आगामी वन वर्गीकरण से ये जंगल बच न जाएं. बेशक, यह मोटे तौर पर एक प्रतीकात्मक यात्रा है, लेकिन यह यकीनन काफी गैरजरूरी थी.

प्रकाश जावडे़कर की हेलीकाप्टर सवारी सार्वजनिक पैसे की बर्बादी भर थी

एरियल व्यू की भूमिका क्या है? इसे जंगलों की पहचान के प्राथमिक स्रोत उपग्रह चित्रण के पूरक के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है. खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) के पास 'वन संसाधनों को परिभाषित करने के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश' हैं. इन दिशा-निर्देशों के अनुसार, एक क्षेत्र विशेष में विभिन्न प्रकार के वनों का निर्धारण करने के लिए निर्दिष्ट पैमाने (1: 20000 या 1: 25000) पर की गई हवाई फोटोग्राफी उपयोगी है.

दिल्ली के निकट स्थित अरावली पहाड़ियों पर काफी वन क्षेत्र है, यह बात नई नहीं है. अरावली की पहाड़ियों में पर्यावरण की समस्याओं पर एक अध्ययन के हिस्से के रूप में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने उपग्रह चित्रों का उपयोग किया था. पर्यावरण मंत्रालय के अधीन इस बोर्ड ने अप्रैल, 2001 को लिए गए उपग्रह चित्रों का इस्तेमाल किया था. इसके जरिए सिर्फ गुड़गांव जिले में 44.97 वर्ग किलोमीटर घने जंगल, 105.29 वर्ग किलोमीटर खुले जंगल और 79.61 वर्ग किलोमीटर झाड़ीदार वनों की पहचान की गई थी.

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भारत द्वारा कई अन्य दूरसंवेदी उपग्रहों को भी अंतरिक्ष में छोड़ा गया है. यदि अरावली के वनों की समस्याओं का हल हवाई चित्र हैं, तो इनका उपयोग क्यों न किया जाए?

मंत्री की यात्रा का सबसे उपयोगी हिस्सा यह नहीं था कि उन्होंने हेलीकॉप्टर की खिड़कियों से क्या देखा और क्या नहीं, बल्कि सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा था कि उनका हेलीकॉप्टर उतरा कहां. वे मेवात जिले के फिरोजपुर झिरका में उतरे, जहां उन्होंने इस मुद्दे को बेहतर तरीके से समझने के लिए हरियाणा वन विभाग के अधिकारियों से मुलाकात की.

एक मंत्री कोई विशेषज्ञ नहीं होता. एक मंत्री तो जन प्रतिनिधि होता है. जावड़ेकर इस दिन का बेहतर उपयोग कर पाते अगर वे अरावली के साथ-साथ जमीन पर यात्रा करते, झाड़ीदार वनों को देखते और वहां के जंगली जानवरों को देखते.

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वहां से गुजरते हुए वे बेहतर तरीके से देख पाते कि किस तरह ग्रेनाइट जैसे गौण खनिजों के खनन और अतिक्रमण की वजह से तबाही हुई है. साथ ही वे कई उन सामाजिक कार्यकर्ताओं से भी मिल पाते, जो जंगलों को बचाने के लिए अभियान चला रहे हैं.

यह नहीं भूलना चाहिए कि वनों की जबरदस्त कटाई एक महत्वपूर्ण मुद्दा है और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने भी इसकी पहचान एक महत्वपूर्ण मुद्दे के रूप में की थी. (अब, अगर वहां पहले से ही जंगलों की तबाही हो चुकी है तो हवाई सर्वेक्षण कैसे मदद करेगा?)

फिरोजपुर झिरका राजधानी दिल्ली से मात्र ढाई घंटे की दूरी पर है. यह बेहतर होता अगर देश के वन मंत्री सड़क के उस रास्ते से वहां पहुंचते, जो अरावली के कुछ जंगलों से होकर गुजरता है. इस तरह उनकी हेलीकाप्टर की सवारी सार्वजनिक पैसे की बर्बादी भर थी.

First published: 29 June 2016, 7:38 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

संवाददाता, कैच न्यूज़. जल, जंगल, पर्यावरण समेत नीतिगत विषयों पर लिखते हैं.

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