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मेनकागिरि रिटर्न्स: गांधी ने गलत तथ्यों पर अपनी ही सरकार को घेरा

निहार गोखले | Updated on: 10 June 2016, 23:15 IST

पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर के साथ सहमत होना बहुत मुश्किल है, लेकिन उनकी मंत्रिमंडलीय सहयोगी मेनका गांधी ने अब इसे सबके लिए आसान बना दिया है. महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका ने जावड़ेकर की आलोचना करते हुए यह काम किया है.

गांधी ने बृहस्पतिवार को टीवी कैमरों के सामने एक छोटा-सा बयान दिया. इसमें उन्होंने हिमाचल प्रदेश में बंदरों को मारने की इजाजत देने के लिए पर्यावरण मंत्रालय की आलोचना की. उन्होंने कहा यह असल में उस मंत्रालय की जानवरों को मारने की 'वासना' है. हालांकि इसके साथ किए गए दावे तथ्यात्मक रूप से गलत थे.

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ऐसा पहली बार नहीं हुआ कि उन्होंने मेरे मन में जावड़ेकर और उनके मंत्रालय के प्रति सहानुभूति महसूस कराई हो. कुछ महीने पहले, पेरिस जलवायु शिखर सम्मेलन में संतुलित भाषण देने के लिए भारत ने कड़ी मेहनत की थी. इस शिखर सम्मेलन में, पश्चिमी देशों और भारत ने इस पर बात पर सींग उलझा लिया था कि कोई भी पहले की ग्लोबल वार्मिंग की जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं था.

31 मई को सरकार ने हिमाचल प्रदेश के 12 में से 10 जिलों में सामान्य रीसस मकैक बंदर को मारने की अनुमति दी थी

पेरिस में जब पश्चिमी देशों में फिर से अपनी जिम्मेदारी से हाथ झाड़ने की कोशिश की, जावड़ेकर के मंत्रालय ने उस विचार को ही खारिज करने और एक वैश्विक समझौते पर पहुंचने की रचनात्मक कोशिश करते हुए एक अच्छा काम किया.

भले ही जावड़ेकर और प्रधानमंत्री मोदी भारत की स्थिति को मजबूत बनाने के लिए पेरिस में थे, फिर भी नई दिल्ली में मेनका गांधी ने पूरी बाजी ही पलट डाली. संसद के बाहर खड़े होकर उन्होंने लापरवाही से एनडीटीवी से कहा, "पश्चिमी देशों ने शायद यह 100 साल पहले किया होगा, लेकिन फिलहाल भारत पृथ्वी को नष्ट करने वाले मुख्य खिलाड़ियों में से एक है."

जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वार्ता प्रगति पर थी, उस समय अपने ही प्रधानमंत्री के खिलाफ विरोधाभासी बयान देने से भी बदतर बात यह है कि गांधी के दावे वास्तव में तथ्यात्मक रूप से असंगत और वैज्ञानिक रूप से गलत थे.

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जानवरों की हत्या को मंत्रालय की वासना बताने वाली उनकी ताजा टिप्पणी भी इस मामले में अलग नहीं है. उन्होंने कहा कि मंत्रालय ने पश्चिम बंगाल में हाथियों की हत्या, गोवा में मोरों की हत्या और हिमाचल में बंदरों की हत्या को स्वीकृति दी है.

यह भी तथ्यों के आगे टिक नहीं पाता. सरकार ने हाथियों या मोरों की हत्या की अनुमति कभी नहीं दी. 31 मई को सरकार ने हिमाचल प्रदेश के 12 में से 10 जिलों में सामान्य रीसस मकैक बंदर को मारने की अनुमति दी थी.

यह अनुमति एक साल के लिए दी गई है. इसके पीछे कारण यह है कि शहरों से पकड़-पकड़ कर पहाड़ियों में छोड़ दिए गए ये बंदर फसलों को तबाह कर डालते हैं. मंत्रालय ने इससे पहले एक-एक वर्ष के लिए उत्तराखंड में जंगली सूअरों और बिहार में जंगली सुअरों एवं नील गायों को मारने की अनुमति दी थी.

जैसा कि जावड़ेकर ने बाद में स्पष्ट किया, ये सभी अनुमति कानून के अनुसार ही दी गई हैं. वे अपने मंत्रालय के काम पर सार्वजनिक टिप्पणी के बावजूद मेनका गांधी से अपनी नाराजगी को अच्छी तरह छिपा गए.

उन्होंने पत्रकारों को बताया, "मैं इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दूंगा कि किसने क्या कहा. लेकिन कानून के अनुसार, हमें उन किसानों की सहायता अवश्य करनी चाहिए, जिनकी फसलें बर्बाद हो रही हैं. राज्य सरकारें हमें प्रस्ताव भेजती हैं और उसके बाद ही हम एक विशिष्ट क्षेत्र के लिए अल्पकालिक कदम उठाते हैं, वह भी वैज्ञानिक तथ्यों को ध्यान में रखते हुए."

मंत्रालय ने उत्तराखंड में जंगली सूअरों और बिहार में जंगली सुअरों एवं नील गायों को मारने की अनुमति दी थी

जावड़ेकर एक हद तक सही भी हैं. वन्य जीव संरक्षण अधिनियम के तहत मंत्रालय को यह शक्ति मिली हुई है कि वे हिंसक बनने की आशंका पर पशुओं को अस्थायी रूप से दूसरी जगह स्थानांतरित कर सकता है. विभिन्न अनुमानों के अनुसार हिमाचल में बंदरों और अन्य जंगली जानवरों द्वारा की जाने वाली तबाही के कारण किसानों की फसलों को हर साल 500 से 2200 करोड़ रुपए के बीच भारी नुकसान हो रहा है.

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मानव और वन्यजीव संघर्ष को हल करना मुश्किल है. इसके लिए दीर्घकालीन उपायों की आवश्यकता होती है जैसे- बंदरों को पहाड़ियों पर न छोड़ा जाए, लेकिन आमतौर पर तात्कालिक, अल्पावधि उपायों की तुरंत जरूरत होती है.

तय प्रक्रिया का पालन करने के बाद पर्यावरण मंत्रालय ने कुछ भारी संख्या में मौजूद पशुओं को कुछ समय तक मारने की अनुमति दी है. इस दौरान मंत्रालय वन्यजीवों की लुप्तप्राय हो रही प्रजातियों जैसे- तेंदुए और बाघ, और यहां तक कि मोर के बारे में भी ज्यादा सतर्क हो गया है.

जानवरों की मौत और जलवायु परिवर्तन संबंधी टिप्पणी में मेनका गांधी ने कभी भी अपनी बात औपचारिक रूप से नहीं रखी. दोनों बयान टीवी कैमरों के सामने दिए गए थे, वे भी किसी कार्यालय की इमारत में प्रवेश करते समय. दोनों में, उसकी राय कुछ वाक्य तक सीमित है. (हैरानी की बात है- ऐसा कहीं इस कारण तो नहीं कि उनके पास अपने खुद के मंत्रालय के बारे में कहने को कुछ है ही नहीं)

दोनों ही मामलों में, उन्होंने कभी भी इस पर औपचारिक रूप से पर्यावरण मंत्रालय के सामने सवाल नहीं उठाया, यहां तक कि कभी एक आंतरिक नोट के जरिये भी नहीं.

अच्छा होगा कि वे खुद को ऐसे बयानों से दूर रखें, नहीं तो कहींं ऐसा न हो जाए कि उनके बयानों की कोई अहमियत ही न रह जाय.

First published: 10 June 2016, 23:15 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

Nihar is a reporter with Catch, writing about the environment, water, and other public policy matters. He wrote about stock markets for a business daily before pursuing an interdisciplinary Master's degree in environmental and ecological economics. He likes listening to classical, folk and jazz music and dreams of learning to play the saxophone.

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