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जीएम मस्टर्डः नए आंकड़ों से सरकार बैकफुट पर

निहार गोखले | Updated on: 10 March 2016, 22:54 IST
QUICK PILL
  • जीएम मस्टर्ड के समर्थक दावा करते रहे हैं कि इससे वाणिज्यिक उत्पादन में 25-30 प्रतिशत की बढ़ोतरी होगी. लेकिन इस मामले में सामने आए ताजा आंकड़ों से इसकी पुष्टि नहीं होती.
  • जीएम मस्टर्ड के परीक्षण के लिए मानक तरीकों का पालन नहीं किया गया. गैर-जीएम सरसों की तुलना में जीएम सरसों से उत्पादन में उल्लेखनीय बढ़ोत्तरी नहीं.

एनडीए सरकार जीएम (जेनेटिकली मॉडिफाइड) सरसों की समर्थक रही है. सरकार का मानना है कि इससे सरसों के वाणिज्यिक उत्पादन में 25-30 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो जाएगी.

जीएम फसलों के समर्थन में अधिक उत्पादन का तर्क बार-बार दिया जाता है. लेकिन अब इस दावे पर ही सवाल उठने लगे हैं.

परियोजना से जुड़े एक कृषि वैज्ञानिक ने कुछ ऐसे आंकडे पेश किए हैं जिससे सरकार के दावों पर सवाल खड़ा होता है.

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महाराष्ट्र के डॉक्टर शरद पवार ने दावा किया है कि पैदावार के मामले में जीएम मस्टर्ड सरसों की दूसरी प्रजातियों से थोड़ी ही अधिक पैदा होती है. जबकि दूसरी प्रजातियों के उत्पादन में जोखिम काफी कम होता है.

अगर पवार के दावे सही हैं तो जीएम मस्टर्ड और नॉन-जीएम मस्टर्ड के उत्पादन में ज्यादा फर्क नहीं है.

जीएम मस्टर्ड से उपज बढ़ने के दावों पर नए आंकड़ों से सवाल उठने लगा है

जीएम उत्पादों का विरोध करने वाले एक्टिविस्ट कहने लगे हैं कि नए आंकड़ों से ये साफ होता है कि सरकार को जीएम मस्टर्ड का जोखिम नहीं लेना चाहिए.

इसके बाद जीएम मस्टर्ड का विरोध कर रहे कई संगठन को विरोध को पुख्ता आधार मिल गया है. इन संगठनों में बीजेपी और आरएसएस समर्थक किसान संगठन भी शामिल हैं.

जीएम मस्टर्ड क्या है?


भारत में सरसों की कई प्रजातियां पैदावार होती है. इनमें सबसे आधुनिक 1975 में विकसित की गई एक प्रजाति है.

जीएम मस्टर्ड देश का पहला जेनेटिकली मॉडिफाइड सरसों है. इसका विकास पिछले एक दशक से दिल्ली विश्वविद्यालय कर रहा था. ये परियोजना राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड ने वित्तीय सहायता प्राप्त है. इस प्रजाति को धारा मस्टर्ड हाइब्रिड-11 या  डीएमएच-11 नाम दिया गया है.

दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व वाइस-चांसलर दीपक पेंटल को इसका श्रेय दिया जाता है.

डीएमएच-11 को नॉन-जीएम डीएमएच-1 से विकसित किया गया है. डीएमएच-1 को भी दीपक पेंटल ने ही विकसित किया था. कई एक्टिविस्टों के विरोध के बावजूद सरकार जीएम मस्टर्ड को लाने के लिए उत्सुक रही है.

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फिलहाल जीएम मस्टर्ड का मामला पर्यावरण मंत्रालय के जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रेजल कमेटी(जीईएसी) के पास है. जीईएसी जेनेटिक मॉडिफॉइड बीजों की नियामक संस्था है.

तीन फरवरी को मंत्रालय के बाहर जीएम बीजों का विरोध करने वालों ने प्रदर्शन किया था. तब सरकार ने उन्हें आश्वासन दिया कि इसपर अंतिम फैसला सार्वजनिक सुझाव के बाद ही होगा.

नए आंकड़े


एक्टिविस्टों का कहना है कि दीपक पेंटल डीएमएच-11 की तुलना सरसों की ऐसी प्रजातियों से कर रहे थे जिनकी उत्पादन क्षमता काफी कम है.

जबकि आधुनिक नॉन-जीएम सरसों के उत्पादन से तुलना की जाए तो जीएम सरसों के उत्पादन में मामूली बढ़ोतरी होती है.

डॉक्टर पवार ने दस जगहों पर किए गए जमीनी परीक्षण के आंकड़े जारी किए हैं. ये परीक्षण 2006-07 में किए गए थे. इन परीक्षणों के आंकड़े पहले सार्वजनिक नहीं किए गए थे. डॉक्टर पवार 2002 में रिटायर होने से पहले इस परीक्षण से जुड़े हुए थे.

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नए आंकड़ों के अनुसार जीएम डीएमएच-11 की औसत उपज 1551 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर रही. ये उपज नॉन जीएम डीएमएच-1 की प्रति हेक्टेयर औसत उपज से 1.5 प्रतिशत कम है. वहीं क्रांति नामक हाइब्रिड सरसों से केवल 9 प्रतिशत ज्यादा है.

एक्टिविस्टों के अनुसार इन आंकड़ों से साबित होता है कि जीएम मस्टर्ड गैर-जरूरी है.

जीएम मस्टर्ड की उपज सरसों की एकमात्र प्रजाति वरुणा से अधिक है. वरुणा से जीएम मस्टर्ड की औसत पैदावार 27 प्रतिशत ज्यादा रही.

एक्टिविस्टों के अनुसार नए आंकड़ों से साबित होता है कि जीएम मस्टर्ड गैर-जरूरी है

एक्टिविस्टों का कहना है वरुणा सरसों चलन से बाहर हो चुकी है. असल में ये डीएमएच-11 की पैरेंट प्रजाति है इसलिए इसकी उपज ज्यादा होना स्वाभाविक है.

बीज की नई किस्म को तभी मान्यता दी जाती है जब उसकी उपज पहले की किस्म से कम से कम 10 प्रतिशत ज्यादा हो. इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चर रिसर्च इन किस्मों का निर्धारण रखती है और उनमें होने वाले बदलाव पर नजर रखती है.

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सरसों के मामले में किसी नई किस्म की तुलना क्रांति, डीएमएच-1 और एनआरसीएचबी-506 से किए जाने की उम्मीद की जाती है.

पवार ने 2006-07 में हुए परीक्षण के जो आंकड़े सार्वजनिक किए हैं उनसे पता चलता है कि इस परीक्षण में बुनियादी नियम का पालन नहीं किया गया.

पहले से उपलब्ध आंकड़ों और नए आंकड़ों के साथ रखकर देखने पर जीएम मस्टर्ड का औसत उत्पादन करीब 2029 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर होगा. क्रांति, डीएमएच-1 और एनआरसीएचबी-506 जैसी किस्मों की उपज 2200 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर से ज्यादा है.

ऐसे में सवाल है ये है कि क्या इस नए उद्घाटन से जीएम मस्टर्ड को बड़ा झटका लगेगा? लेकिन ऐसा लगता नहीं है. क्योंकि जीएम बीज पर ये मानक लागू नहीं होता. जीएम बीज की तुलना किन बीजों से की जाए उसका फैसला भी जीईएसी ही करती है.

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जीईएसी की बैठकों के सामने आए ब्योरे से जाहिर होता है कि शुरुआत में कमेटी के विशेषज्ञ चाहते थे कि जीएम सरसों की तुलना डीएमएच-1 और क्रांति से की जाए. लेकिन अंतिम निर्णय ये हुआ कि "उचित राष्ट्रीय और ज़ोनल परीक्षण" किया जाए.

नतीजा ये हुआ कि इसकी तुलना राष्ट्रीय स्तर पर केवल वरुण प्रजाति से की गई. जोनल स्तर पर इसकी तुलना आरएच-749 से की जानी थी जिसकी उपज 26 प्रतिशत ज्यादा है. लेकिन जीएम मस्टर्ड की तुलना आरएल-1359 से की गई जिसे 2009 में ही तुलना की सूची से बाहर किया जा चुका है. 

नेशनल एकैडमी ऑफ एग्रीकल्चर साइंसेज के फेलो पवार कहते हैं, "मैं जीएम फसलों के खिलाफ नहीं हूं लेकिन नुकसान के आकलन के प्रक्रिया का पालन होना चाहिए. ऐसा तभी होना चाहिए जब जीएम फसलों से उल्लेखनीय बढ़ोतरी हो."

वो कहते हैं, "इसे मैं वैज्ञानिक जालसाजी कहूंगा." जब पवार को पता चला था कि सरकार जीएम मस्टर्ड को लाने की तैयारी कर रही है तो उन्होंने इसकी शिकायत आईसीएआर के अलावा पर्यावरण, स्वास्थ्य और कृषि मंत्रालयों में की थी.

जीएम फ्री मीडिया की को-कन्वेनर कविता कुरुगंती कहती हैं, "इससे ये साफ हो गया है कि परीक्षणों से जुड़े आंकड़ों सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध होना क्यों जरूरी है."

इस मामले पर प्रोफेसर दीपक पेंटल से संपर्क नहीं हो सका.

First published: 10 March 2016, 22:54 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

Nihar is a reporter with Catch, writing about the environment, water, and other public policy matters. He wrote about stock markets for a business daily before pursuing an interdisciplinary Master's degree in environmental and ecological economics. He likes listening to classical, folk and jazz music and dreams of learning to play the saxophone.

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