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सूखे पर सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की ज्यादातर राज्यों ने किस तरह उड़ाई धज्जी?

निहार गोखले | Updated on: 7 February 2017, 8:22 IST

वर्ष 2015-16 के सूखे से भारत की लगभग एक तिहाई आबादी प्रभावित हुई है. यह संख्या खुद सरकार की है जो उसने सुप्रीम कोर्ट में बताई है. सुप्रीम कोर्ट, जो सूखा राहत पर स्वराज अभियान द्वारा दाखिल एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रहा था, ने 13 मई के अपने ऐतिहासिक निर्णय में खाद्य सुरक्षा और रोजगार गारंटी सुनिश्चित करने के मानकों को लेकर व्यापक निर्देश दिए हैं.

देश के सूखा प्रभावित क्षेत्रों में हाल में किए गए एक सर्वे के मुताबिक अधिकांश राज्यों ने अभी तक सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का पालन नहीं किया है. राज्य सभी मोर्चों मसलन रोजगार सृजन, सूखा प्रभावित क्षेत्रों में सस्ते दर पर सार्वजनिक खाद्यान्न वितरण प्रणाली को सुदृढ़ करने और बच्चों को गर्मी के मौसम में मध्यान्ह भोजन सुलभ कराने में विफल रहे हैं.

राजधानी से सिर्फ 70 किमी दूर एक गांव के निवासी स्वच्छ पेयजल की आजादी के इंतजार में

यह सर्वे एक्शन एड इंडिया द्वारा इसी साल जून महीने में कराया गया था. सूखा प्रभावित क्षेत्रों में रह रहे लोगों पर यह दूसरा सर्वे था. पहला सर्वे स्वराज अभियान द्वारा वर्ष 2015 में कराया गया था. (सूखे से प्रभावित लोगों की संख्या को लेकर सरकार के पास कोई आंकड़े ही उपलब्ध नहीं हैं.)

लेकिन सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद यह पहला सर्वे भी है. आदर्श स्थिति तो यह होनी चाहिए थी कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का क्रियान्वयन हो लेकिन हालत इसके विपरीत है. इस सर्वे से यह पता चलता है कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश सिर्फ पांच फीसदी ग्राम पंचायतों तक ही पहुंच सका है.

सर्वे से सूखे की जो तस्वीर सामने आई है, वह बड़ी भयावह और दिल दहला देने वाली है.

33 फीसदी

यानी सर्वे किए लोगों में एक तिहाई लोगों तक राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत सस्ते खाद्यान्न की पहुंच ही सुनिश्चित नहीं हो पायी. सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि राज्य राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के प्रावधानों के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए विशेष रूप से सूखा प्रभावित इलाकों में सार्वजनिक वितरण प्रणाली को सुदृढ़ कराएं.

सूखा प्रभावित क्षेत्रों में लोगों की आय पर विचार किए बिना सभी लोगों को हर माह पांच किलो गेहूं उपलब्ध कराया जाए. मप्र में सर्वे के दैरान यह पता चला कि दुकानें हफ्ते में सिर्फ तीन दिन ही खुलती हैं.

100 फीसदी

महाराष्ट्र के स्कूल गर्मियों की छुट्टियों के दौरान बंद रहे. सुप्रीम कोर्ट का आदेश था कि गर्मियों में स्कूल खुले रहें ताकि बच्चों को मध्यान्ह भोजन दिया जा सके. इसमें दूध और अंडा भी शामिल किया जाना था.

सर्वे से राज्य सरकार के दावे की पोल स्वत: खुल जाती है. राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दिए शपथपत्र में कहा है कि गर्मियों में मिड-डे मील बांटा गया.

71 फीसदी

ओडिशा की महिलाओं ने कहा कि जो खाद्य पदार्थ उन्हें मिला, वह सूखे के कारण कम कर दिया गया. लघु और सीमान्त किसानों को उनके परिवार की जरूरत के हिसाब से केवल 33 फीसदी ही आहार मिला. खबर यह भी है कि ओडिशा में मिड-डे मील योजना विफल हो गई. जंगलों से मिलने वाले आहार में भी सूखे के कारण 40-60 फीसदी की कमी आई.

45 फीसदी

यानी राजस्थान के आधे गांवों में मनरेगा कार्य शुरू ही नहीं किया गया था जब सर्वे किया गया. मप्र और महाराष्ट्र में यह प्रतिशत 37 था. सर्वे में यह भी पता चला कि 10 फीसदी से भी कम मजदूरों को किसी तरह से 100 दिन का काम मिला. जबकि सरकार ने सूखा प्रभावित क्षेत्र में 150 दिन के काम का वचन दिया हुआ है. मप्र के 80 फीसदी गांवों में मजदूरी भुगतान में देरी हुई.

81 फीसदी

ओडिशा के किसानों को सूखा पैकेज के तहत इनपुट सब्सिडी नहीं मिली. 60 फीसदी उत्तर प्रदेश के किसान फसल क्षतिपूर्ति और इनपुट सब्सिडी से वंचित रहे. मप्र में यह प्रतिशत 24 रहा जो सबसे कम है.

सर्वे किए गए सभी गांवों में 60 से 94 फीसदी किसानों की फसलें नष्ट हो गईं थीं.

90 फीसदी

अर्थात लगभग सभी पशुओं को मप्र के गांवों में आवारा छोड़ दिया गया क्योंकि पशुओं को खिलाने के लिए चारा ही नहीं बच सका था. उत्तर प्रदेश में सूखे का कारण पशुओं की 22 फीसदी हानि हुई.

महाराष्ट्र और मप्र को छोड़कर किसी भी राज्य ने अपने गांवों में पशु शिविर नहीं लगाया. सर्वे सात सूखा प्रभावित राज्यों- झारखंड, ओडिशा, मप्र, महाराष्ट्र, राजस्थान, तेलंगाना और उत्तर प्रदेश के 30 जिलों के 279 गांवों में कराया गया था.

सर्वे के परिणामों के बारे में पूर्व नौकरशाह और सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मन्दर कहते हैं कि राज्य अपने अड़ियल उदासीन रवैये के चलते मूकदर्शक बने रहे हैं. वह याद करते हुए कहते हैं कि 1980 के दशक में वह एक जिले में जिलाधिकारी थे. सूखा प्रभावित क्षेत्रों में मदद के लिए उन्होंने बिना किसी सीमा के राजकोष खोल दिया था. हां, उस समय इतना भ्रष्टाचार भी नहीं था लेकिन हर राज्य का कर्तव्य था कि वह सूखा प्रभावित लोगों की मदद करे.

मजदूर किसान शक्ति संगठन के निखिल डे के मुताबिक राजस्थान सरकार ने कहा है कि वह अक्टूबर तक मनरेगा में कामकाज के दिन बढ़ाएगी. ऐसे में अभी वह मदद कैसे कर सकेगी? सुप्रीम कोर्ट के आदेश के चलते राज्य जगहंसाई के पात्र बनकर रह गए हैं.

First published: 19 August 2016, 8:04 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

संवाददाता, कैच न्यूज़. जल, जंगल, पर्यावरण समेत नीतिगत विषयों पर लिखते हैं.

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