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कान्हः इंदौर शहर बढ़ता गया और शहर की नदी नर्क होती गई

स्कंद विवेक धर | Updated on: 31 January 2017, 8:51 IST
(पत्रिका)

मिनी बॉम्बे, मध्यप्रदेश की औद्योगिक राजधानी या सपनों का शहर. मप्र के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान के शब्दों में ये कुछ ऐसे विशेषण हैं, जो मध्यप्रदेश के सबसे बड़े शहर इंदौर के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं. इस शहर को ये विशेषण देने का कारण इस शहर का पिछले कुछ दशकों में हुआ तेज आर्थिक विकास है, जो अब भी जारी है.

हालांकि, इस तेज आर्थिक विकास और इसके चलते हुए तीव्र शहरीकरण की कीमत यहां की कान्ह नदी को नाला बन कर चुकानी पड़ रही है. यह नदी आज नाला बनकर इंदौर का अशोधित सीवेज, औद्योगिक अपशिष्ट और अन्य सॉलिड वेस्ट उज्जैन में शिप्रा नदी तक पहुंचाने का साधन बन गई है.

कान्ह नदी का उद्गम इंदौर से 11 किमी दूर उमरिया गांव की उसी पहाड़ी से हुआ है, जिससे शिप्रा (उज्जैन में इसी नदी के किनारे हर 12 वर्ष पर कुंभ मेला आयोजित होता है) निकलती है. कान्ह इन्दौर शहर में कुल 21 किलोमीटर बहती है, जहां इसकी चौड़ाई 10 मीटर से 30 मीटर के बीच है. इसी पहाड़ी से एक और जलधारा निकलती है, जिसका नाम सरस्वती है और वह इंदौर में कान्ह में आकर मिल जाती है.

कान्ह नदी के पुनर्जीवन के लिए काम कर रहे इंदौर के सामाजिक कार्यकर्ता किशोर कोडवानी कहते हैं, सन 1818 में मंदसौर संधि के कारण होलकरों ने खान नदी के किनारे बसे इंदौर को राजधानी बनाया था. 1950 के दशक तक की तस्वीरें बताती हैं कि तब तक इस नदी में लोग नहाते थे और नदी के किनारे धार्मिक आयोजन हुआ करते थे. 

शहरीकरण का दबाव

कोडवानी के मुताबिक, समस्या 60 से 70 के दशक के बीच शुरू हुई. जब शहर में तेजी से मिलें स्थापित होना शुरू हुईं और इन मिलों के काम करने के लिए देश के सभी कोने से लोग आकर इंदौर में बसने लगे. बढ़ती आबादी के लिहाज से अधोसंरचना का विकास नहीं हुआ और शहर में निकलने वाला सीवेज और कचरा कान्ह नदी में बहाया जाने लगा. जैसे-जैसे शहर का आकार बढ़ता गया, नदी में बहे जाने वाले सीवेज की मात्रा भी बढ़ती गई. यह क्रम आज भी जारी है.

कोडवानी कहते हैं, 'इंदौर में बुनियादी ढांचे के विकास की प्रक्रिया में रिंग रोड बनी, बाइपास बने, नई कॉलोनियां बनीं, पार्क बने, बीआरटीएस बना, लेकिन शहर से निकलने वाले कूड़े और सीवेज के निपटारे के लिए कोई स्थायी व्यवस्था नहीं की गई. इसे कान्ह नदी के भरोसे छोड़ दिया गया. इस तरह, इंदौर के शहरी विकास की कीमत उस नदी को चुकानी पड़ी जिसके कारण कभी ये शहर बसा था.'

इंदौर नगर निगम के आंकड़ों के मुताबिक, इंदौर से रोजाना 270 एमएलडी सीवेज निकलता है. जबकि शहर में मौजूद सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) की क्षमता 90 एमएलडी की है. ऐसे में रोजाना 190 एमएलडी सीवेज बिना ट्रीटमेंट कान्ह नदी में बहा दिया जाता है, जो आगे जाकर शिप्रा नदी में मिल जाती है. इस तरह इंदौर का पूरा सीवेज शिप्रा नदी में मिल जाता है और इसी नदी से पूरे उज्जैन शहर को पानी की आपूर्ति होती है. 

वर्ष 1882 में फोटोग्राफर दीनदयाल द्वारा खीची गई खान नदी की तस्वीर. इसे ब्रिटिश लायब्रेरी ने सेंट्रल इंडिया कलेक्शन में सहेज कर रखा है. (दीनदयाल )

अतिक्रमण

इंदौर के वरिष्ठ पत्रकार गीतेश द्विवेदी के मुताबिक, 'कान्ह नदी की बदहाली का कारण सिर्फ सीवेज ही नहीं है. नदी के कैचमेंट एरिया में हुआ अतिक्रमण और किनारे बसी 33 से ज्यादा झुग्गी बस्तियों ने भी नदी को नाला बनाने में बड़ी भूमिका निभाई है.' द्विवेदी के मुताबिक, कैचमेंट एरिया में अतिक्रमण करके किए गए निर्माण की वजह से नदी का जल प्रवाह सिकुड़ गया है.

वहीं, झुग्गियों से निकलने वाला मल-मूत्र सीधा नदी में जाता है. इसके अलावा, कई जगह इस पर अवैध आवासीय कॉलोनियां बसा दी गई हैं. इसके लिए कहीं नदी की दिशा बदल दी गई, कहीं किनारों पर रिटेनिंग वॉल बना दी गई.

वर्ष 1882 में फोटोग्राफर दीनदयाल द्वारा खींची गई कान्ह नदी की तस्वीर. इसे ब्रिटिश लायब्रेरी ने सेंट्रल इंडिया कलेक्शन में सहेज कर रखा है. (दीनदयाल)

केंद्र के झटके

कान्ह की बदहाली पर पहली बार सरकार की नजर 32 साल पहले यानी 1985 में पड़ी. मध्य प्रदेश के तत्कालीन आवास एवं पर्यावरण मंत्री महेश जोशी ने बाढ़ नियंत्रण के नाम पर केंद्र सरकार से योजना मांगी और वहां से मंजूरी भी मिल गई. हालांकि नदी की सफाई शुरू होती, इससे पहले ही केंद्र ने यह कह कर योजना रद्द कर दी कि ये नदी नहीं नाला है. इसके बाद वर्ष 1992, 2006 और 2011 में भी कान्ह के पुनरूद्घार के लिए योजनाएं बनाई गईं, लेकिन किसी को मूर्त रूप नहीं दिया जा सका.

वर्ष 2016 में उज्जैन में हुए कुंभ मेले -सिंहस्थ- से पहले मध्यप्रदेश सरकार और इंदौर प्रशासन ने एक बार फिर कान्ह नदी के पुनरूद्घार के लिए परियोजना तैयार की. 2,179 करोड़ रुपए की इस परियोजना की स्वीकृति के लिए केंद्र सरकार के पास भेजा गया. हालांकि, इस बार भी इसे केंद्र सरकार से स्वीकृति नहीं मिली. 

केंद्रीय जल संसाधन सचिव शशि शेखर कहते हैं, 'कान्ह नदी के पुनर्जीवन के लिए मध्यप्रदेश सरकार से जो प्रस्ताव आया था, उसमें बड़ी राशि नदी के कैचमेंट एरिया में हुए अतिक्रमण को हटाने और लोगों को विस्थापित करने के लिए मांगी गई थी. जल संसाधन मंत्रालय के तौर पर हम इन खर्चों के लिए पैसे नहीं दे सकते. यह राज्य सरकार का काम है.' शशि शेखर ने कहा कि यदि राज्य सरकार इस काम को पूरा करने के बाद नदी के पुनर्जीवन के लिए कोई संशोधित प्रोजेक्ट लेकर आती है, तो हम जरूर सहायता करेंगे.

बहरहाल, सिंहस्थ खत्म हुए एक साल पूरे हो चुके हैं और कान्ह की तस्वीर में कोई बदलाव नहीं आया है. हालांकि, इंदौर के जन दबाव को देखते हुए स्थानीय प्रशासन नदी के किनारे फैले अतिक्रमण को हटाने में जुटा है. 33 झुग्गी बस्तियों में से सबसे बड़ी सीपी शेखर बस्ती को विस्थापित किया जा चुका है. 

First published: 31 January 2017, 8:51 IST
 
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