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केन-बेतवा नदीजोड़ परियोजना को हरी झंडी या आपदा को आमंत्रण?

विशाख उन्नीकृष्णन | Updated on: 31 December 2016, 8:20 IST
(फाइल फोटो )

केन्द्र सरकार की महत्वाकांक्षी केन-बेतवा लिंक परियोजना को हरी झंडी मिल गई है. इस परियोजना की अंतिम अड़चन वन्य जीव बोर्ड की मंजूरी मिलना थी जो मिल गई है. पिछले कई सालों से ऐसी मंजूरी की बाट जोह रही केन-बेतवा नदी जोड़ने की परियोजना शुरू करने में लगातार विलम्ब हो रहा था.

बीते 26 दिसम्बर को भारत सरकार के प्रेस इन्फॉरमेशन ब्यूरो ने 'केन बेतवा की अंतिम अड़चन दूर' शीर्षक से जारी विज्ञप्ति में कहा है कि परियोजना को वन्य जीव बोर्ड की मंजूरी मिल गई है और इसके वित्तीय प्रबंधन को अंतिम रूप देने के बाद इसका औपचारिक निर्माण कार्य शुरू होगा.

मंजूरी पुरानी है

हालांकि, परियोजना को नेशनल बोर्ड फॉर वाइल्ड लाइफ (एनबीडब्ल्यूएल) द्वारा मंजूरी देने की बात कही गई है, पर 23 अगस्त को पीआईबी ने पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की जो विज्ञप्ति जारी की थी, उसमें 19 सितम्बर को आयोजित की जाने वाली बैठक के मिनट्स का उल्लेख है. इसका सीधा अर्थ यही है कि खबर पुरानी है.

परियोजना को अभी भी पर्यावरण मंत्रालय और वन्य जीव बोर्ड की मंजूरी मिलना बाकी है.

यह नोटिफिकेशन और भी ज्यादा अचम्भित कर देने वाला है. नोटिफिकेशन में कहा गया है कि 'परियोजना की अंतिम अड़चन पूरी'. इसमें मूल रूप से इस तथ्य को अनदेखा किया गया है कि परियोजना को अभी भी केन्द्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय और वन्य जीव बोर्ड दोनों से क्लीयरेन्स मिलना बाकी है.

केंद्रीय जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय में सचिव शशि शेखर कैच से बातचीत में कहते हैं कि हम निश्चितता के साथ यह नहीं कह सकते कि परियोजना का पारिस्थितिकि तंत्र पर क्या असर होगा. सम्बंधित अधिकारी ही पर्यावरणीय आंकलन कर इस बारे में बेहतर बता सकेंगे. मंत्रालय से क्लीयरेन्स मिले बिना परियोजना का क्रियान्वयन कोसों दूर है.

बहुत कुछ दांव पर

ज्यादा अधिक तो यह कि केवल नेशनल बोर्ड फॉर वाइल्ड लाइफ की अनुमति ही काफी नहीं है. सुप्रीम कोर्ट की सेन्ट्रल इम्पावर्ड कमेटी को संरक्षित क्षेत्र की सूची से उन विचाराधीन क्षेत्रों को हटाना होगा तभी परियोजना के आगे बढऩे की अनुमति मिल सकती है.

वन्य जीव बोर्ड द्वारा अनुमति दिए जाने के साथ ही नेशनल टाइगर कंजरवेशन अथॉरिटी ने 105 वर्ग किमी क्षेत्र में फैले बाघों के रहवास स्थल को प्रत्यक्ष नुकसान होने पर गहरी चिन्ता जताई है. अथॉरिटी का कहना है कि इस रहवास क्षेत्र के घोसलों में रहने वाले गिद्ध, चील आदि पक्षियों को तो नुकसान पहुंचेगा ही, अन्य वन्य जीवों को भी खतरा उत्पन्न होगा.

शेखर आगे कहते हैं कि क्या हमें यह समझने की जरूरत है कि हम इस परियोजना से क्या खो रहे हैं. क्या हम उनकी आजीविका को दांव पर लगा रहे हैं? देश में कई सिंचाई परियोजनाएं भी इसी तरह की चुनौतियों के कारण विफल रही हैं. हमें हर तरह के लाभ-हानि के पहलुओं पर बेहतर मूल्यांकन करने की जरूरत है.

राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण ने बाघों के रहवास स्थल को सीधे तौर पर नुकसान पहुंचने पर चिन्ता जताई है.

शेखर ने औपचारिक निर्माण कार्य शुरू करने के पहले नदी बेसिन और बाढ़ से प्रभावित होने वाले क्षेत्रों का समुचित आंकलन न किए जाने पर भी बातचीत की. उनका मानना है कि इसका उलटा परिणाम निकल सकता है. साथ ही पर्यावरण और आर्थिक क्षेत्र पर इसके असर का वैज्ञानिक आकलन उपलब्ध नहीं हैं कि इससे कितना नुकसान होगा.

परियोजना के तहत मध्य प्रदेश में पन्ना के निकट से केन नदी से पानी लेकर उप्र में झांसी के पास बेतवा नदी में पानी छोड़ा जाएगा. मप्र व उप्र की इस केन-बेतवा परियोजना के तहत लिंक नहर की कुल लम्बाई 220 किलोमीटर है जिससे बुन्देलखंड के सूखा प्रभावित खेतों को पानी मिलेगा और जनता की प्यास बुझेगी.

बड़ी कमियां

1- इस बात का कोई वैज्ञानिक साक्ष्य नहीं है कि केन नदी में कितना ज्यादा पानी है. साउथ एशिया नेटवर्क ऑफ डैम्स, रिवर्स एंड पीपुल के समन्यवक हिमांशु ठक्कर ने इससे पहले कैच से बातचीत करते हुए कहा था कि पूर्व में किए गए अध्ययनों में यह चालाकी बरती गई थी कि केन नदी में ज्यादा पानी है जबकि दोनों नदियों का जलस्तर समान है.

2- अध्ययनों से पता चलता है कि परियोजना की व्यवहार्यता जनता की जानकारी में नहीं लाई गई है. और इस बात की भी जानकारी नहीं है कि परियोजना जब क्रियान्वित होगी, तब उससे कितने गांव प्रभावित होंगे. जनता की जानकारी के लिए जो अध्ययन हैं, उसमें परियोजना की आंतरिक व्यवहार्यता बताई गई है.

3- वर्ष 2004 और 2011 के बीच जल संसाधन मंत्रालय ने नदियों के लिंकिंग के लिए एक विशेषज्ञ समिति बनाई थी. वह समिति बिना सूचना के ही भंग कर दी गई.

4- परियोजना से प्रभावित होने वाले गांवों की पंचायतों से जन सुनवाइयों के जरिए कोई सहमति भी नहीं ली गई.

5- नदी जोड़ का सीधा असर पड़ोसी देशों नेपाल, भूटान और बांग्लादेश पर पड़ेगा.

अंतिम अनुमति का इंतजार

गंगा बचाओ समिति के गोपाल कृष्ण ने जल संसाधन मंत्री उमा भारती को इस बारे में एक पत्र भी लिखा है. पत्र में उन्होंने लिखा है कि परियोजना के लिए सम्बंधित जिलों, राज्य और राष्ट्रीय गंगा नदी संरक्षण प्राधिकरणों समेत और ज्यादा संस्थाओं से अनुमति लेने की जरूरत है. कृष्ण ने लिखा है कि यह अनुमति अभी तक नहीं ली गई है.

उन्होंने पत्र में यह भी लिखा है कि एनडब्ल्यूडीए का यह दावा कि परियोजना से रोजगार बढ़ेंगे, हरियाली और पर्यटन बढ़ेगा और अंततोगत्वा खाद्य उत्पादन में वृद्धि होगी, और इस तरह राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा में इजाफा होगा, यह सब केवल दिखावा है.

First published: 31 December 2016, 8:20 IST
 
विशाख उन्नीकृष्णन @sparksofvishdom

A graduate of the Asian College of Journalism, Vishakh tracks stories on public policy, environment and culture. Previously at Mint, he enjoys bringing in a touch of humour to the darkest of times and hardest of stories. One word self-description: Quipster

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