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सारसों के संरक्षण के मकसद से पनबिजली परियोजना पर एनजीटी ने लगाई रोक

निहार गोखले | Updated on: 13 April 2016, 8:05 IST
QUICK PILL
  • नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने ब्लैक नेक्ड सारसों को होने वाले नुकसान की वजह से 780 मेगावॉट वाली जल विद्युत परियोजना को मिली पर्यावरणीय मंजूरी पर रोक लगा दी है.
  • केंद्र सरकार ने अदालती सुनवाई के दौरान पक्षी की मौजूदगी को खारिज कर दिया था. सरकार पूर्वोत्तर के राज्यों में कई सालों से इस पक्षी की मौजूदगी की बात को नकारती रही थी.

काफी लंबे समय से हिमालय में चल रही जल विद्युत परियोजना का स्थानीय लोग और पर्यावरणविद विरोध करते रहे हैं. हालांकि यह पहली बार हुआ है जब ऐसी किसी परियोजना का विरोध लोगों ने नहीं बल्कि माइग्रेटरी बर्ड ने किया है.

7 अप्रैल को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने ब्लैक नेक्ड क्रेन को होने वाले नुकसान की वजह से 780 मेगावॉट वाली जल विद्युत परियोजना को मिली पर्यावरणीय मंजूरी पर रोक लगा दी है. परियोजना अरुणाचल के तवांग जिले में न्यामजंग चू नदी के किनारे प्रस्तावित थी.

करीब चार सालों तक एनजीटी में इस परियोजना की वजह से चिड़िया पर पड़ने वाले उल्टे असर को लेकर चर्चा और अध्ययन किया गया. वकीलों का कहना है कि पहली बार ऐसा हुआ है कि किसी पक्षी की वजह से पूरी परियोजना को ही रद्द कर दिया गया.

केंद्र सरकार ने ब्लैक नेक्ड क्रेन की मौजूदगी को ही खारिज कर दिया था.

केंद्र सरकार ने अदालती सुनवाई के दौरान पक्षी की मौजूदगी को खारिज कर दिया था. सरकार पूर्वोत्तर के राज्यों में कई सालों से इस पक्षी की मौजूदगी की बात को नकारती रही थी.

दुर्लभ है ब्लैक क्रेन

ब्लैक नेक्ड क्रेन पांच फुट लंबा पक्षी है और यह खतरे में पड़ी प्रजातियों में शामिल है. इस पक्षी की आबादी करीब 11,000 है और तेजी से इसकी संख्या घट रही है. ब्लैक नेक्ड क्रेन तिब्बत के पठारी इलाके में प्रजनन करता है और फिर यह भूटान और अरुणाचल प्रदेश में सर्दियों के दिन में अपना डेरा जमाते हैं.

मोंपा समुदाय के लोग इस पक्षी को छठे दलाई लामा का अवतार मानते हैं जो खुद भी मोंपा ही थे. ऐसा कहा जाता है कि छठें दलाई लामा की मृत्यु के बाद इस पक्षी के पंख की तलाश के दौरान सातवें दलाई लामा मिले थे.

मोंपा समुदाय के लोग  ब्लैक नेक्ड क्रेन को छठे दलाई लामा का अवतार मानते हैं

क्रेन आवास के लिहाज से संवेदनशील पक्षी की श्रेणी में आता है. यह उन पक्षियों में से एक है जिसे भारत के वन्य संरक्षण कानून के तहत कड़ी सुरक्षा दी गई है.

मंजूरी

2007 में नोएडा के भिलवाड़ा समूह ने 900 मेगावॉट की जलविद्युत परियोजना के लिए मंजूरी मांगी थी. 2008 में समूह ने अपनी योजना में संशोधन कर इसकी क्षमता को घटाकर 780 मेगावॉट कर दिया.

हालांकि क्रेन को हर साल परियोजना स्थल के आस पास देखा गया. विशेषकर 2001 के बाद से इन पक्षियों को यहां देखा गया लेकिन भिलवाड़ा समूह ने अपने आवेदन में इसका जिक्र नहीं किया. हालांकि कंपनी ने अपने आवेदन में दूसरे वन्य जीवों की मौजूदगी का जिक्र जरूर किया. पर्यावरण आकलन अध्ययन में इस पक्षी का जिक्र नहीं किया गया.

क्रेन को हर साल परियोजना स्थल के पास देखा गया लेकिन भिलवाड़ा समूह ने अपनी रिपोर्ट में इसका जिक्र नहीं किया

7 अप्रैल को एनजीटी ने 2012 में यूपीए सरकार की तरफ से दी गई पर्यावरणीय मंजूरी को खारिज करते हुए नए सिरे से अध्ययन कराने का आदेश दिया. इसके साथ ही नए सिरे से इस मामले की सुनवाई शुरू हुई.

एनजीटी ने इस मामले में वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया को भी नए सिरे से अध्ययन करने का आदेश दिया.

निराशाजनक कानून

प्रोजेक्ट डिवेलपर ने एनजीटी से कहा कि उसे क्रेन के बारे में कोई जानकारी नहीं थी. इसके बाद एनजीटी ने पर्यावरण मंत्रालय की विशेषज्ञ समिति को भी रद्द कर दिया. बाद में मंत्रालय ने जब नई रिपोर्ट दी तो उसमें पक्षी की मौजूदगी के बारे में बताया गया. मंत्रालय के पूर्वोत्तर कार्यालय ने जनवरी 2012 में जब अपनी रिपोर्ट सौंपी तो इसमें क्रेन के मुद्दे को तवज्जो दी गई थी.

मंत्रालय ने हालांकि इस लेटर पर कोई जवाब नहीं दिया और अप्रैल में परियोजना को मंजूरी दे दी गई. मंजूरी मिलने के बाद तत्कालीन पर्यावरण मंत्री जयंती नटराजन ने क्षेत्रीय कार्यालय को लिखा कि उन्हें यह मामला मंजूरी मिलने के पहले उठाना चाहिए था.

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वास्तव में मंजूरी देने के एक साल पहले पर्यावरण मंत्रालय ने क्रेन को लेकर जागरूकता फैलाने के लिहाज से अंतरराष्ट्रीय सम्मलेन का आयोजन किया था. 

जनवरी 2011 में जुलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के दो वैज्ञानिकों ने एक रिपोर्ट लिखकर अरुणाचल प्रदेश में क्रेन के दिखाई देने की पुष्टि की थी.

एनजीओ कल्पवृक्ष के सदस्य नीजर वाघोलीकर के मुताबिक, 'प्रोजेक्ट के समीपवर्ती इलाकों में वन संरक्षण कानूनों का घोर उल्लंघन हुआ. शिकायतों के आधार पर क्षेत्रीय कार्यालय ने प्रोजेक्ट को मंजूरी नहीं दिए जाने की सिफारिश की थी.'

अगस्त 2015 में मंत्रालय की विशेषज्ञ समिति ने पाया कि बांध का इलाका क्रेन का पर्यावास है. मंत्रालय की तरफ से पहली बार इस बात को माना गया था.

अंधकारमय भविष्य

दुर्भाग्यवश क्रेन के सरंक्षण को लेकर अभी भी बहुत कुछ नहीं किया जा सका है. एनजीटी ने अपने आदेश के जरिये बस प्रोजेक्ट पर रोक लगाई है न कि इसे रद्द किया है. मामले से जुड़े एक व्यक्ति ने कहा, फैसले में लिखी गई बातें निश्चित तौर पर चिंता का कारण हैं.

उन्होंने कहा कि नेहू की रिपोर्ट में प्रवाह को बनाए रखने की कई सिफारिशें की गई हैं. लेकिन सच्चाई यह है कि अगर इन्हें लागू किया गया तो परियोजना अव्यावहारिक हो जाएगी.

ऐसे में अगर डब्ल्यूआईआई परियोजना के खिलाफ रुख लेती है तो इसे रोका जा सकता है और दूसरा तरीका स्थानीय लोगों के विरोध का है. अगर बांध के खिलाफ स्थानीय लोग कानून का सहारा लेते हैं तो इसे रोका जा सकता है.

दोनों संभावनाएं कमजोर लगती हैं. लेकिन इन्हीं तरीकों से क्रेन को संरक्षित किया जा सकता है.

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First published: 13 April 2016, 8:05 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

Nihar is a reporter with Catch, writing about the environment, water, and other public policy matters. He wrote about stock markets for a business daily before pursuing an interdisciplinary Master's degree in environmental and ecological economics. He likes listening to classical, folk and jazz music and dreams of learning to play the saxophone.

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