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मुम्बई का घुट सकता है गला, संजय गांधी राष्ट्रीय पार्क को खत्म करने की कोशिश

अश्विन अघोर | Updated on: 10 February 2017, 1:46 IST
QUICK PILL
  • ऐसा लगता है कि भारतीय जनता पार्टी मुम्बई में राजनीतिक लाभ हासिल करने के लिए कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखेगी. 
  • म्युनिस्पिल कॉरपोरेशन ऑफ ग्रेटर मुम्बई (एमसीजीएम) के चुनाव को देखते हुए राजनीतिक लाभ की खातिर पार्टी मुम्बई का फेफड़ा कहे जाने वाले संजय गांधी नेशनल पार्क का अस्तित्व ही दांव पर लगाना चाहती है. 

भाजपा के नेतृत्व वाली राज्य सरकार ने पूर्व में पर्यावरण के नाम पर कई 'लोकप्रिय' निर्णय लिए हैं. लेकिन यदि राज्य सरकार अपने ही तरीके से आगे बढ़ती रही तो संजय गांधी नेशनल पार्क (एसजीएनपी) के आसपास की वन भूमि पर अवैध रूप से बनी कच्ची बस्तियों और अन्य निर्माण कार्य को जल्द ही नियमित कर दिया जाएगा.

भाजपा सांसद और विधायक केन्द्र सरकार से यह अनुमति देने के लिए लॉबिंग कर रहे हैं कि एसजीएनपी के आसपास का बफर जोन 10 किमी से घटाकर 100 मीटर कर दिया जाए और बॉम्बे पोर्ट ट्रस्ट की जमीन पर किए गए अवैध निर्माण को

नियमित कर दिया जाए. यह वन जैव-विविधिता के क्षेत्र में अति सम्पन्न है. अवैध अतिक्रमण और नाजायज रूप से पेड़ों की कटाई के चलते इस वन पर हमेशा ही खतरा मंडराता रहता है. और अब राजनीतिक लोग इसके ताबूत में आखिरी कील ठोंकने के लिए बेताब हैं.

मुम्बई के लिए राष्ट्रीय उद्यान का महत्व

मुम्बई के बाहर रह रहे लोगों के लिए यह आंकलन करना बहुत ही मुश्किल भरा काम है कि संजय गांधी नेशनल पार्क, जिसे पूर्व में बोरीवली नेशनल पार्क के रूप में जाना जाता था, बहुत ज्यादा घने बसे मुम्बई के लिए किस तरह जीवनदायिनी शक्ति का काम कर रहा है. 

यह भारत का प्रमुख राष्ट्रीय उद्यान है जो 104 वर्ग किमी में फैला हुआ है. मुम्बई के लोगों को इस पार्क से अनगिनत लाभ हैं. यह पार्क दुनिया का एक ऐसा अनोखा नेशनल पार्क है जो शहर के बीच में बसा है. अब तो यह भी जानकारी मिली है कि इसमें तीन दर्जन तेंदुए भी अपना रहवास बनाए हुए हैं और उन्होंने अपना-अपना इलाका बांट रखा है.

इसके महत्व का एक प्रमुख उदाहरण देना पर्याप्त होगा. 2005 में मुम्बई में आई बाढ़ सभी को याद होगी. जुलाई 2005 में हुई मूसलाधार बारिश से पूरी मुम्बई लबालब हो गई थी. सैकड़ों लोगों की जान चली गई थी और बड़ी मात्रा में सम्पत्ति को नुकसान पहुंचा था. 

जब पानी उतार पर आया और प्रशासन ने हालात और नुकसान का जायजा लेना शुरू किया तो प्रशासन और सरकार को महसूस हुआ कि हालात तो और भी बदतर हो सकते थे. विशेषज्ञों को यह बात समझ में आई कि संजय गांधी नेशनल पार्क ने बाढ़ से बचाव का बहुत बड़ा काम किया है. 

बारिश का अधिकांश पानी वन में समा गया था या यों कहा जाए कि वन के कारण ज्यादातर पानी जमीन में चला गया था और बहुत थोड़ा ही बरसाती पानी बाहर आया था. 

हालांकि, एक बार जब हालात सामान्य हो गए और पहले जैसी स्थिति आ गई तो प्रशासन भी वन का महत्व भूल गया. और, इसके बाद 2011 में, यूपीए के नेतृत्व वाली केन्द्र सरकार ने सभी राष्ट्रीय पार्कों और वन्य जीव अभ्यारण्यों के इर्द-गिर्द 10 किमी का बफर जोन की नीति को क्रिय़ान्वित करने का निश्चय किया. 

घटेगा बफ़र ज़ोन का आकार

हालांकि, संजय गांधी नेशनल पार्क के आस-पास की घनी आबादी के कारण यह निर्णय समुचित रूप से कभी क्रियान्वित नहीं हो सका. केन्द्रीय पर्यावरण मंत्री के साथ बैठक लम्बे समय से, संजय गांधी नेशनल पार्क के इर्द-गिर्द 25 लाख अवैध निर्माणों में रहने वाले लगभग एक करोड़ लोग मांग करते आ रहे हैं कि बफर जोन का आकार घटा दिया जाए. 

अब भाजपा ने इस मांग को अपना समर्थन दे दिया है ताकि इन अवैध निर्माणों को किया जा सके और नए निर्माण कर लोग काबिज हो सकें.

भाजपा नेताओं का एक प्रतिनिधिमंडल विधायक आशीष शेलर के नेतृत्व में केन्द्रीय पर्यावरण मंत्री, रेल मंत्री, सड़क परिवहन मंत्री और शहरी विकास मंत्री से मिला भी है और उनसे 30 लाख अवैध निर्माणों को नियमित करने के नियमों में छूट दिए जाने की मांग की है. इस प्रतिनिधिमंडल में सांसद किरीट सौमेय्या, गोपाल शेट्टी, पूर्व विधायक अतुल शाह पार्षद मनोज कोटक और सुनील राणे भी शामिल थे.

पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने अपना नाम न छापने का अनुरोध करते हुए स्वीकार किया है कि यद्यपि राज्य सरकार ने बफर जोन को काम करने के लिए कोई औपचारिक प्रस्ताव तैयार नहीं किया है लेकिन प्रतिनिधिमंडल का केन्द्रीय नेताओं से मिलना इस दिशा में पहला कदम है.  

भाजपा के एक अन्य नेता ने बताया है कि केन्द्रीय नेताओं के साथ मुलाकात अच्छी रही है. राज्य सरकार को भरोसा है कि बफर जोन का क्षेत्र बहुत जल्द ही कम कर दिया जाएगा. मौजूदा स्थिति तो यह है कि प्रतिनिधिमंडल ने मुद्दा तैयार कर दिया है जो राज्य सरकार चाहती ही थी. 

हालांकि, लगता यह है कि कुछ पार्टी नेताओं ने इसका सूत्रपात कर दिया है, वास्तव में, इसे राज्य सरकार ने ही इसे बढ़ावा दिया था ताकि एकबार यह मामला गति पकड़ ले तो केन्द्र सरकार से निर्णय अपने पक्ष में कराया जा सके.

पर्यावरण और वन मंत्री अनिल दवे से अपनी मुलाकात में प्रतिनिधिमंडल ने मांग की है कि बफर जोन की सीमा 10 किमी से घटाकर 100 मीटर की जाए. इससे एसजीएनपी के आस-पास अवैध निर्माणों में रह रहे 70 लाख लोग लाभान्वित हो जाएंगे.

उन्होंने कहा कि एसजीएनपी के 10 किमी के बफर जोन में घनी आबादी बसी हुई है. कई उपनगरीय इलाके जैसे दहीसर, बोरीवली, अंधेरी, कांडीवली, भंदूप और मुलन्द जैसे इलाके हैं. 

सुप्रीम कोर्ट भी बफर जोन के बारे में फिर से विचार करने का केन्द्र सरकार को निर्देश दे चुका है. विधायक शेलर कहते हैं कि लेकिन पूर्ववर्ती सरकारों ने कुछ नहीं किया है. अब हमने यह मुद्दा अपने हाथ में लिया है. बफर जोन का इलाका कम कराकर हम जल्द ही प्रभावितों को राहत दिलाएंगे.

पर्यावरणविदों ने खतरे की घंटी बजाई

हालांकि, पर्यावरणविदों ने भाजपा नेताओं के इस प्रस्ताव पर कड़ी आपत्ति जताई है. मुम्बई के एक एनजीओ वनशक्ति के निदेशक स्टालिन डी कहते हैं कि यह संजय गांधी नेशनल पार्क के ताबूत में आखिरी कील साबित हो रहा है. पहले से ही, लोगों का इस जगह अतिक्रमण है.

स्वघोषित भगवानों ने राजनीतिक नेताओं का समर्थन कर दिय़ा है. राष्ट्रीय पार्क में ढेर सारे धार्मिक स्थल हैं. पार्क के उत्तरी भाग में वन्य जीव अभ्यारण्य में अवैध आश्रम है. सुप्रीम कोर्ट द्वारा इसे ध्वस्त किए जाने का आदेश दिए जाने के बाद भी इसे ध्वस्त नहीं किया गया है. स्टालिन कहते हैं कि यदि सरकार इसी तरह का लोकप्रिय निर्णय लेती है तो उन्हें नहीं लगता कि यह आखिरी हरियाली बची रहेगी. और शहर में फिर हरियाली दिखेगी.

First published: 13 October 2016, 7:37 IST
 
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