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डॉ. नरेश स्वामी: एक महंत जंगलों में क्या-क्या ढूंढ रहा है

आकाश बिष्ट | Updated on: 5 March 2017, 21:09 IST

डॉ. नरेश स्वामी एक अनुभवी खोजकर्ता है, वह पूर्वी हिमालय के जंगलों में विचरण करते रहते हैं, कभी-कभी को तो शाम होने के बाद गोधूली बेला में भी. वह जंगली आर्किड (विशिष्ट तरह के फूलों वाले पौधों का एक प्रकार) और वनस्पतियों की विभिन्न प्रजातियों की खोज में विचरते रहते हैं. वह अपने साथ एक राइफल के अलावा उच्च क्षमता का एक कैमरा भी लिए होते हैं.

एक अनुभवी खोजकर्ता की तरह वह यदा-कदा जंगलों की कटीली जमीन पर रेंगते हुए पौधों की खोज करते हैं. उनमें से कुछ पौधे तो कुछ सेंटीमीटर से ज्यादा ऊंचे नहीं होते हैं. घने जंगलों के किसी कोने में सदियों से छिपे पौधों की वह वैज्ञानिक तरीके से खोज करते हैं और जनता के सामने लाते हैं.

डॉ. स्वामी को अक्सर “आर्किड हंटर ऑफ इंडिया ” यानी विशिष्ट तरह के फूलों वाले पौधों की खोज करने वाले इंसान के रूप में जाना जाता है. डॉ. स्वामी खुद तथा उनकी खोज स्वयं में एक मिसाल है.

मीडिया की चकाचौंध से दूर डॉ. स्वामी दुष्प्राप्य और दुर्लभ पौधों की खोज में हिमालय के घने जंगलों में चले जाते हैं. वह लिवरपूल यूनीवर्सिटी और जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी से डबल एमए हैं. उनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने अज्ञात पौधों विशेषकर आर्किड की खोज में 27,000 किमी की पैदल यात्रा कर डाली है. वह सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश के दुर्गम इलाकों में भी गए हैं.

उन्होंने सिक्किम में आर्किड की 530 से भी ज्यादा प्रजातियों का दस्तावेज नत्थी किया है. किसी भी एक व्यक्ति द्वारा अकेले ही एक ही समय में इतनी प्रजातियों को खोज निकालना अभी तक का एक रिकॉर्ड है. उन्होंने पूर्वी हिमालय में मिली पौधों की विभिन्न प्रजातियों पर दो पुस्तकें भी लिखी हैं.

ब्रिटिश राज में हुआ था ऐसा काम

आखिरी दफा ऐसा ही काम 119 साल पहले 1898 में किया गया था. अंग्रेज वनस्पतिशास्त्री सर जार्ज किंग और रॉबर्ट पेंटलिंग ने अपने ऐतिहासिक कार्य को 'दि आर्किड ऑफ दि सिक्किम हिमालयास' को पुस्तक के रूप में छपाया था. इस किताब में उन्होंने आर्किड की 449 प्रजातियों का ब्यौरा दिया है और उनके बारे में बताया है. डॉ. स्वामी ने इन प्रजातियों को फिर से दस्तावेज के रूप में लिखने का मन बनाया और एक कदम आगे बढ़ते हुए 530 नई प्रजातियां खोज निकालीं. उन्होंने अपनी किताब में उसी नाम से इन प्रजातियों का पूरा ब्यौरा दिया है.

दोनों अंग्रेज वनस्पतिशास्त्रियों ने क्षेत्र के विभिन्न हिस्सों से आर्किड की ताजा प्रजातियों को लाने के लिए लेपचा लोगों की सहायता ली थी, पर डॉ. स्वामी ने ऐसा नहीं किया. डॉ. स्वामी ने अपनी दम पर खुद ये दस्तावेज तैयार किए. बिना किसी की सहायता लिए वह घने जंगलों में एक जगह से दूसरी जगह गए. अपनी खोजों की तरह ही एक पुजारी से देश के टॉप वनस्पति शास्त्री तक बनने की डॉ. स्वामी की जीवनयात्रा भी समान रूप से महत्वपूर्ण है.

डॉ. स्वामी अभी हाल में प्राकृतिक सौंदर्य के लिए मशहूर अरुणाचल प्रदेश की जीरो घाटी की 17 घंटे की लम्बी यात्रा पर थे. उन्होंने कैच से बातचीत में कहा कि नम्बूदरी ब्राह्मणों में एक प्रथा है कि परिवार के एक पुत्र को पुजारी बनना पड़ता है. संयोगवश मेरा नाम पुजारी बनने के लिए तय कर दिया गया. हालांकि, मैं प्रतिभाशाली और योग्य छात्र था. मेरे माता-पिता ने मुझे आगे पढ़ने और बढ़ने की अनुमति दे दी. मैं पुजारी तो बना लेकिन एम.एससी की डिग्री भी ली.

मुझे लिवरपुल यूनिवर्सिटी से पीएचडी की डिग्री मिली. और इस तरह से पुजारी के रूप में मेरे करियर को विराम लग गया. डॉ. स्वामी ने कैच से यह भी कहा कि मेरे लिए ऐसा इसलिए सम्भव हो सका क्योंकि नम्बूदरियों में एक प्रथा थी कि यदि एक बार आप समुद्र पार कर लेते हैं तो आप लम्बे समय तक पुजारी बने नहीं रह सकते.

टर्निंग प्वाइंट

पीएचडी पूरी करने के बाद डॉ. स्वामी संन्यासी बनने के लिए मथुरा चले गए. बचपन से ही वह वेद और उपनिषद पढ़ते रहे थे, ऐसे में 37 वर्षीय वनस्पतिशास्त्री ने यह खोज निकाला कि पुराने धर्मग्रन्थों में जिन आर्किड्स का उल्लेख है, वह क्षेत्र में काफी संख्या में पाए जाते हैं. वह कहते हैं कि मैं यह देखकर आश्चर्यचकित रह गया कि कई प्राचीन ग्रन्थों में जिन आर्किड्स का संदर्भ है, वह उत्तर पूर्व में पाए जाते हैं. यह मेरे करियर का टर्निंग प्वाइंट था और मैंने इन आर्किड्स को खोज निकालने का मानस बना लिया.

लगभग एक साल में ही उन्होंने सिक्किम के आर्किड्स पर 1898 में लिखी पुस्तक पढ़ डाली और अशोका ट्रस्ट फॉर रिसर्च इन इकोलॉजी एंड दि इनवायरमेन्ट में रिसर्च असिस्टेन्ट की नौकरी का प्रस्ताव मिलने से पहले ही क्षेत्र में अकेले ही काम करना शुरू कर दिया. डॉ. स्वामी की उल्लेखनीय खोजों में से एक अति दुलर्भतम एपीपोजियम एफिलम आर्किड है. भारत में यह आर्किड इसके पहले कभी नहीं देखा गया था. इसकी कोई फोटो भी नहीं थी.

आखिरी बार यह दुलर्भतम आर्किड सितम्बर 2010 में पाया गया था. सफेद रंग का यह फूल पांच सेंटीमीटर ऊंचा था जो यूके में वेल्स की सीमा के पास पाया गया था. इसके पहले यह प्लांट 1986 में देखा गया था. इसके बाद 2005 में इसे आधिकारिक रूप से विलुप्त घोषित कर दिया गया था.

अद्भुत खोज

डॉ. स्वामी अकेले ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने दुलर्भतम 16 आर्किड्स के फोटो लिए हैं. इनके बारे में जब वह बात करते हैं तो वह अपना जोश छिपा नहीं पाते हैं. वह बताते हैं कि किस तरह से यह दुष्प्राप्य पौधा उसी क्षेत्र में दुबारा नहीं उगता.

वह बताते हैं कि यह पौधा 70-80 साल तक जमीन में दबा रहता है और यह तभी खिलता है जब तापमान उसके मन-माफिक होता है. एक बार जब इसकी बहार आ जाती है तो विभिन्न स्थानों पर फैल जाता है. यह फैलता कैसे है, कोई नहीं जानता. यह अन्य फूलों जैसा नहीं है जो सूर्य की रोशनी से प्रोटीन और शुगर लेता है. इसे किसी रोशनी की भी जरूरत नहीं पड़ती. यह परजीवी है जो अन्य पौधों की जड़ों पर कुकुरमुत्तों की तरह से उग आने वाले पत्तियों से ऊर्जा लेता है. वह कहते हैं कि यह मेरी बड़ी खोजों में से एक खोज है.

स्वामी के पहले किसी ने भी इसका फोटो नहीं लिया था. वह कहते हैं कि यह पूर्वी हिमालय में पाया जाने वाला एक मात्र पत्ती रहित आर्किड है. अपना महान कार्य करते समय वनस्पतिशास्त्री किंग और पेंटिंग ने इसे 'मॉइस्ट वर्टिकल रॉक' का नाम दिया है. 125 सालों से अधिक समय बाद मैं इसी मॉइस्ट वर्टिकल रॉक को खोज निकालने में सफल हो सका.

डॉ. स्वामी ने हाल में अपनी एक अन्य पुस्तक 'हिडिन ट्रेजर्सः रेयर प्लांट्स ऑफ अल्पाइन हिमालयास' प्रकाशित कराई है. वर्तमान में वह अरुणाचल प्रदेश में पौधों की नई प्रजातियों की खोज में लगे हुए हैं.

ख़तरे

डॉ. स्वामी एक धार्मिक इंसान हैं. सचमुच में, वह अपने सभी कामों का श्रेय ईश्वर को देते हैं. वह कहते हैं कि मेरा जन्म इसी काम के लिए हुआ है. संयोगवश मैं महन्त तो नहीं हो सका लेकिन मैं अकेला ऐसा इंसान हूं जिसने दुर्लभ 184 प्लांट्स के फोटो लिए हैं. मैं तो इस उपलब्धि को हासिल करने वाला मात्र एक यंत्र हूं. यह काम बिना किसी बड़ी आर्थिक सहायता के सम्पन्न नहीं हो सकता था. यह ईश्वर की कृपा है.

हालांकि, डॉ. स्वामी अपनी इस कड़ी मेहनत को कम करके बता रहे हैं जो उन्होंने इन शानदार प्लांट्स को हासिल करने में की है. एक बार भालू से सीधा आमना-सामना होने की बात बताते हुए वह कहते हैं कि वह जंगली जानवरों से भयभीत हो जाते हैं जो मिट्टी खोदते समय अचानक निकल आते हैं. वह बताते हैं कि पार्कों और अभ्यारण्यों के संरक्षण से किस तरह से चीता, तेंदुओं की संख्या बढ़ रही है.

वह आगे यह भी कहते हैं कि इस क्षेत्र में टाइगर्स, लियोपार्ड्स के काफी संख्या में आ जाने से उनका काम और ज्यादा खतरनाक हो गया है. इस उष्णकटिबंधीय इलाके में सांपों की संख्या बहुत ज्यादा हो गई है. इन प्लांट्स में से कुछ प्लांट्स तो इतने छोटे हैं कि कभी-कभी इनकी फोटो लेने में घिसटना भी पड़ता है. इससे भी मेरा काम काफी भयावह हुआ है. वह यह भी कहते हैं कि आखिर यह काम किसी न किसी को तो करना ही है.

शोधकर्ताओं की युवा पीढ़ी के अंदाज से खौफ खाए डॉ. स्वामी दावे के साथ कहते हैं कि उनकी केवल पीएचडी करने में रुचि होती है क्योंकि 18,000 रुपए का स्टाइपेंड जो मिलता है. उनका यह भी आरोप है कि युवा वर्ग केवल पेपर लिखने में ही रुचि रखता है. उनमें से कुछ के बारे में उनका दावा है कि तथ्यात्मक रूप से यह गलत होते हैं.

डॉ. स्वामी कहते हैं कि मैंने यह शोध इसलिए किया था ताकि नए लोग आगे आने के लिए प्रेरित हों तथा क्षेत्र के पेड़-पौधे, वनस्पति तथा पशुओं के बारे में शोध कर सकें.

वर्ष 2012 की एक घटना को याद करते हुए डॉ. स्वामी कहते हैं कि जब भारत को 2012 में कोई मेडल नहीं मिला था और टीम बिना किसी मेडल के ही लौट आई थी, तब सिक्किम के एक स्थानीय निवासी ने उनसे कहा था कि जब भी प्लांट्स की खोज में ओलम्पिक होंगे तो हमें (डॉ. स्वामी को) स्वर्णपदक जरूर मिलेगा. वह आगे कहते हैं कि मुझे यह जानकर बेतहाशा खुशी हुई कि स्थानीय लोग भी मेरे कामों से वाकिफ हैं.

First published: 6 March 2017, 8:34 IST
 
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